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Sikar Chhilawali School Achievement: सीकर के श्रीमाधोपुर ब्लॉक का पीएमश्री राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल छीलावाली सीमित संसाधनों के बावजूद खेल प्रतिभाओं को तराशने के लिए पहचान बना रहा है. स्कूल में न शारीरिक शिक्षक है और न अपना खेल मैदान, फिर भी यहां की करीब 30 छात्राएं राष्ट्रीय स्तर की खो-खो प्रतियोगिताओं में खेल चुकी हैं. शिक्षक बाबूलाल यादव स्कूल समय के बाद भी बच्चों को अभ्यास कराते हैं. पूर्व छात्राएं कंचन सामोता भारतीय महिला खो-खो टीम तक पहुंचीं, जबकि सरिता यादव राजस्थान टीम की कप्तानी कर चुकी हैं. पढ़ाई में भी स्कूल का प्रदर्शन बेहतर है और लगातार छह साल से एनएमएमएस में विद्यार्थियों का चयन हो रहा है.
सीकर के श्रीमाधोपुर ब्लॉक का पीएमश्री राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल छीलावाली इन दिनों अपनी खेल प्रतिभाओं के कारण अलग पहचान बना रहा है. स्कूल में न शारीरिक शिक्षक है और न ही अपना खेल मैदान. पिछले साल छह जर्जर कमरों को गिराए जाने के बाद स्कूल में जगह की कमी भी बढ़ गई. इसके बावजूद यहां के शिक्षक, विद्यार्थी और ग्रामीण मिलकर ऐसा माहौल तैयार कर रहे हैं, जहां संसाधनों की कमी बेटियों के हौसले के सामने छोटी पड़ गई है.
करीब 180 विद्यार्थियों वाले इस स्कूल को अब खो-खो की नर्सरी के तौर पर पहचान मिलने लगी है. यहां लेवल-1 शिक्षक बाबूलाल यादव बच्चों को पढ़ाने के साथ खेल अभ्यास भी कराते हैं. स्कूल समय के बाद भी वे बच्चों के साथ मैदान में नजर आते हैं. सुविधाएं सीमित होने के बावजूद छात्राओं को नियमित खो-खो की तैयारी कराई जाती है. छात्राएं ग्राम पंचायत की जमीन पर अभ्यास करती हैं. खास बात यह है कि स्कूल में शारीरिक शिक्षक नहीं होने के बावजूद खेल प्रतिभाओं को लगातार आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है.
छीलावाली स्कूल की करीब 30 लड़कियां अब तक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में खेल चुकी हैं. स्कूल की पूर्व छात्रा कंचन सामोता भारतीय महिला खो-खो टीम तक पहुंच चुकी हैं. वहीं इसी क्षेत्र की सरिता यादव राजस्थान टीम की कप्तानी कर चुकी हैं. तुलसी कुमारी ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखाई और संपूर्ण टूर्नामेंट की प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट का खिताब हासिल किया. इन उपलब्धियों ने गांव की दूसरी बेटियों को भी खेल के लिए प्रेरित किया है.
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पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में आयोजित राजीव गांधी ग्रामीण ओलंपिक खेलों में खो-खो की राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में छीलावाली-महरोली की टीम ने दोनों बार चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया. इसके अलावा 31वीं से 35वीं सब-जूनियर और जूनियर राष्ट्रीय खो-खो चैंपियनशिप तक यहां के खिलाड़ियों ने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया और लगातार पदक जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की. गांव की बेटियों की इन उपलब्धियों ने स्कूल को खेल के नक्शे पर अलग पहचान दी है.
स्कूल की कहानी सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है. यहां पढ़ाई में भी विद्यार्थी लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. राष्ट्रीय मीन्स-कम-मेरिट स्कॉलरशिप यानी एनएमएमएस परीक्षा में लगातार छह साल से विद्यार्थियों का चयन हो रहा है. पढ़ाई और खेल दोनों में बेहतर परिणाम आने के कारण आसपास की ग्राम पंचायतों के अभिभावक भी अपने बच्चों का प्रवेश इस स्कूल में कराने में रुचि दिखा रहे हैं.
स्कूल में विद्यार्थियों और स्टाफ के लिए ड्रेस कोड लागू किया गया है. स्थानीय भामाशाह भी स्कूल की जरूरतों को पूरा करने में सहयोग कर रहे हैं. बच्चों को बैग, स्वेटर, टाई-बेल्ट सहित दूसरी जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है. कक्षाओं में फर्नीचर, बिजली और पंखों की व्यवस्था है. स्कूल में पांच क्लासरूम में पढ़ाई करवाई जा रही है. सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षकों और ग्रामीणों के सहयोग से स्कूल का माहौल बेहतर बनाने का प्रयास लगातार जारी है.
छीलावाली स्कूल की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां उपलब्धियों के पीछे बड़ी सुविधाएं नहीं, बल्कि शिक्षकों की मेहनत, बच्चों की लगन और ग्रामीणों का सहयोग है। शाम होते ही जहां दूसरे बच्चे घर लौट जाते हैं, वहीं यहां की छात्राएं खो-खो की तैयारी में जुट जाती हैं. राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी इन बेटियों की सफलता अब गांव की दूसरी लड़कियों के लिए प्रेरणा बन रही है. स्कूल यह संदेश दे रहा है कि सही मार्गदर्शन और लगातार मेहनत मिले तो सीमित संसाधनों के बीच भी बड़ी प्रतिभाएं तैयार की जा सकती हैं.

