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Agra News: धर्मपाल जैन आज वृद्धाश्रम में अपने जीवन का एकाकी सफर तय कर रहे हैं. कभी उनकी आवाज बड़ी-बड़ी महफिलों की पहचान हुआ करती थी. लोग घंटों बैठकर उनके गीत सुनते थे और उनकी कला की तारीफ करते थे. धर्मपाल सिर्फ गाना ही नहीं गाते थे, बल्कि ढोलक और तबला बजाने में भी माहिर थे. वह अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते थे और बड़े-बड़े समारोहों व पार्टियों में प्रस्तुति देने के लिए बुलाए जाते थे. कई कार्यक्रमों में उन्हें सम्मानित भी किया गया. लेकिन एक सड़क हादसे ने धर्मपाल की पूरी जिंदगी बदल दी.
आगराः उत्तर प्रदेश के आगरा निवासी धर्मपाल जैन आज वृद्धाश्रम में अपने जीवन का एकाकी सफर तय कर रहे हैं. कभी उनकी आवाज बड़ी-बड़ी महफिलों की पहचान हुआ करती थी. लोग घंटों बैठकर उनके गीत सुनते थे और उनकी कला की तारीफ करते थे. धर्मपाल सिर्फ गाना ही नहीं गाते थे, बल्कि ढोलक और तबला बजाने में भी माहिर थे. वह अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते थे और बड़े-बड़े समारोहों व पार्टियों में प्रस्तुति देने के लिए बुलाए जाते थे. कई कार्यक्रमों में उन्हें सम्मानित भी किया गया. लेकिन एक सड़क हादसे ने धर्मपाल की पूरी जिंदगी बदल दी.
हादसे से बदल गई धर्मपाल की जिंदगी
काम से लौटते समय हुए एक्सीडेंट में उनके दोनों पैर बुरी तरह घायल हो गए. इलाज तो हुआ, लेकिन पैर पूरी तरह ठीक नहीं हो सके. आज वह सहारे के सहारे मुश्किल से चल पाते हैं. इस हादसे के बाद धीरे-धीरे उनका काम छूट गया और उनकी आवाज भी महफिलों से दूर होती चली गई. आमदनी बंद हुई तो परिवार ने भी साथ छोड़ दिया और धर्मपाल वृद्धाश्रम पहुंच गए. हालांकि हुनर आज भी उनके अंदर जिंदा है. अब वह कुर्सी और मेज को ही तबला बनाकर ऐसी धुन निकालते हैं कि सुनने वाला भावुक हो जाता है. कभी तालियों से गूंजने वाली उनकी महफिल आज वृद्धाश्रम की खामोशी में सिमट गई है.
रेडियो और ट्रांजिस्टर सुनकर सिख गए यह हुनर
धर्मपाल जैन ने बताया कि बचपन के दिनों में घर-घर टीवी नहीं हुआ करती थी. उनके घर में रेडियो और ट्रांजिस्टर ही मनोरंजन का मुख्य साधन थे. वह घंटों रेडियो पर पुराने फिल्मी गीत और संगीत सुना करते थे. इन्हीं गीतों को सुनते-सुनते उनके मन में संगीत के प्रति रुचि पैदा हुई और धीरे-धीरे उन्होंने गाना सीख लिया. धर्मपाल ने बताया कि वह बचपन से ही गाने गाया करते थे और किसी प्रशिक्षक के बिना खुद ही ढोलक और तबला बजाना भी सीख गए. शुरुआत में वह घर और आसपास के लोगों के सामने अपनी कला दिखाते थे. उनकी आवाज और संगीत की प्रतिभा धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों में मशहूर होने लगी. इसके बाद उन्हें छोटी महफिलों से लेकर बड़े कार्यक्रमों तक में बुलाया जाने लगा और देखते ही देखते उनका संगीत ही उनकी पहचान बन गया.
पहले की नौकरी फिर शुरू किया अपना ऑर्केस्ट्रा
संगीत के अपने हुनर को पहचान दिलाने के लिए उन्होंने शुरुआत में एक ऑर्केस्ट्रा पार्टी में नौकरी की थी. मेहनत करते-करते उन्होंने धीरे-धीरे पैसे जुटाए और फिर अपना खुद का ऑर्केस्ट्रा शुरू कर दिया. धर्मपाल के मुताबिक करीब तीन साल तक उनका काम खूब चला. दिल्ली, मथुरा, अलीगढ़ समेत कई शहरों से उन्हें कार्यक्रमों में प्रस्तुति देने के लिए बुलाया जाता था. कभी उनकी आवाज और तबले की धुन महफिलों की रौनक हुआ करती थी, लेकिन एक दिन हुए सड़क हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी. पैरों में गंभीर चोट के बाद उनका काम बंद हो गया और आमदनी का जरिया भी छिन गया. धर्मपाल ने बताया कि मुश्किल वक्त आया तो उनके भाई ने भी उनका साथ छोड़ दिया और उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ गया. आज वही कलाकार अपनी पुरानी यादों के सहारे जिंदगी गुजार रहे हैं.
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Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with News18 Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…
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