@जे0 के0…..
— सिंगरौली के जमगड़ी लामीदह निवासी रामभजन के रूप में हुई, जिनका शव परिजन पोस्टमार्टम के बाद साथ ले गए

Sonbhadra। ओबरा के हनुमान मंदिर के सामने मिले बुजुर्ग के अज्ञात शव को मोर्चरी हाउस पहुंचाने और अंतिम संस्कार की व्यवस्था को लेकर अब अलग-अलग दावे सामने आने से मामला चर्चा में आ गया है। सवाल यह है कि आखिर शव को मोर्चरी तक पहुंचाने की वास्तविक व्यवस्था किसने कराई और यदि इसके लिए कोई भुगतान हुआ तो भुगतान किस मद से किया गया?
बताया गया कि बीते 29 सितंबर को हनुमान मंदिर के सामने एक बुजुर्ग का अज्ञात शव मिलने की सूचना पर समाजसेवी रमेश सिंह यादव मौके पर पहुंचे। रमेश सिंह यादव के अनुसार, उन्होंने पुलिस के सहयोग से शव को मोर्चरी हाउस लोढ़ी, राबर्ट्सगंज भिजवाने की व्यवस्था कराई। मृतक के जेब से मिले आधारकार्ड से पहचान सिंगरौली के जमगड़ी लामीदह निवासी रामभजन के रूप में हुई, जिनका शव परिजन पोस्टमार्टम के बाद साथ ले गए।
दूसरी ओर नगर पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि श्रवण पासवान की ओर से यह दावा सामने आया कि शव को ले जाने के लिए वाहन तथा अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी की व्यवस्था नगर पंचायत की ओर से की गई थी। एक ही घटना और एक ही व्यवस्था को लेकर सामने आए इन अलग-अलग दावों ने स्थानीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले में शव ले जाने वाले वाहन चालक राजू जायसवाल ने भी अपना पक्ष रखा। उनका कहना है कि उन्होंने समाजसेवी रमेश सिंह यादव के कहने पर शव को मोर्चरी हाउस लोढ़ी पहुंचाया था। चालक के मुताबिक, यदि 72 घंटे के भीतर मृतक के परिजन नहीं पहुंचते तो अंतिम संस्कार कराने तथा बुजुर्ग की स्मृति में हनुमान मंदिर पर भंडारा कराने की बात भी कही गई थी।

चालक ने यह भी दावा किया कि सुबह के समय नगर पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि श्रवण पासवान वहां से गुजरे और हनुमान मंदिर के सामने शव पड़ा देखकर भी वाहन से नीचे नहीं उतरे। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ऐसे में इस आरोप को संबंधित पक्ष का बयान मानकर ही देखा जाना चाहिए।
इधर कुछ समाचार पत्रों में शव को व्यवस्थित करने और अंतिम संस्कार से संबंधित खबरें प्रकाशित होने के बाद विवाद और गहरा गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मृतक के परिजन बाद में पोस्टमार्टम के बाद शव अपने साथ घर ले गए और अंतिम संस्कार नगर पंचायत की ओर से कराया ही नहीं गया, तो फिर नगर पंचायत की ओर से अंतिम संस्कार संबंधी व्यवस्था का दावा किस आधार पर किया गया? इस सवाल का जवाब संबंधित अभिलेखों से ही स्पष्ट हो सकेगा।
मामले को लेकर वर्ष 2023 के नगर निकाय चुनाव से जुड़े पुराने राजनीतिक संबंधों की चर्चाएं भी स्थानीय स्तर पर हो रही हैं। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें वर्तमान विवाद से जोड़ना फिलहाल महज अटकल होगी।

अब असली सवाल श्रेय का नहीं, बल्कि रिकॉर्ड का है। यदि शव को मोर्चरी पहुंचाने के लिए नगर पंचायत से वाहन उपलब्ध कराया गया था, तो उसका अभिलेख क्या है? यदि लकड़ी की व्यवस्था की गई थी, तो उसका भुगतान किस मद से हुआ? और यदि किसी अन्य व्यक्ति ने वाहन की व्यवस्था कर शव को मोर्चरी पहुंचाया, तो नगर पंचायत के दावे का आधार क्या है?
इन सवालों का जवाब संबंधित दस्तावेज, भुगतान अभिलेख और जिम्मेदार अधिकारियों की जांच से ही सामने आ सकता है। फिलहाल एक ही शव की व्यवस्था को लेकर सामने आए दो दावों ने व्यवस्था से ज्यादा श्रेय की राजनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
