नई दिल्ली. कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय मुक्केबाजों का दबदबा कायम है, जहां पुरुषों के 60 किग्रा वर्ग के फाइनल मुकाबले में भारत के सचिन सिवाच ने इतिहास रचते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया. नामीबिया के ट्रयागेन मॉर्निंग न्देमेलो के खिलाफ खेले गए इस रोमांचक मुकाबले की शुरुआत सचिन के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रही, जहां शुरुआती दो दौर के बाद वे 1-4 से पीछे चल रहे थे.
हार न मानने के अपने जज्बे को दिखाते हुए सचिन सिवाच (Sachin Siwach) ने निर्णायक तीसरे दौर में शानदार वापसी की और 4-1 से बाजी पलट दी. आखिरकार 3-2 के विभाजित निर्णय (स्प्लिट-डिसीजन) से मुकाबला जीतकर उन्होंने भारत की झोली में एक और स्वर्णिम सफलता डाल दी. इस शानदार जीत के साथ ही सचिन राष्ट्रमंडल खेल 2026 में मुक्केबाजी स्पर्धा के नए चैंपियन बन गए हैं.
पदक तालिका में भारत का दबदबा बरकरार, कुल पदकों की संख्या 36 पहुंची
सचिन की इस ऐतिहासिक जीत के साथ भारतीय मुक्केबाजों का शानदार अभियान जारी है, जहां वे अब तक 6 स्वर्ण और 2 रजत पदक हासिल कर चुके हैं. मुक्केबाजी में मिले इस जबरदस्त प्रदर्शन के दम पर राष्ट्रमंडल खेल 2026 की पदक तालिका में भारत की कुल पदक संख्या 36 हो गई है, जिसमें 12 स्वर्ण, 16 रजत और 8 कांस्य पदक शामिल हैं. भारत इस समय तालिका में मेजबान स्कॉटलैंड को पीछे छोड़ते हुए चौथे स्थान पर मजबूती से बना हुआ है, जबकि ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और कनाडा क्रमशः शीर्ष तीन स्थानों पर काबिज हैं.
सचिन सिवाच का प्रेरणादायक सफर
हरियाणा की माटी ने देश को कई ऐसे सूरमा दिए हैं जिन्होंने दुनिया भर में भारत का परचम लहराया है. भिवानी जिले के छोटे से गांव मिताथल में 6 दिसंबर 1999 को जन्मे सचिन सिवाच की कहानी भी एक ऐसे ही अटूट जज्बे और संघर्ष की मिसाल है. एक किसान परिवार में जन्मे सचिन के खून में ही मुक्केबाज़ी दौड़ती थी. उनके पिता कृष्ण सिवाच, भारत को पहला ओलंपिक पदक दिलाने वाले बॉक्सर विजेंद्र सिंह के भाई हैं. पारिवारिक माहौल और चाचा पवन सिवाच के प्रोत्साहन ने नन्हें सचिन के मन में मुक्केबाज़ी की चिंगारी जला दी.
सचिन सिवाच बने कॉमनवेल्थ गेम्स चैंपियन.
शुरुआती संघर्ष और पिता का अटूट समर्पण
वर्ष 2009 में, जब सचिन मात्र 10 वर्ष के थे, तब वे रिंग में उतरने का सपना लेकर भिवानी की मशहूर ‘कैप्टन हवा सिंह अकादमी’ पहुंचे. लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी. अत्यधिक दुबले-पतले और कुपोषित होने के कारण कोच संजय शेरोन ने उन्हें अकादमी में प्रवेश देने से मना कर दिया. लेकिन एक पिता का विश्वास कहां डिगने वाला था. कृष्ण सिवाच ने ठान लिया था कि वे अपने बेटे के सपनों की उड़ान में कोई रुकावट नहीं आने देंगे. उन्होंने घर पर ही सचिन की खुराक का विशेष ध्यान रखना शुरू किया और कड़े इंतजाम करके ताजा दूध व पौष्टिक आहार की व्यवस्था की. पिता के अथक परिश्रम और सचिन के कड़े अभ्यास ने रंग दिखाया और जल्द ही वे अकादमी में दाखिला पाने में सफल रहे
जूनियर से यूथ स्तर पर जमाई धाक
सचिन की प्रतिभा रिंग में चमकने लगी और उन्होंने जूनियर स्तर पर ही अपने विरोधियों को पस्त करना शुरू कर दिया. वर्ष 2015 की एआईबीए जूनियर विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी दस्तक दी. असली धमाका वर्ष 2016 में हुआ, जब सचिन एआईबीए यूथ वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के इतिहास में महज तीसरे मुक्केबा बने. इसके बाद तो सफलताओं का सिलसिला चल पड़ा. 2017 में राष्ट्रमंडल यूथ गेम्स में स्वर्ण पदक जीता वहीं 2017 एशियाई यूथ बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रजत पदक अपने नाम किया. 2017 एशियाई मुक्केबाजी परिसंघ द्वारा ‘सर्वश्रेष्ठ एशियाई पुरुष यूथ बॉक्सर’ का प्रतिष्ठित खिताब सचिन को मिला.
सीनियर सर्किट में कदम और बाधाओं से लड़ाई
जूनियर स्तर पर अपनी बादशाहत कायम करने के बाद सचिन ने सीनियर वर्ग में कदम रखा. यहां प्रतिस्पर्धा कठिन थी, लेकिन सचिन का हौसला और बुलंद था. 2019 में उन्होंने इण्डिया ओपन में रजत और गी-बी बॉक्सिंग टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीता. इसी वर्ष उन्होंने दक्षिण एशियाई खेलों में देश के लिए स्वर्ण पदक हासिल किया. हालांकि, सफलता के इस सफर में सचिन को कई शारीरिक झटकों का सामना भी करना पड़ा: कलाई की गंभीर चोट के कारण उनके करियर की रफ्तार कुछ समय के लिए थम गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और पूरी रिकवरी के बाद जोरदार वापसी की. एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप से ठीक पहले उन्हें पटियाला में आपातकालीन अपेंडिक्स ऑपरेशन से गुजरना पड़ा. लगभग एक महीने तक वे रिंग से दूर रहे. इन तमाम मुश्किलों के बावजूद सचिन ने हार नहीं मानी.
2023 में उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में डेब्यू किया और प्री-क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे. उसी वर्ष एशियाई खेलों के क्वार्टर फाइनल में उन्होंने चीन के ल्यू पिंग को कड़ी टक्कर दी. भारतीय सेना में हवलदार के पद पर तैनात सचिन सिवाच ने वर्ष 2026 में चेक गणराज्य में आयोजित ग्रैंड प्रिक्स चैंपियनशिप में एक और अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीतकर देश और सेना का नाम गर्व से ऊंचा किया.






