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Inspirational story:हर खिलाड़ी की सफलता के पीछे संघर्ष की एक कहानी होती है लेकिन वेटलिफ्टर ऋषिकांत सिंह चानंबम की कहानी दिल को छू लेने वाली है. एक तरफ उनके पिता ब्लड कैंसर से जूझ रहे थे दूसरी तरफ उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए सिल्वर मेडल जीतकर करोड़ों लोगों को गर्व का मौका दिया. कभी ₹150 की दिहाड़ी पर मजदूरी करने वाले ऋषिकांत ने गरीबी, जिम्मेदारियों और मुश्किल हालात के बावजूद अपने सपनों को नहीं छोड़ा.
Rishikanta Singh, Rishikanta Singh story, Rishikanta Commonwealth Games Silver: ऋषिकांत सिंह चनामबम की कहानी.
Inspirational story: हर किसी की जिंदगी में मुश्किलें आती हैं लेकिन कुछ लोग उन्हीं मुश्किलों को अपनी ताकत बना लेते हैं. मणिपुर के युवा वेटलिफ्टर ऋषिकांत सिंह चनामबम की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एक तरफ उनके पिता ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे.दूसरी तरफ बेटा हजारों किलोमीटर दूर भारत के लिए मेडल जीतने के लिए मंच पर खड़ा था.कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतने वाले ऋषिकांत की यह सफलता सिर्फ खेल की उपलब्धि नहीं है, बल्कि संघर्ष, परिवार के त्याग और कभी हार न मानने वाले जज्बे की मिसाल भी है.
पिता अस्पताल में, बेटा देश के लिए मेडल जीत रहा था
जब ऋषिकांत ग्लासगो में पुरुषों के 60 किलोग्राम भार वर्ग में मुकाबले के लिए मंच पर उतरे तब उनके परिजन उनसे करीब 7,000 किलोमीटर दूर राजस्थान के बाड़मेर जिले के उत्तरलाई में मोबाइल फोन पर उनकी प्रतियोगिता देख रहे थे हालांकि ऋषिकांत का घर मणिपुर के इम्फाल वेस्ट जिले के नगैरंगबाम माखा मानिंग लेइकाई में है लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनके माता-पिता राजस्थान में बड़े बेटे अमरजीत सिंह के साथ रह रहे हैं.उनके पिता का एम्स जोधपुर में ब्लड कैंसर का इलाज चल रहा है.अब तक उनकी तीन बार कीमोथेरेपी हो चुकी है इसी बीच ऋषिकांत ने कुल 264 किलोग्राम वजन उठाकर सिल्वर मेडल अपने नाम कर लिया.
मेडल जीतते समय भी पिता ही थे दिमाग में
ऋषिकांत कहते हैं कि मुकाबले के दौरान भी उनके मन में सबसे ज्यादा अपने पिता का ही ख्याल था.उन्होंने बताया कि उनका बचपन काफी कठिनाइयों में बीता. इसी वजह से वे हमेशा कोशिश करते रहे कि किसी तरह अपने पिता के चेहरे पर मुस्कान ला सकें.ऋषिकांत ने कहा कि उन्हें अपने पिता के साथ ज्यादा समय बिताने का मौका कभी नहीं मिला.जब वह पिछली बार घर गए थे तो पिता को स्कूटर शोरूम लेकर गए ताकि वे पहली बार अपने लिए स्कूटर खरीद सकें.उनके लिए यह पल किसी भी मेडल से कम नहीं था.
जब पढ़ाई के लिए करनी पड़ी ₹150 की दिहाड़ी
आज देश के लिए मेडल जीतने वाले ऋषिकांत कभी दिहाड़ी मजदूर भी रहे हैं.उन्होंने बताया कि बचपन में दोस्तों के साथ मजदूरी करने जाते थे.करीब दो से तीन महीने तक उन्होंने अलग-अलग छोटे-मोटे काम किए.कोई विशेष हुनर नहीं था इसलिए जो काम मिलता वही कर लेते थे.इसके बदले उन्हें करीब 150 रुपये रोज मिलते थे.शुरुआत में उनका मकसद सिर्फ इतना था कि दोस्तों की तरह किसी निजी स्कूल में पढ़ सकें लेकिन धीरे-धीरे परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि वही कमाई घर चलाने में भी खर्च होने लगी.
माता-पिता ने दूसरों के खेतों में मजदूरी की
ऋषिकांत का परिवार बेहद साधारण है.उनके माता-पिता दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे. खेती के लिए उनके पास अपनी जमीन तक नहीं थी.परिवार का खर्च चलाने के लिए उनके पिता मजदूरी के साथ-साथ टैक्सी भी चलाते थे ताकि छह लोगों के परिवार का किसी तरह गुजारा हो सके.घर में माता-पिता के अलावा दो बेटे और दो बेटियां थीं. सीमित आमदनी में परिवार चलाना आसान नहीं था.
बड़े भाई का वायुसेना में
ऋषिकांत के बड़े भाई अमरजीत सिंह साल 2012 से भारतीय वायुसेना में सेवा दे रहे हैं.उनकी नौकरी लगने के बाद ही परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आना शुरू हुआ.अमरजीत बताते हैं कि उनके माता-पिता ने पूरी जिंदगी दूसरों के खेतों में काम करके परिवार पाला.ऋषिकांत अपने बड़े भाई को सिर्फ भाई नहीं बल्कि दूसरे पिता मानते हैं.वे कहते हैं कि एक समय ऐसा था जब उनके पास प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए पैसे नहीं होते थे.उस समय बड़े भाई ने हर जरूरत पूरी की.ट्रेनिंग की फीस से लेकर प्रतियोगिताओं का खर्च तक, सब कुछ उन्होंने उठाया.ऋषिकांत साफ कहते हैं कि आज अगर वे इस मुकाम पर हैं तो उसमें सबसे बड़ा योगदान उनके बड़े भाई का है.
संघर्ष ने बनाया चैंपियन
ऋषिकांत की कहानी बताती है कि सफलता सिर्फ प्रतिभा से नहीं मिलती बल्कि उसके पीछे परिवार का त्याग, मेहनत और लगातार संघर्ष भी होता है.जिस लड़के ने कभी 150 रुपये की दिहाड़ी मजदूरी की जिसके माता-पिता दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे और जिसके पिता आज कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं उसी ने दुनिया के बड़े मंच पर भारत के लिए सिल्वर मेडल जीतकर तिरंगा ऊंचा किया.
युवाओं के लिए क्या है सीख?
ऋषिकांत सिंह चनामबम की कहानी हर युवा को यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए तो मंजिल जरूर मिलती है.गरीबी, आर्थिक तंगी, परिवार की जिम्मेदारियां और जीवन की कठिन चुनौतियां किसी इंसान के सपनों को रोक नहीं सकतीं.जरूरत सिर्फ हिम्मत, धैर्य और लगातार मेहनत करते रहने की होती है.आज ऋषिकांत सिर्फ एक सिल्वर मेडलिस्ट नहीं हैं बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस रखते हैं
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न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. न्यूज 18 में एजुकेशन, करियर, सक्सेस स्टोरी पर काम करते हैं. करीब 16 साल से अधिक मीडिया में सक्रिय है. दै…
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