नई दिल्ली. कभी रेल की पटरी के किनारे प्लास्टिक की बोतलें बीनने वाला 13-14 साल का वह छोटा सा लड़का आज भारत की जर्सी पहनकर सीने पर सोने का तमगा सजाए खड़ा है. यह सिर्फ किसी खिलाड़ी की कामयाबी नहीं, बल्कि तकदीर की लकीरों से की गई एक जबरदस्त बगावत की दास्तान है. शनिवार का सूरज जब ढला, तो देश भर के अखबारों और टीवी चैनलों पर भारत की पुरुष और महिला कबड्डी टीमों के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने की गूंज थी. लेकिन इस सुनहरी चमक के पीछे पसीने, आंसू और बेइंतहा तकलीफों का जो समंदर छुपा है, उसकी सबसे मिसाली तस्वीर हैं असलम इनामदार.
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के एक छोटे से गांव ताकलीभान से निकलकर दो बार एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल अपने नाम करने वाले 26 साल के असलम इनामदार (Aslam Inamdar) की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लगती है. बचपन में ही सिर से पिता का साया उठ गया था. पांच बच्चों के लालन-पालन का पहाड़ जैसा बोझ मां के कंधों पर आ पड़ा. मां ने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर और चौका-बर्तन करके परिवार को पालना शुरू किया. भोजन की किल्लत ऐसी थी कि पेट भरना ही दिन की सबसे बड़ी चुनौती हुआ करता था.
सपना जो सच हो गया
आज असलम इनामदार के गले में एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल चमक रहा है. एक वक्त चाय के ढाबे पर बर्तन धोने वाले अस्लम अब दो बार के अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता हैं. इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उन्होंने अपनी भावनाओं को बयां किया. असलम ने कहा, ‘यह आज भी मुझे एक सपने जैसा लगता है. मैं अक्सर सोचता हूं कि जिस इंसान के पास घर में खाने के लिए खाना तक नहीं था, वह आज दो इंटरनेशनल मेडल लेकर खड़ा है.’
असलम का मानना है कि पीकेएल ने उन्हें नाम, शोहरत, पैसा और सम्मान सब कुछ दिया. लेकिन उनका असली मकसद अब पूरा हो रहा है. वह चाहते हैं कि देश के कोने-कोने में अभावों में जी रहे गरीब बच्चे उनकी कहानी देखकर बड़े सपने देखना शुरू करें और उन सपनों को सच करने का हौसला जुटाएं. असलम इनामदार की यह दास्तान साबित करती है कि अगर इरादों में लोहे सी मजबूती हो, तो मिट्टी के मैदान से उठकर भी आसमान के सितारों को छुआ जा सकता है.
प्लास्टिक की बोतलें बीनकर बुझाई पेट की आग
असलम इनामदार ने अपने बचपन में हर वह काम किया, जो एक इंसान अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कर सकता है. चाय के ढाबों पर बर्तन धोना, गंदे वॉशरूम साफ करना, खेतों में कड़ी धूप में मजदूरी करना और सड़कों पर पड़ी प्लास्टिक की खाली बोतलें जमा करके बेचना ताकि रात को एक वक्त का खाना नसीब हो सके. पेट की आग बुझाने के लिए वड़ा पाव ही उनका रोजमर्रा का सहारा बन चुका था. कई बार जब टूर्नामेंट में खाना मिलता, तो असलम बचा हुआ भोजन उठाकर रख लेते ताकि अगले दिन भूख से न तड़पना पड़े.
बिना टिकट ट्रेनों में कटीं रातें
गरीबी के इस घोर अंधेरे में असलम के लिए कबड्डी उम्मीद की एक किरण बनकर आई. उनके बड़े भाई वसीम खुद एक बेहतरीन क्षेत्रीय कबड्डी खिलाड़ी थे. वसीम ही असलम के पहले आदर्श बने. जब भाई पुलिस सेवा में भर्ती हुए तो परिवार को थोड़ी आर्थिक राहत मिली, लेकिन असलम के सिर पर कबड्डी का जुनून सवार हो चुका था. महज 15 साल की उम्र में असलम ने स्थानीय टूर्नामेंट्स में खेलना शुरू कर दिया.
उन दिनों पैसे तो दूर, मैच खेलने की जगह तक पहुंचना एक जंग की तरह था. जेब में टिकट के पैसे नहीं होते थे, इसलिए अस्लम बिना टिकट ट्रेनों में सफर करते थे. पुलिस या टीटीई से छिपने और सोने के लिए वह लोकल ट्रेनों में सीटों के नीचे फर्श पर लेट जाया करते थे. उस वक्त पूरे दिन पसीना बहाने के बाद उन्हें एक मैच के 200 से 500 रुपये मिला करते थे. कई बार तो वह सिर्फ इस शर्त पर मैच खेलने चले जाते थे कि आयोजक उन्हें पेट भरकर खाना खिला देंगे.
प्रो कबड्डी लीग तकदीर का सबसे बड़ा यू टर्न
संघर्ष का यह दौर तब तक चला जब तक कि प्रो कबड्डी लीग यानी पीकेएल की आहट नहीं हुई. पीकेएल भारतीय कबड्डी के इतिहास में क्रांति लेकर आया और यही असलम की जिंदगी का सबसे बड़ा यू-टर्न साबित हुआ. आठवें सीजन में पुणेरी पलटन की टीम ने अस्लम को पहली बार आधिकारिक कॉन्ट्रैक्ट दिया. वह रकम थी 8 लाख रुपये. असलम बताते हैं कि जिस लड़के ने 200 रुपये के लिए रातें जागी हों, उसके लिए वह 8 लाख रुपये किसी 8 करोड़ रुपये से कम नहीं थे. इस पैसे से उन्होंने सबसे पहले अपनी मां के लिए सोने का एक हार खरीदा. उस मां के लिए जिसने जिंदगी भर दूसरों के घरों में काम करके उन्हें पाला था.
87 मैच और कप्तानी में मिला खिताब
इसके बाद असलम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. मैदान पर उनकी फुर्ती, आक्रामक रैडिंग और सूझबूझ भरी टैकल की काबिलियत ने उन्हें टीम की रीढ़ बना दिया. पीकेएल में अब तक खेले गए अपने 87 मुकाबलों में असलम ने आक्रमण और बचाव दोनों में अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी है कि वह सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि अपनी टीम के नायक बन गए. दसवें सीजन में उन्होंने पुणेरी पलटन की कप्तानी संभालते हुए टीम को पहली बार चैंपियन बनाया और खुद उस सीजन के ‘मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर’ (MVP) चुने गए. फ्रेंचाइजी ने उनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए बारहवें सीजन के लिए भी उन्हें रिटेन किया.

