नई दिल्ली. सुबह के साढ़े तीन बजे थे. पेट में सिर्फ एक केला गया था और सामने खड़ी थी 42.195 किलोमीटर की बेहद थका देने वाली मैराथन. जापान के नागोया शहर की पोर्ट सिटी में आम लोगों के लिए सुबह सुहानी थी. हल्की हवा, छाए हुए बादल और हल्की बूंदाबांदी. दौड़ने के लिए इससे बेहतर मौसम और क्या हो सकता था? लेकिन एक मैराथन धावक के लिए यह मौसम छलावा था. प्रशांत महासागर से उठी नमी ने हवा में उमस को 85 से 88 प्रतिशत तक बढ़ा दिया था. इस उमस में शरीर से पानी और नमक इतनी तेजी से निचोड़ता है कि अच्छे-अच्छे एथलीट हिम्मत हार जाएं.
इसी जानलेवा उमस के बीच भारत के सावन बरवाल (Sawan Barwal) इतिहास रचने के इरादे से ट्रैक पर उतरे. सुबह 3:30 बजे से लेकर 10:30 बजे तक, सिर्फ एक केला ही उनकी ताकत और ऊर्जा का इकलौता जरिया बना रहा. दौड़ पूरी करने के बाद डोप कंट्रोल टेस्ट के लिए शरीर में इतना पानी भी नहीं बचा था कि यूरिन सैंपल दिया जा सके. एक घंटे से ज्यादा वक्त तक वे पानी पीते रहे ताकि टेस्ट दे सकें. इस बेमिसाल जज्बे का नतीजा यह रहा कि सावन ने पुरुषों की मैराथन स्पर्धा में 2 घंटे, 11 मिनट और 37 सेकंड का समय निकालकर ऐतिहासिक सिल्वर मेडल अपने नाम कर लिया. उन्होंने अपना ही पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया, जहां वे स्वर्ण पदक विजेता जापान के इचिताका यामाशिता (2:10:49) से बस कुछ ही कदम पीछे रहे.
विदेशी सरजमीं पर ऐतिहासिक सूखा खत्म
भारत के लिए यह पदक किसी क्रांति से कम नहीं है. एशियाई खेलों के इतिहास में भारत ने मैराथन में जो भी पदक जीते थे, वे केवल अपने देश में (1951 और 1982 नई दिल्ली) ही आए थे. विदेशी सरजमीं पर भारत का यह पहला मैराथन पदक है. इस रेस से पहले खेल अधिकारियों तक ने सावन पर दांव नहीं लगाया था, लेकिन उनके कोच को उनकी क्षमता पर पूरा यकीन था.
कांगड़ा की वादियों से निकला एथलीट
हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में बैजनाथ शिव मंदिर के पास बसे एक छोटे से गांव में जन्मे सावन के लिए पहाड़ों पर दौड़ना बचपन का खेल था. ऊंचाई वाले इलाकों में रहने के कारण उनके खून में लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) की मात्रा स्वाभाविक रूप से ज्यादा थी, जो थक चुकी मांसपेशियों तक ऑक्सीजन पहुंचाने और तेजी से उबरने में मदद करती है. हालांकि, 15 सालों से दौड़ रहे सावन को सेना में शामिल होने से पहले एथलेटिक्स की बारीकियों का अंदाजा नहीं था. वे 10 हजार मीटर और 25 किलोमीटर की रेस लड़ा करते थे.
कोच का भरोसा और मैराथन का रुख
सावन का मैराथन तक पहुंचने का सफर भी किसी फिल्मी पटकथा जैसा है. भारत के लंबी दूरी के विदेशी कोच स्कॉट सिमंस ने जब पिछले साल उन्हें मैराथन में उतरने की सलाह दी, तब सावन को इस खेल का सही अंदाजा भी नहीं था. कोच का मानना था कि भारत में लंबी दूरी की दौड़ में अपार संभावनाएं छिपी हैं. 10 हजार मीटर में सावन के बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें मैराथन में ढालने का फैसला किया गया.
कड़ी ट्रेनिंग और अमेरिका का सफर
तैयारी के तहत सावन को अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग्स भेजा गया, जहां विश्व स्तरीय धावकों के साथ उन्होंने अभ्यास किया. मैराथन में तालमेल बिठाने के लिए उनकी रफ्तार पर काबू पाना जरूरी था. पिछले तीन महीनों में उन्होंने हर हफ्ते 190 किलोमीटर की कठोर ट्रेनिंग की, जिसमें 40 किलोमीटर की तीन बेहद कठिन दौड़ शामिल थीं. दिलचस्प बात यह है कि यह सावन के करियर की महज दूसरी ही फुल मैराथन थी. उनकी पहली मैराथन इस साल अप्रैल में रोटरडैम में हुई थी.
30 किलोमीटर के बाद की रणनीति
नागोया की रेस में रणनीति ही सब कुछ थी. सावन की योजना शुरुआत से अग्रिम पंक्ति के धावकों के साथ बने रहने की थी. 15 किलोमीटर के बाद जब रेस की रफ्तार अचानक धीमी हुई, तो सावन ने गति बढ़ाई. 30 किलोमीटर के निशान के बाद चढ़ाई आई, जिसने थकी हुई पिंडलियों की कड़ी परीक्षा ली. लेकिन मोड़ लेते ही रेस तेज हो गई और दौड़ में सिर्फ 3-4 धावक बचे. इसी मोड़ पर सावन को भरोसा हो गया कि पदक अब दूर नहीं है.
आगामी लक्ष्य पर टिकी निगाहें
सावन ने सिल्वर मेडल जीतने के बाद मुस्कुराते हुए कहा कि अगर मैं मेडल नहीं जीतता, तो यह सारा समय और मेहनत बेकार चली जाती. 42 किलोमीटर से ज्यादा का फासला तय करने के बाद अब सावन पूरे हफ्ते आराम करेंगे और नींद पूरी करेंगे. लेकिन यह आराम ज्यादा लंबा नहीं होगा, क्योंकि अगले साल होने वाली एशियन चैंपियनशिप की तैयारी उनका इंतजार कर रही है. सावन की यह चांदी भारतीय एथलेटिक्स में लंबी दूरी की दौड़ के एक नए युग का आगाज है.
