नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के छोटे से गांव सिरसा में जन्मे गुलवीर सिंह का शुरुआती जीवन खेतों की पगडंडियों और गांव की धूलभरी हवाओं के बीच बीता. 1 जून 1998 को एक किसान परिवार में जन्मे गुलवीर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह एथलेटिक्स के मैदान में भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन करेंगे. उनके गांव में सेना में भर्ती होने की एक समृद्ध परंपरा थी और गुलवीर का भी पहला प्यार देश सेवा ही था. गुलवीर ने एिशयन गेम्स में इतिहास कायम किया है. उन्होंने सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया.
सफलता के इसी क्रम को जारी रखते हुए एशियन गेम्स में गुलवीर सिंह (Gulveer Singh) ने एक बार फिर इतिहास रच दिया. पुरुषों की 10,000 मीटर फाइनल स्पर्धा में 28:29.38 मिनट का समय निकालते हुए उन्होंने भारत के लिए शानदार रजत पदक जीता. यह एशियन गेम्स के इतिहास में उनका दूसरा पदक है. 28 वर्ष के इस भारतीय धावक ने अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प से यह साबित कर दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ सफर भी दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों तक पहुंच सकता है.
वर्ष 2018 में गुलवीर सिंह (Gulveer Singh) का यह बचपन का सपना तब सच हुआ, जब वे स्पोर्ट्स कोटे के जरिए भारतीय सेना में शामिल हुए. उन्हें भारतीय सेना की ‘ग्रेनेडियर्स’ रेजीमेंट में पोस्टिंग मिली, जहां वे आगे चलकर जूनियर कमिशंड ऑफिसर (JCO) के पद तक पहुंचे. सेना की अनुशासित जीवनशैली और कठिन प्रशिक्षण ने गुलवीर के भीतर छिपे एथलीट को तराशने का काम किया. सेना में भर्ती होने के बाद उन्हें ‘आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट’ में भेजा गया और बाद में वे ‘भारतीय खेल प्राधिकरण’ (SAI) के राष्ट्रीय शिविर का हिस्सा बने. यहीं से उन्होंनेप्रोफेशनल रनिंग की बारीकियों को समझा.
सीमाओं पर पहरा और पहाड़ियों की कठिन ट्रेनिंग
सैन्य जीवन काफी चुनौतियों से भरा था. एथलेटिक्स के अभ्यास के साथ-साथ गुलवीर को देश की सीमाओं पर सुरक्षा और गश्त की जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ती थीं. अरुणाचल प्रदेश जैसे दुर्गम और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में तैनाती के दौरान वहां के कठिन इलाके और कम ऑक्सीजन वाले माहौल ने अनजाने में ही उनकी शारीरिक क्षमता और स्टैमिना को अभूतपूर्व मजबूती दी.
शुरुआती संघर्ष और पहली सफलता
शुरुआती दौर में सफलता की राह आसान नहीं थी. एलीट डिस्टेंस रनिंग की कठोर मांगों को समझते हुए और सेना के कर्तव्यों को निभाते हुए उन्हें अपना पहला सीनियर मेडल जीतने में चार साल का लंबा समय लगा. उनकी पहली बड़ी सफलता साल 2022 में कालीकट में आयोजित ‘फेडरेशन कप’ में मिली, जहां उन्होंने 10,000 मीटर स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहली छाप छोड़ी.
एशियन गेम्स 2023 से अंतरराष्ट्रीय पहचान
इसके बाद गुलवीर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. एशियाई खेलों 2023 में उन्होंने 10,000 मीटर में कांस्य पदक अपने नाम किया. इसी वर्ष बैंकॉक में आयोजित एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी उन्होंने 5000 मीटर में कांस्य पदक जीतकर एशियाई महाद्वीप में अपनी धमक कायम की.
अमेरिका में ट्रेनिंग और रिकॉर्ड्स की झड़ी
गुलवीर के करियर में सबसे बड़ा मोड़ साल 2024 में आया, जब उन्होंने अमेरिकी कोच स्कॉट सिमंस के मार्गदर्शन में अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग्स में उच्च ऊंचाई वाले (हाई-ऑल्टीट्यूड) ट्रेनिंग सेंटर में अभ्यास शुरू किया. इस अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर ने उनके प्रदर्शन में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया. मार्च 2024 में कैलिफोर्निया में आयोजित ‘द टेन’ स्पर्धा में गुलवीर ने 10,000 मीटर की दौड़ 27:41.81 मिनट में पूरी करके अपने पूर्व कोच सुरेंदर सिंह का 16 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया. आठ महीने बाद जापान में उन्होंने अपने ही इस रिकॉर्ड में सुधार करते हुए 27:14.88 मिनट का नया समय दर्ज किया.
महाद्वीप स्तर पर रचा इतिहास
उनका यह प्रदर्शन 2025 में और भी निखरकर सामने आया. ‘द टेन’ 2025 में उन्होंने 10,000 मीटर में 27:00.22 मिनट का समय निकालकर अपने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को 14.66 सेकंड से बेहतर बनाया. वहीं, फरवरी 2025 में बोस्टन यूनिवर्सिटी के इंडोर मुकाबले में 5000 मीटर स्पर्धा को 12:59.77 मिनट में पूरा करके वे इंडोर 5000 मीटर में 13 मिनट से कम का समय निकालने वाले पहले एशियाई एथलीट बने. इससे पहले जून 2024 में पोर्टलैंड ट्रैक फेस्टिवल में 5000 मीटर दौड़ 13:18.92 मिनट में पूरी कर उन्होंने ओलंपिक एथलीट अविनाश साबले के राष्ट्रीय रिकॉर्ड को भी तोड़ा था.
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदकों का सफर
सफलता का यह सिलसिला अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदकों में बदलता रहा. 2025 की एशियन चैंपियनशिप की 10,000 मीटर स्पर्धा में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता, जबकि राष्ट्रमंडल खेल (कॉमनवेल्थ गेम्स) 2026 में 10,000 मीटर में रजत और 5000 मीटर में कांस्य पदक अपने नाम किया.
