नई दिल्ली. हाल के सालों में मेनस्ट्रीम सिनेमा में भारतीय लोककथाओं, क्षेत्रीय मान्यताओं और सुपरनैचुरल मान्यताओं को शामिल करने का ट्रेंड काफी बढ़ा है. इसी सिलसिले में पॉपुलर TVF डायरेक्टर दीपक कुमार मिश्रा और राइटर अरुणाभ कुमार एक नई फिल्म ‘द वन’ लेकर आए हैं. छठ पूजा की पवित्र भक्ति, बिहार का क्षेत्रीय बैकग्राउंड, राजा-रानियों की पौराणिक कहानियां और हॉरर-कॉमेडी का हल्का सा टच, यह फिल्म कागज पर बहुत दिलचस्प लगती है. लेकिन क्या यह अनोखा एक्सपेरिमेंट बड़े पर्दे पर अपना जादू चला पाएगा? या बहुत सारे एक्सपेरिमेंट के बोझ तले दब जाएगा? आइए इसे डिटेल में जानते हैं.
कहानी
फिल्म की शुरुआत मुंबई के रहने वाले ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) से होती है. ऋषि एक प्रैक्टिकल और पढ़ा-लिखा शहर का रहने वाला है जो छह साल से अपने पुश्तैनी गांव देवांचल नहीं गया है. उसकी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ उसकी शादीशुदा जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा है, सिवाय बच्चे की कमी के. छह साल पहले हुए दर्दनाक मिसकैरेज का जख्म आज भी उनके दिलों में गहराई से है. कहानी तब मोड़ लेती है जब छठ पूजा के बड़े त्योहार का समय आता है और ममता की बहुत ज्यादा इच्छा उन्हें देवांचल गांव ले जाती है. हालांकि, ऋषि का मुख्य मकसद पूजा करने से ज्यादा अपनी पुरखों की जमीन बेचना है. देवांचल गांव के ठीक पास एक घना और रहस्यमयी जंगल है, जिसे वहां के लोग ‘देव वन’ के नाम से जानते हैं. गांव वालों का पक्का मानना है कि शाम के बाद देव वन में जाना मौत को बुलावा देने जैसा है. लोककथाओं के अनुसार, जंगल की देवी खुद जंगल की रक्षा करती हैं और गांव के पुराने राजा विक्रमादित्य के वंशज पीढ़ियों से यह जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं.
शहरी और साइंटिफिक सोच वाला ऋषि इन मान्यताओं को सिर्फ अंधविश्वास और पुरानी सोच मानता है. लेकिन हालात तब बदल जाते हैं जब गांव का एक सांड गलती से शाम के समय देव वन में घुस जाता है. उसे बचाने के लिए ऋषि बिना सोचे-समझे मना किए गए जंगल में घुस जाता है. यहीं से फिल्म का असली सुपरनैचुरल ट्विस्ट शुरू होता है. लेकिन बदकिस्मती से, जिस प्वाइंट पर रहस्य खुल जाना चाहिए था, वहां स्क्रिप्ट और भी मुश्किल हो जाती है. राजा का गुप्त वंश, जंगल की देवी की कहानी, एक जादुई सुरक्षा कवच, ताकतवर पायल, बुरी ताकतों का साया, गांव की अंदरूनी पॉलिटिक्स और पुरखों की जमीन का झगड़ा-कहानी हर दस मिनट में एक नया एंगल जोड़ती है, लेकिन किसी भी एक पहलू को भरोसे के साथ खत्म नहीं कर पाती.
एक्टिंग
फिल्म की एक्टिंग कुछ जगहों पर बहुत मिली-जुली और निराशाजनक है. सिद्धार्थ मल्होत्रा (ऋषि) की परफॉर्मेंस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ियों में से एक है. ऋषि का किरदार एक ऐसे आदमी का है जो नास्तिक और तर्कवादी सोच से शुरू होता है, लेकिन धीरे-धीरे सुपरनैचुरल घटनाओं के सामने डर, कन्फ्यूजन और आखिर में विश्वास महसूस करता है. इस इमोशनल बदलाव को दिखाने के लिए जो बारीकी चाहिए थी, वह सिद्धार्थ के चेहरे से गायब है. पूरी फिल्म में उनके चेहरे के एक्सप्रेशन लगभग फ्लैट ही रहते हैं. उनकी डायलॉग डिलीवरी में गांव की बोली और माहौल से जुड़ने की गहराई नहीं है. डायलॉग को जीने के बजाय, वह बस रटे-रटाए तरीके से बोलते हैं. वह एक शहरी मॉडल की तरह लगते हैं जो कुछ समय के लिए शूटिंग के लिए गांव आए हैं और मिट्टी से उनका जुड़ाव महसूस नहीं होता.
तमन्ना भाटिया (ममता) स्क्रीन पर बहुत खूबसूरत और ग्रेसफुल लगती हैं. पारंपरिक भारतीय कपड़ों में उनकी सुंदरता और ग्रेस आंखों को सुकून देती है, खासकर छठ पूजा के पवित्र सीन में. हालांकि, स्क्रिप्ट उनके रोल को हीरो की पत्नी तक ही सीमित रखती है, जिससे उन्हें अपनी एक्टिंग टैलेंट दिखाने का बहुत कम मौका मिलता है. कॉमेडी के दिग्गज सुनील ग्रोवर ने मेन विलेन दीपक के रूप में एक गंभीर और बेरहम किरदार निभाने की पूरी कोशिश की है. उन्होंने अपना रोल ईमानदारी से किया है और कई सीन में डरावने भी लगे हैं. हालांकि, उनकी कॉमिक इमेज दर्शकों के मन में इतनी गहराई से बैठ गई है कि उन्हें हाथ में धारदार हथियार लेकर लात-घूंसे मारते या बेरहमी से खून-खराबा करते देखना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.
वीपी के रोल में मनीष पॉल ने कुछ जगहों पर अपने वन-लाइनर्स से लोगों को हंसाने की कोशिश की है. लेकिन सुलभा आर्या और मनीष पॉल की कॉमेडी इतनी जबरदस्ती की और बचकानी है कि हंसी लाने के बजाय सिरदर्द हो जाता है. कुछ सीन इतने अश्लील हैं कि थिएटर में बैठे दर्शक अपना सिर पीटने पर मजबूर हो जाते हैं.
डायरेक्शन
‘पंचायत’ जैसी शानदार और जमीनी सीरीज डायरेक्ट करने वाले दीपक कुमार मिश्रा से दर्शकों को बहुत उम्मीदें थीं. डायरेक्शन की बात करें तो, दीपक कुछ एरिया में अपनी छाप छोड़ते हैं- जंगल के अंदर डरावना और रहस्यमयी माहौल बनाना या TVF की सिग्नेचर कॉमेडी का टच देना. फिल्म में कुछ डायलॉग और पॉपुलर पॉप कल्चर और सीरीज के रेफरेंस हैं जो युवाओं को पसंद आ सकते हैं. शाम के बाद आंखों पर पट्टी बांधकर जंगल में जाने का रिवाज और शैतानी ताकतों का आइडिया दिलचस्प है, लेकिन जब पूरी फिल्म को एक साथ पिरोने की बात आती है, तो दीपक कुमार मिश्रा का डायरेक्शन कमजोर साबित होता है.
लॉजिक की भारी कमी: कहानी में कई बातें कॉमन सेंस के खिलाफ हैं. जैसे- पूरे गांव को पता है कि राजा विक्रमादित्य का एक वंशज गांव में रहता है, लेकिन कोई नहीं जानता कि वह कौन है. फिल्म इसका कोई ठोस या लॉजिकल एक्सप्लेनेशन नहीं देती. कहानी एक बहुत पावरफुल पायल की खोज से जुड़े एक बड़े प्लॉट के इर्द-गिर्द घूमती है. दर्शकों को उम्मीद होती है कि इतनी जरूरी दिव्य चीज किसी बहुत सीक्रेट या सुरक्षित जगह पर छिपी होगी, लेकिन फिल्म में यह एक आम जगह पर इतनी आसानी से मिल जाती है कि खोज और संघर्ष का पूरा ड्रामा बेमतलब लगता है.
क्लाइमैक्स: फिल्म का आखिरी आधा घंटा (क्लाइमैक्स) जल्दबाजी में बनाया गया है. यह न तो उम्मीद के मुताबिक रोमांच पैदा करता है और न ही कोई नयापन देता है.
सिनेमैटोग्राफी
कैमरावर्क ने देवांचल गांव की हरियाली और ‘देव वन’ के डरावने नेचर को शानदार ढंग से दिखाया है. रात के जंगल के सीन, कोहरा, घने पेड़ और आंखों पर पट्टी बांधने वाले सीन देखने में शानदार हैं. लाइटिंग और रंग फिल्म के माइथोलॉजिकल-हॉरर मूड को सपोर्ट करते हैं. दूसरे हाफ में फिल्म की एडिटिंग काफी सुस्त हो जाती है. अगर एडिटिंग टेबल पर कुछ फालतू सबप्लॉट और लंबे सीन काट दिए जाते, तो फिल्म की पेस और बेहतर हो सकती थी.
म्यूजिक
फिल्म में छठ त्योहार पर आधारित भक्ति गीत दिल को छू लेने वाले हैं और भारतीय संस्कृति की झलक दिखाते हैं. गानों में एक लोकल मिठास है जो दर्शकों को कुछ समय तक बांधे रखती है. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर सस्पेंस और हॉरर सीन में टेंशन बनाने में काफी सफल है. जब भी किरदारों का सामना देव वन की ताकतों से होता है, तो म्यूजिक माहौल में डर का एहसास कराता है. हालांकि, कॉमिक सीन में इस्तेमाल किया गया तेज BGM कभी-कभी परेशान करता है.
कमियां
- स्क्रीनप्ले: पहले हाफ के बाद, कहानी बिना दिशा के हो जाती है और एक साथ कई मोर्चों (भक्ति, हॉरर, कॉमेडी और जमीन का झगड़ा) पर भटकने लगती है.
- लीड एक्टर की कमजोर परफॉर्मेंस: सिद्धार्थ मल्होत्रा की फ्लैट एक्टिंग और लोकल बिहारी एक्सेंट या बॉडी लैंग्वेज की पूरी कमी किरदार की क्रेडिबिलिटी को कम करती है.
- फूहड़ और जबरदस्ती की कॉमेडी: मनीष पॉल और सुलभा आर्या के बीच कई कॉमिक सीन बहुत बचकाने और बोरिंग हैं.
- बिना सोचे-समझे किए गए डेवलपमेंट: रहस्यमयी चीजों का आसानी से मिलना और मेन सस्पेंस का बेतुका खुलासा स्क्रीनप्ले की लापरवाही को दिखाता है.
- ओरिजिनैलिटी की कमी: क्लाइमैक्स सेटअप और एक्शन सीक्वेंस ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों से प्रेरित लगते हैं, जिनमें ओरिजिनैलिटी की कमी है.
अंतिम फैसला
‘द वन’ एक बेहतरीन इरादे और आइडिया वाली सिनेमाई कोशिश है. छठ पूजा की भक्ति को पौराणिक कथाओं और हॉरर-कॉमेडी के साथ मिलाना एक नया एक्सपेरिमेंट था. लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट, बेमतलब के ट्विस्ट और सिद्धार्थ मल्होत्रा की फीकी परफॉर्मेंस इस कॉन्सेप्ट के असर को काफी कम कर देती है. शायद ही छठी मैया की कृपा इस फिल्म पर बरस सकती है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 2 स्टार.

