नई दिल्ली. एशियन गेम्स में भारत के लिए शूटिंग हमेशा से मेडल की बड़ी उम्मीद रही है, लेकिन नागोया में अब तक इस खेल ने निराश ही किया है. एक गोल्ड मेडल जरूर भारत की झोली में आया है, आधा इवेंट निकट चुका है पर शूटिंग का प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा. खासकर पिस्टल वर्ग ने सबसे ज्यादा निराश किया है. जिस टीम से भारत को कई पदकों की उम्मीद थी, वही अब सवालों के घेरे में है. ऊपर से मनु भाकर के मेडल से चूकने के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह की ट्रोलिंग शुरू हुई, उसने खेल भावना पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
नागोया एशियन गेम्स में भारत की शूटिंग टीम से काफी उम्मीदें थीं. भारतीय निशानेबाजों का हाल के वर्षों में शानदार प्रदर्शन रहा है और इसी वजह से शूटिंग को भारत के लिए पदक का बड़ा जरिया माना जा रहा था. लेकिन अब तक तस्वीर उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है. सबसे ज्यादा निराशा 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में हुई. भारत की स्टार निशानेबाज मनु भाकर फाइनल तक पहुंचीं, लेकिन पदक नहीं जीत सकीं. मनु पांचवें स्थान पर रहीं. इसके बाद सोशल मीडिया पर उन्हें जमकर ट्रोल किया गया. हैरानी की बात यह रही कि मनु ने मेडल नहीं जीत पाने पर मेजबान ब्रॉडकास्टर से बातचीत में माफी तक मांग ली.
मनु को माफी मांगने की जरूरत ही क्यों पड़ी?
ओलंपिक खेलों में बड़ा नाम कमाने के बाद मनु भाकर ने एशियन गेम्स के फाइनल के लिए क्वालीफाई किया. उन्होंने अपना पूरा प्रयास किया. खेल में हर खिलाड़ी का लक्ष्य पदक जीतना होता है, लेकिन हर खिलाड़ी पदक जीते, यह संभव नहीं. क्या पदक नहीं जीतने पर किसी खिलाड़ी को देश से माफी मांगनी चाहिए? मनु ने क्वालीफिकेशन में 579 का स्कोर बनाया, जो पेरिस ओलंपिक के बाद उनका इस स्पर्धा में सबसे अच्छा क्वालीफाइंग स्कोर था. वह भारत की तीसरी निशानेबाज थीं, लेकिन उन्होंने फाइनल में जगह बनाकर अपनी क्षमता दिखाई. फाइनल में भी मनु का प्रदर्शन खराब नहीं था. अपने 17वें शॉट पर उन्होंने 10.8 का स्कोर बनाया और पदक की स्थिति में पहुंच गईं. उस समय एक और शानदार शॉट उन्हें मेडल दिला सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. खेल में कई बार इतना सा अंतर ही पदक और चौथे-पांचवें स्थान के बीच फैसला करता है.इसका मतलब यह कतई नहीं कि खिलाड़ी को गालियां दी जाएं, ट्रोल किया जाए या उसके खिलाफ अपमानजनक बातें कही जाएं.
गोल्ड की तलाश जारी
मल्टी-स्पोर्ट इवेंट में सबसे बड़ी गलती यही होती है कि एक प्रदर्शन के आधार पर खिलाड़ी का फैसला सुना दिया जाता है. अभी प्रतियोगिता खत्म नहीं हुई है. मनु भाकर की 25 मीटर स्पोर्ट्स पिस्टल स्पर्धा बाकी है, जो उनकी पसंदीदा स्पर्धाओं में शामिल है. ऐसे में उनके पूरे अभियान के खत्म होने से पहले ही उन्हें कटघरे में खड़ा करना कितना सही है? आलोचना जरूर होनी चाहिए. प्रदर्शन का विश्लेषण होना चाहिए. चयन प्रक्रिया पर सवाल भी उठने चाहिए. लेकिन यह सब प्रतियोगिता खत्म होने के बाद ज्यादा बेहतर तरीके से किया जा सकता है.
सवाल मनु से नहीं, व्यवस्था से भी होने चाहिए
शूटिंग के मौजूदा प्रदर्शन के बाद सिर्फ खिलाड़ियों पर सवाल उठाना पर्याप्त नहीं होगा. ट्रायल और क्वालीफिकेशन प्रक्रिया की भी समीक्षा जरूरी है. क्या मौजूदा चयन प्रक्रिया सही तरीके से काम कर रही है? क्या टीम चयन में सुधार की जरूरत है? क्या राष्ट्रीय स्तर पर शूटिंग की तैयारी और प्रतियोगिता प्रबंधन की समीक्षा होनी चाहिए? मसलन, पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में सम्राट राणा का भारत में रह जाना और दूसरे निशानेबाजों का यहां मुकाबला करना भी सवाल खड़े करता है. ऐसे मुद्दों पर राष्ट्रीय राइफल संघ को गंभीरता से विचार करना चाहिए.
एक गोल्ड से तस्वीर नहीं बदलती
भारत के खाते में एक गोल्ड जरूर आया है, लेकिन शूटिंग जैसी मजबूत मानी जाने वाली स्पर्धा में अब तक का प्रदर्शन चिंता बढ़ाने वाला है. हालांकि अभी आधी प्रतियोगिता बाकी है और कई पदक दांव पर हैं. इसलिए फिलहाल खिलाड़ियों को सोशल मीडिया की अदालत में खड़ा करने के बजाय उनका साथ देने की जरूरत है. मनु भाकर के पास अभी एक और मौका है. 25 मीटर स्पोर्ट्स पिस्टल में वह अपनी पहचान के मुताबिक प्रदर्शन कर सकती हैं. शूटिंग टीम के पूरे अभियान के बाद समीक्षा होनी चाहिए. सवाल पूछे जाने चाहिए. चयन प्रक्रिया से लेकर तैयारी तक हर पहलू की जांच होनी चाहिए. लेकिन तब तक सोशल मीडिया के ट्रोल्स को भी थोड़ा इंतजार करना चाहिए.

