नई दिल्ली: जापान के आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 की शुरुआत 19 सितंबर से हो रही है. इस इवेंट में शामिल होने के लिए अलग-अलग देशों के 17,000 से ज्यादा एथलीट और कोचिंग स्टाफ आइची-नागोया पहुंचे हैं. 16 दिनों तक चलने वाले इस इवेंट में कुल 43 खेल प्रतियोगिताओं में एथलीट मेडल के लिए पूरा जोर लगाएंगे. इतनी बड़ी संख्या में एथलीटों के रहने से लेकर खाने-पीने तक की खास व्यवस्था की गई है.
हालांकि, खिलाड़ियों के रहने के लिए जो व्यवस्था की गई है, उसे लेकर थोड़ा असंतोष जताया गया है, लेकिन खाने-पीने के इंतजाम में कोई कमी नहीं छोड़ी गई है. यही वजह है कि एशियन गेम्स में रोजाना 60 हजार केले, एक टन चावल, दो टन चिकन, 35,000 पीस ब्रेड और 30 किलोग्राम बादाम की खपत हो रही है. एथलीटों के लिए हर दिन 450 तरह की डिशेज तैयार की जा रही हैं.
सुबह 5 बजे से शुरू हो जाता है किचन
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, आइची-नागोया में 17 हजार एथलीटों के लिए रोजाना 450 डिशेज परोसी जाएंगी. ग्लोबल हॉस्पिटैलिटी ग्रुप के संस्थापक पीटर राइट ने बातचीत में बताया कि एशियन गेम्स में भोजन का प्रबंध करना केवल प्लेट में खाना परोसने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक विशाल फूड सिस्टम चलाने जैसा है, जो तड़के सुबह से शुरू होकर देर रात 1 बजे तक चलता है.
25 देशों के 80 शेफ दिन-रात बना रहे हैं खाना
आइची-नागोया एशियन गेम्स के लिए राइट और उनकी टीम के तहत किचन में 25 देशों के 80 शेफ काम कर रहे हैं. इस पूरे ऑपरेशन में लगभग 200 कर्मचारी शामिल हैं. मेन्यू दिन में चार बार बदलता है, जिसमें नाश्ता, दोपहर का लंच, रात का खाना और देर रात का हल्का खाना (सपर). पहली शिफ्ट का खाना सुबह 5 बजे तैयार होकर निकल जाता है.
एक साथ हजारों लोगों के लिए खाना तैयार करने को लेकर राइट कहते हैं, “मान लीजिए, मैं एक युवा एथलीट हूं. यह मेरी पहली विदेश यात्रा है और मैं जापान जा रहा हूं… लेकिन जब मैं यहां पहुंचता हूं, तो मुझे वही स्वाद चाहिए जो मेरे गांव या जो मैं लोकल फूड खाना पसंद करता हूं, या जो मेरा कोच खाने को कहता है, या जो मेरी मां बनाती हैं. इसलिए खिलाड़ी वही खाना तलाशते हैं जिसके बारे में वह जानते हैं और हमारी कोशिश हर एथलीट को उसकी पसंद का खाना देने की है.”
खाने में धार्मिक मान्यताओं को भी रखा जा रहा है ध्यान
इसका मतलब यह है कि जापानी जमीन पर होने के बावजूद डाइनिंग हॉल में केवल सुशी और साशिमी ही नहीं मिलेगा. यहां चीनी, कोरियाई, थाई, मलेशियन, मिडिल ईस्टर्न और भारतीय खाना भी मौजूद हैं, जिनमें रोगन जोश, दाल, करी, चटनी, नान और बिरयानी शामिल हैं. इसके अलावा विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और खान-पान से जुड़ी चीजों का भी ध्यान रखा जा रहा है, जैसे कि हलाल और झटका मीट.
सोया सॉस के लिए भी दिए गए हैं अलग-अलग विकल्प
राइट कहते हैं, “कोरियाई शेफ को कोरियाई सोया सॉस चाहिए, जापानी शेफ को जापानी और चीनी शेफ को चीनी सोया सॉस.” हॉस्पिटैलिटी के क्षेत्र में 40 से अधिक साल बिता चुके राइट सिडनी, बीजिंग और रियो ओलंपिक के अलावा वैंकूवर विंटर ओलंपिक और दो कॉमनवेल्थ गेम्स में कैटरिंग का जिम्मा संभाल चुके हैं. वे आगे कहते हैं, “आप केवल एक तरह का सोया सॉस रखकर यह नहीं कह सकते कि सभी को इसी से काम चलाना होगा. ऐसा करने पर शेफ आपस में लड़ पड़ेंगे.”
भारतीय और पाकिस्तानियों के लिए अलग-अलग बिरयानी
यही बात बिरयानी पर भी लागू होती है. राइट 1992 के एक वाक्ये को याद करते हुए बताया कि जब मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच वर्ल्ड कप का फाइनल मैच था तो पाकिस्तानी टीम के मैनेजर ने मैच के दिन बिरयानी की मांग की और पूछा, “क्या तुम जानते हो यह क्या होती है?” दरअसल राइट को बिरयानी के बारे में नहीं पता था, लेकिन उन्होंने फिर भी कहा, “हां मुझे पता है, कोई दिक्कत नहीं होगी. आपको बिरयानी मिल जाएगी. उस समय मैं युवा शेफ था और मुझमें अहंकार भी था, जबकि असलियत में मैंने तब तक बिरयानी का नाम भी नहीं सुना था.”
उस दौर में इंटरनेट की सुविधा भी नहीं थी, इसलिए राइट अपनी किचन टीम के एक भारतीय सदस्य के पास गए. उसकी मां MCG आईं और उन्होंने शेफ्स को यह डिश बनाना सिखाया, जिसके बाद इसे पाकिस्तानी टीम को परोसा गया. मैच के बाद राइट ने मैनेजर से खाने का फीडबैक मांगा. मैनेजर ने कहा, “हां, खाना ठीक-ठाक था, लेकिन यह पाकिस्तानी बिरयानी नहीं, बल्कि भारतीय बिरयानी थी.” इस पर राइट ने हैरानी जताते हुए कहा, “आप क्या कह रहे हैं? दोनों एक ही चीज तो हैं!” मैनेजर ने साफ जवाब दिया, “नहीं, दोनों बिल्कुल अलग हैं.” राइट कहते हैं, “वह मेरे लिए एक बड़ा सबक था. मुझे पहले नहीं पता था कि दोनों में कोई फर्क होता है, लेकिन उस दिन मुझे ऑथेंटिसिटी की अहमियत समझ आई.”

