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Ghaziabad ki local news : गाजियाबाद में अब पुराने धार्मिक कपड़े कूड़े या नदियों में नहीं फेंके जाएंगे. इन कपड़ों से सुंदर पोटलियां बनाई जा रही हैं. इससे 35 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिला है. इस काम में साथी फाउंडेशन की संस्थापक काजल छिब्बर की गाजियाबाद नगर निगम भी मदद कर रहा है. लोकल 18 से काजल बताती हैं कि नगर निगम की मदद से शहर के कई मंदिरों में ऐसी व्यवस्था की गई है, जहां श्रद्धालु भगवान की पुरानी पोशाक और पूजा-पाठ से जुड़े कपड़े जमा कर सकते हैं. इन कपड़ों को संस्था तक पहुंचाया जाता है. इन पोटलियों का इस्तेमाल पूजा की किताबें, भगवान के छोटे वस्त्र और पूजा-पाठ से जुड़ी दूसरी सामग्री रखने के लिए किया जा सकता है.
गाजियाबाद. यूपी के गाजियाबाद में पूजा-पाठ और भगवान की पोशाकों से जुड़े पुराने कपड़ों को अब कूड़े या नदियों में जाने से बचाकर दोबारा उपयोग में लाने की अनोखी पहल शुरू हुई है. जिस कपड़े को लोग धार्मिक आस्था से जुड़ा होने के बावजूद इस्तेमाल के बाद कहीं भी छोड़ देते हैं, उसी से अब सुंदर और उपयोगी पोटलियां तैयार की जा रही हैं. साथी फाउंडेशन की संस्थापक काजल छिब्बर की इस पहल को गाजियाबाद नगर निगम का भी सहयोग मिल रहा है. इस काम के जरिए 35 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है. काजल कुछ समय पहले अपने परिवार के साथ गंगा स्नान के लिए गई थीं. वहां उन्होंने देखा कि पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाले कपड़े और भगवान की पुरानी पोशाकें नदी किनारे पड़ी थीं और कई कपड़े लोगों के पैरों के नीचे आ रहे थे. धार्मिक आस्था से जुड़े कपड़ों की ऐसी स्थिति देखकर उन्हें काफी दुख हुआ. यहीं से उनके मन में इन कपड़ों को दोबारा उपयोगी बनाने का विचार आया.
सबसे पहले ये काम
लोकल 18 से काजल बताती हैं कि उन्होंने सोचा अगर इन कपड़ों से ऐसी चीज तैयार की जाए जो लोगों के रोजमर्रा के काम आ सके तो एक साथ कई समस्याओं का समाधान हो सकता है. इससे धार्मिक कपड़े कूड़े में जाने और पैरों के नीचे आने से बचेंगे, साथ ही उनका सम्मानजनक तरीके से दोबारा इस्तेमाल भी हो सकेगा. इसी सोच के साथ उन्होंने गाजियाबाद नगर निगम के सामने प्रस्ताव रखा और मंदिरों से भी संपर्क किया. अब नगर निगम की मदद से शहर के कई मंदिरों में ऐसी व्यवस्था की गई है, जहां श्रद्धालु भगवान की पुरानी पोशाक और पूजा-पाठ से जुड़े कपड़े जमा कर सकते हैं. मंदिरों से एकत्र किए गए इन कपड़ों को संस्था तक पहुंचाया जाता है. इसके बाद इन्हें सीधे पोटली बनाने में इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि सबसे पहले अच्छी तरह साफ किया जाता है. लंबे समय से रखे कपड़े और पोशाकें अक्सर गंदी होती हैं इसलिए उन्हें धोकर सुखाया जाता है. इसके बाद कपड़ों की कटिंग होती है और सिलाई के जरिए इन्हें पोटली का आकार दिया जाता है.
कहां इनका इस्तेमाल
तैयार होने के बाद इन पोटलियों को फिलहाल मंदिरों को निशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है. इनका इस्तेमाल पूजा की किताबें, भगवान के छोटे वस्त्र और पूजा-पाठ से जुड़ी दूसरी सामग्री रखने के लिए किया जा सकता है. आने वाले समय में संस्था इन्हें आम लोगों तक भी पहुंचाने की योजना बना रही है ताकि लोग बाजार से नई पोटली खरीदने के बजाय इन पुन: उपयोग किए गए धार्मिक कपड़ों से बनी पोटली का इस्तेमाल कर सकें.
आप क्या करें
काजल का कहना है कि यह पहल केवल पुराने कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं है. इसके जरिए धार्मिक आस्था से जुड़े वस्त्रों का सम्मान बनाए रखने, नदियों और पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने और महिलाओं को रोजगार देने की कोशिश की जा रही है. इस संस्था में 35 से अधिक महिलाएं पोटली तैयार करने के काम से जुड़ी हैं. संस्था और नगर निगम की ओर से लोगों से भी अपील की जा रही है कि भगवान की पुरानी पोशाक या पूजा-पाठ से जुड़े कपड़ों को कूड़े में न डालें और न ही नदियों में प्रवाहित करें. ऐसे कपड़ों को नजदीकी मंदिर में जमा किया जा सकता है ताकि उन्हें सम्मान के साथ नया उपयोग मिल सके.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…
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