Success Story, National Engineer’s Day 2026: किसी विमान के उड़ान भरने के बाद उसे आसमान में देखते हुए शायद ही कोई यह सोचता है कि इसके पीछे कितने लोगों की मेहनत छिपी है. यात्रियों की नजर पायलट और केबिन क्रू पर रहती है, लेकिन जमीन पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके हाथों से गुजरने के बाद ही कोई विमान आसमान की ओर बढ़ता है. वे हर बोल्ट जांचते हैं.हर वायरिंग को परखते हैं.खराबी को ढूंढते हैं.तकनीकी दस्तावेजों को मिलाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि विमान उड़ान के लिए पूरी तरह सुरक्षित है.
ऐसी ही एक कहानी झारखंड के बोकारो स्टील सिटी की कुमार पल्लवी की है.2018 में ट्रैनी टेक्निशियन के तौर पर शुरू हुआ उनका सफर उस दिन एक बड़े मुकाम पर पहुंचा जब उन्होंने तीन स्ट्राइप वाली नई यूनिफॉर्म पहनी एयरक्राफट मेंटीनेंस इंजीनियर का लाइसेंस हाथ में लिया और पहली बार विमान को उड़ान के लिए रिलीज किया. उस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने ड्यूटी के बाद भी घंटों काम सीखा.नींद छोड़कर परीक्षाओं की तैयारी की और एक नहीं,कई चुनौतियों का सामना किया
लेकिन पल्लवी अकेली नहीं हैं.आज नेशनल इंजीनियर्स डे पर एविएशन सेक्टर से जुड़ी ऐसी चार कहानियां बताते हैं जिनमें किसी ने बचपन के सपने को हकीकत में बदला, किसी ने शिक्षा के लिए लोन लेकर करियर शुरू किया, किसी ने महिलाओं के लिए मुश्किल माने जाने वाले क्षेत्र में अपनी जगह बनाई और किसी ने 17 साल के सफर में नई मिसाल कायम की.
तीसरी कोशिश में हासिल किया सपना
कुमार पल्लवी की कहानी उस सपने की है जिसे पूरा होने में सालों लग सकते हैं लेकिन अगर कोशिश जारी रहे तो एक दिन वह सपना आंखों के सामने सच भी हो जाता है.झारखंड के बोकारो स्टील सिटी से आने वाली पल्लवी ने 2018 में IndiGo में ट्रैनी टेक्निशियन के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी. बचपन से ही उन्हें एयरक्राफट को लेकर जिज्ञासा थी. आसमान में उड़ते विमानों को लेकर उनकी दिलचस्पी धीरे-धीरे जुनून में बदल गई और इसी ने उन्हें एविएशन की दुनिया तक पहुंचाया लेकिन यहां की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखती है पल्लवी का शुरुआती काम उतना ही मेहनत भरा था. लंबी शिफ्ट में काम करना, बदलते मौसम के बीच एयरक्राफट के नीचे जाकर काम करना और तंग एविवोनिक्स बेज (avionics bays)में घुसकर तकनीकी जांच करना उनके रोजमर्रा के काम का हिस्सा था.यात्री विमान को देखकर उसकी खूबसूरती और उड़ान पर ध्यान देते हैं लेकिन विमान के नीचे काम करने वाले इन तकनीकी कर्मचारियों की मेहनत अक्सर किसी को दिखाई नहीं देती. पल्लवी भी इसी अनदेखी मेहनत का हिस्सा थीं. मगर उनके मन में एक लक्ष्य साफ था.उन्हें एयरक्राफट मेंटीनेंस इंजीनियर बनना था.
नींद छोड़कर पढ़ती थीं
पल्लवी के लिए सिर्फ नौकरी करना काफी नहीं था. जब दूसरे लोग ड्यूटी खत्म होने के बाद घर लौट जाते तब वह कई बार खुद रुककर लाइसेंसड इंजीनियर्स को काम करते हुए देखती थीं.वह यह समझने की कोशिश करतीं कि जटिल तकनीकी खराबियों को कैसे खोजा और ठीक किया जाता है.वह वायरिंग डाइग्राम्स (wiring diagrams)पढ़तीं, वरिष्ठ इंजीनियरों से सीखतीं और अपनी परीक्षा की तैयारी करतीं. कई बार उन्होंने अपनी नींद तक से समझौता किया. उनके लिए यह मेहनत सिर्फ नौकरी में आगे बढ़ने की कोशिश नहीं थी बल्कि उस सपने की तैयारी थी जिसे उन्होंने काफी पहले देख लिया था.रास्ते में मुश्किलें भी कम नहीं थीं.इंटरनल जॉब पोस्टिंग के मौकों में भी काफी चुनौतियां थीं.
तीसरी कोशिश में मिली कामयाबी
लगातार कोशिशों के बाद तीसरी कोशिश में पल्लवी ने वह अवसर हासिल कर लिया जिसका उन्हें लंबे समय से इंतजार था.वह दिन उनके लिए बेहद खास था जब उन्होंने नई यूनिफॉर्म पहनी. उस यूनिफॉर्म पर तीन स्ट्राइप थीं और उनके हाथ में एयरक्राफट मेंटेनेंस इंजीनियर का लाइसेंस था. यह सिर्फ एक नई यूनिफॉर्म या नई जिम्मेदारी नहीं थी. इसके पीछे उनकी अनगिनत रातें, मेहनत, त्याग और खुद पर भरोसा छिपा था.जब उन्होंने पहली बार एयरक्राफट रिलीज पर अपना सिग्नेचर किया और उसके बाद विमान को टैक्सी करते हुए देखा फिर उसे आसमान में उड़ते देखा तो वह उनके लिए एक ऐसी जीत थी जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं.
छत से विमान देखती थीं श्रेया
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में एक बच्ची अपने घर की छत से आसमान में उड़ते विमानों को देखा करती थी. उस समय शायद उसे यह अंदाजा नहीं था कि एक दिन उसका यही आकर्षण उसके करियर की दिशा तय करेगा.यह कहानी है श्रेया तिवारी की जो आज इंडिगो में एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर है. बचपन में विमानों को आसमान में उड़ते देखना उनके लिए सिर्फ कौतूहल नहीं रहा. धीरे-धीरे यह एक स्पष्ट सपना बन गया कि वह एविएशन की दुनिया का हिस्सा बनेंगी और जिन विमानों में लोग सफर करते हैं उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में अपनी भूमिका निभाएंगी. एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियरिंग की ट्रेनिंग लखनउ एयरोनॉटिकल ट्रेनिंग इंस्टीटयूट से पूरी करने के बाद श्रेया ने जनवरी 2023 में इंडिगो में एसोसिएट टेक्निशियन के तौर पर करियर शुरू किया.श्रेया जिस क्षेत्र में आईं उसे अक्सर पुरुषों के दबदबे वाला क्षेत्र माना जाता रहा है. उन्हें भी यह सुनने को मिला कि एविएशन मेंटेनेंस महिलाओं के लिए बहुत कठिन है लेकिन उन्होंने इन धारणाओं को अपने रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया.आज जब उनके सामने से एयक्राफट उड़ान भरते हैं तो यह सिर्फ एक नौकरी का मुकाम नहीं है. यह उस लड़की के बचपन के सपने का पूरा होना है जो कभी आजमगढ़ की छत से आसमान में उड़ते विमानों को देखा करती थी.
एजुकेशन लोन लेकर किया कोर्स
राजन गुप्ता की कहानी एक अलग तरह का संघर्ष दिखाती है. हर किसी को करियर की शुरुआत में बड़े संसाधन नहीं मिलते, लेकिन आगे बढ़ने की इच्छा रास्ता जरूर खोज सकती है.एक साधारण परिवार में पले-बढ़े राजन ने कम उम्र में ही मेहनत और धैर्य का महत्व समझ लिया था.एविएशन में करियर बनाने का फैसला करने के बाद उन्होंने एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन लिया.यही फैसला उनके करियर की नींव बना.2011 में उन्होंने इंडिगो में ट्रैनी के तौर पर काम शुरू किया. शुरुआत से ही उन्होंने मिलने वाले हर अवसर को सीखने और आगे बढ़ने के मौके की तरह लिया.उन्होंने ट्रैनी से एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर तक का सफर तय किया.
ट्रैनी से पहली महिला लाइसेंस्ड इंजीनियर
कुछ लोग सिर्फ अपना करियर नहीं बनाते वे अपने पीछे आने वालों के लिए रास्ता भी तैयार करते हैं. गुंजन भटनागर की कहानी ऐसी ही है.एविएशन के प्रति शुरुआती लगाव के साथ उन्होंने इंडिगो में अपना सफर शुरू किया. करीब 17 साल के इस लंबे सफर में उन्होंने ट्रैनी से आगे बढ़ते हुए इंडिगो की पहली महिला लाइसेंस्ड एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर बनने का मुकाम हासिल किया.जब उन्होंने एविएशन मेंटेनेंस में कदम रखा था तब इस क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बहुत कम थी. ऐसे माहौल में अपनी जगह बनाना चुनौतीपूर्ण था लेकिन गुंजन ने लगातार सीखने की अपनी क्षमता के दम पर धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई.अपने लंबे करियर में गुंजन ने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.
