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कौन हैं अस्मिता डे… जो कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारत की पहली जूडोका बनीं, कभी एथलेटिक्स में बहाती थीं पसीना

Admin by Admin
September 14, 2026
in खेल
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कौन हैं अस्मिता डे… जो कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारत की पहली जूडोका बनीं, कभी एथलेटिक्स में बहाती थीं पसीना


Last Updated:July 31, 2026, 22:28 IST

Who is Asmita Dey: 23 वर्षीय जूडोका अस्मिता डे ने महिला 48 किग्रा वर्ग के फाइनल में कनाडा की हेइडी क्वैच को हराकर कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक अपने नाम किया. त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता ने अपने करियर की शुरुआत 800 मीटर धावक के रूप में की थी. ट्रायल के दौरान जूडो में आईं अस्मिता ने भोपाल साई सेंटर में कोच यशपाल सोलंकी से कोचिंग ली.

कौन हैं जूडो में भारत को पहला गोल्ड दिलाने वाली अस्मिता डे? Zoom

अस्मिता त्रिपुरा की रहने वाली हैं जिन्होंने देश को जूडो में पहला गोल्ड दिलाया.

नई दिल्ली. ग्लासगो के इंडोर एरीना में सन्नाटा पसरा हुआ था और मैट पर दो खिलाड़ियों के बीच सांसें थाम देने वाली जंग चल रही थी. कॉमनवेल्थ गेम्स के महिला 48 किग्रा वर्ग के फाइनल मुकाबले में भारत की 23 वर्षीय अस्मिता डे और कनाडा की हेइडी क्वैच आमने-सामने थीं. मुकाबला ‘गोल्डन स्कोर’ तक पहुंच चुका था, जहां एक गलती भी स्वर्ण पदक के सपने को चकनाचूर कर सकती थी. लेकिन दबाव के इन लम्हों में अस्मिता ने धैर्य और जुझारूपन का अद्भुत परिचय दिया. उन्होंने निर्णायक दांव लगाते हुए 2-1 से ‘युको’ (Yuko) अंक हासिल किया और जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया. इस रोमांचक जीत के साथ अस्मिता डे कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को जूडो का पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाली एथलीट बन गईं. लेकिन ग्लासगो की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे वर्षों की कड़ी मेहनत, त्याग और अपने खेल को बदलने का एक अनूठा सफर छिपा है. आइए जानते हैं कौन हैं भारत की यह नई ‘गोल्डन गर्ल’.

अस्मिता डे (Asmita Dey) मूल रूप से त्रिपुरा के दक्षिण त्रिपुरा जिले के एक छोटे से कस्बे बेलोनिया की रहने वाली हैं. जब उन्होंने खेल की दुनिया में पहला कदम रखा था, तब उनका सपना जूडो मैट पर दांव-पेच आजमाना बिल्कुल नहीं था. अस्मिता एक 800 मीटर की धावक के रूप में ट्रैक पर पसीना बहाया करती थीं. उनकी जिंदगी में नया मोड़ तब आया जब उन्होंने अपने जिले में आयोजित एक ट्रायल में भाग लिया. वहां प्रशिक्षकों ने उनके लचीलेपन, ताकत और फुर्ती को पहचाना और उन्हें एथलेटिक्स से जूडो में स्विच करने की सलाह दी. यह फैसला अस्मिता के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. त्रिपुरा की पगडंडियों से शुरू हुआ यह सफर जल्द ही भारतीय जूडो के सबसे बड़े मंच की ओर बढ़ चला.

साई के विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में चयन
अस्मिता की असाधारण प्रतिभा को पहचानते हुए भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) ने उन्हें अपने विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल कर लिया. इसके बाद उनके खेल को और निखारने के लिए उन्हें खेल मंत्रालय की महत्वाकांक्षी योजना ‘टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम’ (TOPS) के डेवलपमेंट ग्रुप में जगह दी गई. अस्मिता भोपाल स्थित साई रीजनल सेंटर में दिग्गज जूडो कोच यशपाल सोलंकी के मार्गदर्शन में अपनी तकनीकों को तराशने लगीं. कोच सोलंकी के तहत की गई कठोर ट्रेनिंग ने अस्मिता को न केवल शारीरिक रूप से मजबूत बनाया, बल्कि बड़े मुकाबलों के मानसिक दबाव को झेलने की क्षमता भी दी.

घरेलू स्तर पर दिखाया दबदबा
घरेलू स्तर पर अस्मिता ने बहुत जल्द ही अपनी धाक जमा ली. उन्होंने जूनियर नेशनल चैंपियनशिप (2023-24) का खिताब अपने नाम किया और खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में एक से अधिक बार स्वर्ण पदक जीतकर खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्मिता की पहली बड़ी गूंज 2023 में सुनाई दी, जब उन्होंने मकाऊ में आयोजित जूनियर एशिया कप में महिला 48 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीता. इसी साल उन्होंने कुवैत में हुए एशियन ओपन में रजत पदक पर कब्जा जमाया.

कैसाब्लांका अफ्रीकन ओपन में पहला बड़ा सीनियर खिताब
उनकी सफलता का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा. साल 2025 में मोरक्को में आयोजित कैसाब्लांका अफ्रीकन ओपन में अस्मिता ने अपने करियर का पहला बड़ा सीनियर अंतरराष्ट्रीय खिताब जीतते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया. 2026 की शुरुआत भी उनके लिए शानदार रही, जहां उन्होंने एशियन सीनियर चैंपियनशिप में एशिया की दिग्गज जूडोकाओं को कड़ी टक्कर दी और पांचवां स्थान हासिल किया.

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के फाइनल में कड़ा मुकाबला
इन सभी सफलताओं के बाद आया राष्ट्रमंडल खेल 2026, जहां अस्मिता ने इतिहास की किताबों में अपना नाम दर्ज कराया. ग्लासगो में महिला 48 किग्रा के फाइनल में उनका मुकाबला कनाडा की अनुभवी खिलाड़ी हेइडी क्वैच से था. मैच की शुरुआत बेहद कठिन रही. दोनों खिलाड़ी एक-दूसरे को मैट के किनारे धकेलने और दबाव बनाने की कोशिश कर रही थीं. मैच के मध्य में कनाडाई खिलाड़ी क्वैच ने अस्मिता पर एक सफल थ्रो का इस्तेमाल करते हुए शुरुआती बढ़त हासिल कर ली. एक समय ऐसा लग रहा था कि स्वर्ण पदक हाथ से निकल जाएगा, लेकिन अस्मिता ने हिम्मत नहीं हारी.

‘गोल्डन स्कोर’ में रचा ऐतिहासिक स्वर्ण पदक का इतिहास
अस्मिता ने आक्रामक और संयमित खेल का प्रदर्शन करते हुए शानदार वापसी की और स्कोर बराबर कर दिया. निर्धारित समय खत्म होने के बाद मुकाबला ‘गोल्डन स्कोर’ में चला गया. यहां अस्मिता की शारीरिक फिटनेस और मानसिक दृढता रंग लाई. उन्होंने बेहतरीन रणनीति के साथ दांव लगाया और 2-1 से जीत हासिल कर भारत को जूडो में पहला ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिला दिया.

भारतीय एथलीटों के लिए प्रेरणा बनीं अस्मिता डे
एक 800 मीटर की धावक से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन बनने तक का अस्मिता डे का यह सफर भारत के उभरते एथलीटों के लिए प्रेरणा का एक बेमिसाल स्रोत बन चुका है.

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Kamlesh Raiचीफ सब एडिटर

कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…

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