• Home
  • Privacy Policy
Sonebhadra Live
No Result
View All Result
No Result
View All Result
Sonebhadra Live
No Result
View All Result

कौन हैं हर्ष सिंह? जो ओलंपियन को चित कर कॉमनवेल्थ गेम्स में बने भारत के ‘गोल्डन बॉय’, 41 सेकेंड में बदल दिया जूडो का इतिहास

Admin by Admin
September 14, 2026
in खेल
0
कौन हैं हर्ष सिंह? जो ओलंपियन को चित कर कॉमनवेल्थ गेम्स में बने भारत के ‘गोल्डन बॉय’, 41 सेकेंड में बदल दिया जूडो का इतिहास


Last Updated:July 31, 2026, 22:56 IST

Who is Harsh singh: 23 वर्षीय हर्ष सिंह ने कॉमनवेल्थ गेम्स में इतिहास रचते हुए पुरुषों की 60 किग्रा जूडो स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम किया. उन्होंने फाइनल मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी ओलिंपियन जोशुआ कात्ज़ को हराकर भारत को राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास का पहला पुरुष जूडो गोल्ड दिलाया. मैच खत्म होने से ठीक 41 सेकेंड पहले हर्ष के सटीक स्पेशल दांव ने जीत तय की. अस्मिता डे के स्वर्ण के बाद हर्ष की इस उपलब्धि ने भारत को जूडो में पहला ऐतिहासिक डबल गोल्ड दिलाया.

कौन हैं हर्ष सिंह? जिन्होंने 41 सेकेंड में बदल दिया भारतीय जूडो का इतिहास Zoom

हर्ष सिंह कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में गोल्ड जीतने वाले भारत के पहले पुरुष जूडोका बने.

नई दिल्ली. ग्लासगो की धरती पर जब कॉमनवेल्थ गेम्स की मैट बिछी, तो किसी ने नहीं सोचा था कि भारतीय जूडो दल एक ऐसा इतिहास रचने जा रहा है जो देश के खेल पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो जाएगा. इस ऐतिहासिक कहानी के सबसे बड़े नायक बनकर उभरे 23 वर्षीय हर्ष सिंह. हर्ष ने पुरुषों की 60 किलोग्राम श्रेणी के फाइनल मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज और अनुभवी जुडोका जोशुआ कात्ज़ को मात देकर भारत को राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास का पहला पुरुष जूडो स्वर्ण पदक दिलाया. पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रहे हर्ष ने न केवल अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, बल्कि वैश्विक मंच पर भारतीय जूडो की धमक भी जमा दी.

दिल्ली के हर्ष सिंह (Harsh Singh) लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय जूडो महासंघ (IJF) के सर्किट में एक जाना-माना नाम रहे हैं. 60 किलोग्राम भारवर्ग में भारत के सबसे होनहार खिलाड़ियों में शुमार हर्ष ने राष्ट्रमंडल खेलों से पहले कई प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम और ग्रैंड प्रिक्स प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व किया था. दुनिया के शीर्ष क्रम के खिलाड़ियों के खिलाफ लगातार खेलने से मिले अनुभव और उनके अनुशासन ने उन्हें 2026 के ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भारतीय टीम में जगह दिलाई. हालांकि, उनका असली इम्तिहान ग्लासगो के उस फाइनल मुकाबले में होना था, जहां सामने एक दिग्गज प्रतिद्वंद्वी खड़ा था.

दिग्गज ऑस्ट्रेलियाई ओलंपियन की चुनौती
फाइनल मुकाबला किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं था. हर्ष का सामना ऑस्ट्रेलिया के ओलिंपियन जोशुआ कात्ज़ से था, जिन्हें इस स्पर्धा में स्वर्ण का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था. कात्ज़ का जूडो करियर काफी शानदार रहा है; वे कई बार के ओशिनिया चैंपियन, ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय चैंपियन और 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों के कांस्य पदक विजेता रहे हैं. इसके अलावा कात्ज़ एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसकी रगों में जूडो दौड़ता है. उनके माता-पिता दोनों पूर्व जुडोका रह चुके हैं और उनके पिता खुद ओलिंपिक खेलों में ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय कोच की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.

आखिरी 41 सेकेंड का रोमांचक दांव
ऐसे मजबूत पृष्ठभूमि वाले प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ मुकाबला बेहद तनावपूर्ण था. चार मिनट के इस मुकाबले में दोनों ही खिलाड़ी एक-दूसरे की रणनीति को भांपते हुए सतर्कता से दांव-पेच लगा रहे थे. समय तेजी से बीत रहा था और स्कोरबोर्ड पर दोनों बराबरी पर थे. मैच खत्म होने में जब महज 41 सेकेंड का वक्त बचा था, तब हर्ष ने अपने करियर का सबसे सटीक और साहसी दांव खेला. उन्होंने विपक्षी खिलाड़ी की मामूली सी चूक का फायदा उठाते हुए एक शानदार ‘वाजा-अरी’ (Waza-ari) हासिल किया, जो जूडो में दूसरी सबसे बड़ी स्कोरिंग तकनीक मानी जाती है. एक बार बढ़त बनाने के बाद हर्ष ने बाकी बचे समय में बेहद संयमित और अभेद्य रक्षात्मक खेल दिखाया और मैच समाप्त होते ही स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया.

हर्ष सिंह ने भारत को जूडो में दूसरा गोल्ड मेडल दिलाया.

भारतीय जूडो के लिए युगांतरकारी क्षण
यह जीत केवल हर्ष के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय जूडो के लिए एक युगांतरकारी क्षण साबित हुई. उसी दिन हर्ष से कुछ ही समय पहले अस्मिता डे ने महिलाओं की 48 किलोग्राम श्रेणी में भारत को जूडो में पहला स्वर्ण पदक दिलाया था. इसके तुरंत बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के वर्ग में वही कारनामा दोहरा दिया. राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में यह पहला मौका था जब भारत ने जूडो में एक ही दिन में दो स्वर्ण पदक जीते हों.

आने वाली पीढ़ियों के लिए नई प्रेरणा
23 साल की कम उम्र में अपनी पहली ही राष्ट्रमंडल खेल उपस्थिति को स्वर्ण में बदलकर हर्ष सिंह ने साबित कर दिया कि भारतीय खिलाड़ी अब केवल भागीदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को हराकर इतिहास रचने का जज्बा रखते हैं. ग्लासगो में गूंजा भारत का राष्ट्रगान और हर्ष के गले में चमकता वह ऐतिहासिक स्वर्ण पदक आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई प्रेरणा बन चुका है.

About the Author

authorimg

Kamlesh Raiचीफ सब एडिटर

कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…

और पढ़ें

Location :

New Delhi,Delhi



Source link

Previous Post

अमिताभ बच्चन के साथ क्यों अधूरी रह गई फिल्म? सुभाष घई ने कर दिया खुलासा, एक्टर न बन पाने का क्या होता है मलाल

Next Post

कौन हैं जस्टिस गौतम चौधरी, जिन्होंने हिंदी में 38,600 से ज्यादा फैसले सुनाने का बनाया रिकॉर्ड

Next Post
कौन हैं जस्टिस गौतम चौधरी, जिन्होंने हिंदी में 38,600 से ज्यादा फैसले सुनाने का बनाया रिकॉर्ड

कौन हैं जस्टिस गौतम चौधरी, जिन्होंने हिंदी में 38,600 से ज्यादा फैसले सुनाने का बनाया रिकॉर्ड

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

  • Home
  • Privacy Policy

© 2026 JNews - Premium WordPress news & magazine theme by Jegtheme.

No Result
View All Result
  • Home
  • Privacy Policy

© 2026 JNews - Premium WordPress news & magazine theme by Jegtheme.