लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का एक बार फिर से गठबंधन में लड़ना तय माना जा रहा है. लेकिन उससे पहले यूपी कांग्रेस के भीतर अंदरुनी झगड़े की भी बातें सामने आ रही है. भले ही यूपी जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस का संगठन बढ़ने के बजाय लगातार कमजोर ही होता जा रहा है, लेकिन उनके जितने भी नेता हैं वो आपस में झगड़ने से बाज नहीं आते हैं.
उदाहरण के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में सीट शेयरिंग के मुद्दे को ही ले लें. कांग्रेस की जमीनी हकीकत को देखते हुए सपा उन्हें 70-75 सीटें ऑफर कर रही हैं. उधर, कांग्रेस की तरफ से प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम, प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद अपने स्तर से हर रोज नई-नई दावेदारी कर रहे हैं. जबकि ये बात तय है कि यूपी में सीट शेयरिंग को लेकर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी व प्रियंका गांधी को ही आखिरी फैसला लेना है. सपा की ओर से कई बार आपत्ति जताए जाने के बाद भी यूपी कांग्रेस के ये बड़े नेता सहयोगी दलों को निशाने पर लेने से बाज नहीं आ रहे हैं.
सहयोगी से लड़ते-लड़ते आपस में भी टकरा रहे कांग्रेसी
यूपी को लेकर राजेंद्र पाल गौतम का क्या है प्लान?
बताया जाता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून (LL.B.) की पढ़ाई कर चुके राजेंद्र पाल गौतम पेशे से वकील हैं. आम आदमी पार्टी के टिकट पर दिल्ली सीमापुरी सीट से विधायकी जीतकर राजनीतिक पारी शुरू करने वाले गौतम को कांग्रेस में अनुसूचित जाति (SC) विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया। उसके बाद उन्हें यूपी चुनाव में प्रभारी बनाया गया है. गौतम के लिए कहा जाता है कि जब से वह कांग्रेस में आए हैं तब से वह पार्टी की छवि एक नई राजनीतिक समीकरण के लिए बनाना चाहते हैं. उनका मानना है कि यूपी में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और मायावती के कमजोर होने से बड़ा राजनीतिक स्पेस बना है. वो चाहते हैं कि मायावती की कमजोरी से बनी जगह में कांग्रेस अपने आप को फीट करे.
यूपी की राजनीति में लंबे समय तक मायावती के साथ करीब 30 से 32 फीसदी वोट हमेशा से रहे हैं. इसमें ज्यादातर वोट दलितों और मुस्लिमों के रहे हैं. हालांकि 2014 के बाद मायावती की सक्रियता कम होने के चलते 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का वोट बैंक नौ फीसदी पर आकर सिमट गया है. वहीं 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने अकेले पूरी ताकत झोंककर भी महज 2.33 फीसदी वोट हासिल कर पाई थी.
ऐसे में राजेंद्र पाल गौतम चाहते हैं कि मायावती से दूर हुए करीब 20-21 फीसदी वोटर कांग्रेस के साथ जोड़े जाएं. एक लाइन में बात कहूं तो राजेंद्र पाल गौतम यूपी में कांग्रेस के लिए मायावती की तरह मुस्लिम और दलितों की एकजुटता का नया समीकरण तैयार करना चाहते हैं. यहां बता दें कि देश में सामाजिक और राजनीतिक तौर पर ज्यादातर जगहों पर दलितों और मुस्लिमों को एक साथ लाना हमेशा से आसान रहा है.
शायद इसी वजह से कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी 2024 के लोकसभा चुनाव के समय से लगातार दलितों को केंद्र में रखकर राजनीति करते देखे जा रहे हैं. इन दिनों युवाओं के लिए उनकी तरफ से किए जा रहे गूंज कार्यक्रम में भी छूआछूत और भेदभाव की काफी बातें हो रही है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी में हुए कार्यक्रम के बाद कथित तौर पर शुद्धिकरण की हुई घटना को भी राहुल जोर शोर से उठा रहे हैं. यहां याद करा दें कि पिछले दिनों राजेंद्र पाल गौतम और तनुज पुनिया मायावती से मिलने के लिए उनके घर पहुंचे थे, लेकिन उन्हें घर के अंदर नहीं जाने दिया गया था. कांग्रेस के दोनों दलित नेताओं के कदम को इस रूप में देखा जा रहा है कि वह राज्य की दलित जनता को यह बताना चाह रहे हैं कि वह तो मायावती को साथ लाकर उनका सम्मान करना चाहते हैं, लेकिन वह ही बीजेपी के साथ सॉफ्ट बनी हुई हैं.
यूपी की राजनीति में क्या चाहते हैं अजय राय?
कांग्रेस की तरफ से सवर्णों को साथ लाने का प्रयास 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा. यूपी के सवर्ण वोटर बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस के साथ नहीं आए. उल्टा अमेठी सीट पर राहुल गांधी खुद चुनाव हार गए. माना जाता है कि सवर्णों को साथ लाने के इसी प्रयास के तहत अजय राय को यूपी में प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. 2014 से अजय राय लगातार वाराणसी सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव भी लड़ते रहे हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में तो उन्होंने कुछ पल के लिए पीएम मोदी को मुश्किल में ही डाल दिया था. हालांकि आखिरी समय में पीएम मोदी करीब डेढ़ लाख वोटों से जीत ही गए.
इसी वजह से अजय राय जब से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने हैं तब से वह लगातार प्रयास में हैं कि वह किसी भी तरह से सवर्ण वोटरों को बीजेपी से दूर कर कांग्रेस के साथ ला पाएं. लेकिन उनका यह प्रयास कांग्रेस को अब तक खास फायदा नहीं पहुंचा पाया है.
अजय राय और राजेंद्र पाल गौतम में क्या है झगड़ा?
इस मसले पर अजय राय का कहना है कि यह फॉर्मूला सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा पहुंचाएगा. क्योंकि 2014 से लगातार बीजेपी यह नैरेटिव बनाने के प्रयास में जुटी रहती है कि कांग्रेस और राहुल गांधी केवल मुस्लिम हितों की बात करते हैं. इसी नैरेटिव का नतीजा रहा कि हाल ही में अजय राय जब अयोध्या दौरे पर गए और वहां निषाद समाज की ओर से मछली भोज का आयोजन किया गया तो सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को लपक लिया.
सीएम योगी ने अपने मंचों से कहना शुरू किया कि राहुल गांधी और उनके कांग्रेसी नेता हिंदू विरोधी हैं. इसलिए सावन में भी अयोध्या जैसी पवित्र धरती पर आकर मछली भोज का आनंद लेकर चले गए. हालांकि इस मसले में अजय राय ने सीएम योगी के खिलाफ झूठ फैलाने और मानहानि का केस दर्ज करा दिया जिसके बाद मामला शांत हो गया है. अजय राय के इस तर्क पर राजनीति के जानकार भी मानते हैं कि अगर कांग्रेस मुस्लिम प्रदेश अध्यक्ष चुनती है तो बीजेपी इसका फायदा उठाएगी. हर स्तर पर यही फैलाया जाएगा कि राहुल गांधी को केवल मुसलमानों से प्रेम है. वैसे भी बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से देश का मुसलमान कांग्रेस की तरफ वैसे ही चला आया है. मौजूदा हालात में इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत नहीं दिखती है.
अजय राय और राजेंद्र पाल गौतम के झगड़े अखिलेश यादव किधर?
उत्तर प्रदेश में जब सपा और कांग्रेस गठबंधन में हैं तो बड़ा सवाल यह है कि राजेंद्र पाल गौतम और अजय राय के झगड़े में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव किसके साथ हैं. अगर आप यूपी की राजनीति में तनिक भी दिलचस्पी रखते हैं तो समझ में आएगा कि अखिलेश यादव कतई भी राजेंद्र पाल गौतम का साथ देते नहीं दिखेंगे. गौतम कांग्रेस में मुस्लिम प्रदेश अध्यक्ष की सलाह दे रहे हैं. अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा. इस समय यूपी में मुसलमानों का अधिकतम समर्थन सपा को मिलता है. मायावती के कमजोर होने और बीजेपी के सत्ता में होने के चलते मुसलमान एकतरफा होकर सपा उम्मीदवारों को वोट देते हैं. अगर मुस्लिम वोट कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होंगे तो गठबंधन में उनकी बार्गेनिंग पावर बढ़ जाएगी, जो कि समाजवादी पार्टी कभी नहीं चाहेगी. हर राजनीतिक पार्टी गठबंधन में हमेशा दूसरे पार्टनर को कमजोर रखे रहना चाहती है, ताकि वह अपने हिसाब से फैसले ले सके.
दूसरी तरफ अजय राय भले ही आए दिन अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते रहे हैं. कई मुद्दों पर अजय राय सपा से इतर राय भी व्यक्त करते रहे हैं. इसके बावजूद राजनीति में अजय राय सपा के लिए मुफीद हैं. दरअसल, अजय राय सवर्ण चेहरा हैं. खासकर पूर्वांचल में उनका कई सीटों पर ठीक ठाक प्रभाव माना जाता है. वहीं यूपी की राजनीति में समाजवादी पार्टी से ज्यादातर सवर्ण हमेशा से दूर रहे हैं. यही वजह है कि अखिलेश यादव इस बार ब्राह्मणों को साथ लाने के लिए सम्मेलन करते दिखे. ऐसे में अजय राय भले ही अखिलेश यादव के लिए कड़वे शब्द बोलते हैं, लेकिन गठबंधन में सवर्णों का वोट जोड़ने में सहायक हो सकते हैं.
