उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा, सपा, बसपा जैसी बड़ी पार्टियां जहां तैयारियों में जुटी हैं, वहीं आरएलडी, सुभासपा, निषाद पार्टी जैसे छोटे दल भी अपना दांव पेंच लगाने में जुटे हैं. छोटी पार्टियों का असली फोकस गठबंधन में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने की होती है. जबकि इन पार्टियों के पास ना तो उतना बड़ा संगठन होता है और ना ही चुनाव के लिए जिताऊ प्रतयाशी. ऐसी स्थिति में देखा गया है कि छोटे दलों के मुखिया को खुश करने के लिए बड़े दल चुनाव में सीटें तो दे देते हैं, लेकिन उनके टिकट पर अपने प्रत्याशी को मैदान में उतारते रहे हैं.
उधर, समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में कांग्रेस 100 से ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी कर रही, जबकि उसके केवल दो विधायक हैं. गठबंधन में छोटी पार्टियों की ओर से बड़ा मुंह खोलने की जो आदत है उसने एक बार फिर से यूपी में माहौल को गरमाया हुआ है.
सिंबल हमारा, प्रत्याशी तुम्हारा फॉर्मूले का नुकसान क्या है?
लेकिन ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा का तो और भी बुरा हाल है. ओम प्रकाश राजभर दावा करते रहते हैं कि समाजवादी पार्टी टूटने वाली है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनकी पार्टी के छह में चार विधायक अखिलेश यादव का झंडा लगाकर घूमते हैं. ये चार विधायक सुभासपा की बैठकों में भी नहीं आते हैं. ओपी राजभर के बेटे अरुण राजभर ऑन कैमरा इस बात को स्वीकार चुके हैं. वहीं ओपी राजभर कहते हैं कि पिछली बार गठबंधन में चुनाव लड़ने के चलते अखिलेश यादव ने उनके साथ चालाकी की थी.
पड़ोसी राज्य बिहार का उदाहरण याद करें तो यहां 2020 में मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी के चार विधायक जीते थे. वहीं मुकेश सहनी एमएलसी बनकर एनडीए सरकार में मंत्री बने थे. उन्होंने किसी विषय पर गठबंधन के सहयोगी बीजेपी के खिलाफ बयानबाजी की, जिसके बाद बीजेपी ने उनके सभी चार विधायक तोड़कर अपने साथ ले आए. क्योंकि वीआईपी के सभी चार विधायक चुनाव से पहले बीजेपी के नेता रहे और उन्हें वीआईपी के सिंबल पर चुनाव लड़ाया गया था.
गठबंधन में बड़ी पार्टियों के नेताओं को अपना सिंबल क्यों देती हैं छोटी पार्टियां
दरअसल, गठबंधन कई वजहों से बनते हैं. कई मामलों में राज्य नेतृत्व नहीं चाहता है कि फलां छोटी पार्टी को गठबंधन में नहीं लिया जाए. लेकिन कई बार बड़े दलों के बड़े नेता दिल्ली में बैठकर गठबंधन में घटक दल जोड़ने का फैसला ले लेते हैं. ऐसे में पार्टियों को दिल्ली के दबाव में सहयोगी रखना पड़ता है. ऐसी स्थिति में चुनाव के वक्त सीट शेयरिंग में उन्हें भी अडजस्ट किया जाता है. इसी अडजस्टमेंट के तहत बड़ी पार्टियों ने फॉर्मूला निकाला है कि नेता हमारा होगा और सिंबल आपका होगा. इसका एक फायदा यह होता है कि चुनाव बाद अगर छोटी पार्टियां गठबंधन से अलग होना भी चाहती हैं तो वह डरी रहती हैं. क्योंकि उन्हें इस बात का भय होता है कि अगर वह गठबंधन से अलग हुए तो उनकी पार्टी के विधायक ही टूट सकते हैं.
‘सिंबल आपका नेता हमारा’ वाली डील पर क्यों राजी होती हैं पार्टियां
दरअसल, हर राजनीतिक दल चाहती है कि विधानमंडल हो या संसद मौजूदगी वहां मजबूत हो. बहुपार्टी सिस्टम में लोग राजनीतिक दल तो बना लेते हैं, लेकिन संगठन को खड़ा करने में मेहनत, धन और समय खर्च करने में पीछे रह जाते हैं. ऐसे स्थिति में पार्टियां ऐन केन प्राकेन अपनी ताकत बढ़ाने का शॉर्टकट अपनाते हैं. चुनाव के वक्त उन्हें लगता है कि गठबंधन में रहते हुए अगर वह ज्यादा सीटों पर लड़ेंगे तो ज्याद प्रत्याशियों के जीतने की संभावना होगी.
अगर खुदा ना खास्ते ज्यादा विधायक या सांसद जीत गए तो उनकी पार्टी का विस्तार करने में काफी सहूलियत हो जाएगी. ऐसी स्थिति में सीट शेयरिंग के दौरान बड़ी पार्टियां उनके सामने ‘सिंबल आपका नेता हमारा’ वाली शर्त रख देते हैं. कमजोर पार्टियों के सामने आलम यह होता है कि भागते भूत की लंगोटी भली. फिलहाल जो मिल रहा है उसे पकड़ लो. जब विधायक जीतकर आ जाएंगे तब की तब देखी जाएगी. अभी तो ज्यादा सीटों पर पार्टी सिंबल पर प्रत्याशी उतारने का मौका मिल रहा है उसी पर फोकस बनाए रखो.
इस मसले पर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद कहते हैं कि फिलहाल उनकी बीजेपी से सीट शेयरिंग पर अभी कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है. लेकिन वह यह जरूर कहते हैं कि पिछली बार जितनी सीटों पर लड़े थे, इस बार उससे ज्यादा चाहिए. वह इस बात पर भी समझौता करने की बात कही कि वह तो बीजेपी से यह कह रहे हैं कि आप मुझे वो सीटें दे दीजिए जहां आपके प्रत्याशी कभी नहीं जीतते हैं. यानी संजय निषाद की बात को समझें तो वह कह रहे हैं कि उन्हें इससे ज्यादा मतलब नहीं कि वह केवल जिताऊ सीटों पर लड़े बल्कि इसपर ज्यादा फोकस है कि ज्यादा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारें. यानी संजय निषाद की कही बातों को ही आधार मानें तो छोटी पार्टियां पूरी तरह से भागते भूत की लंगोटी भली के फॉर्मूले पर चलती हैं.
