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दुद्धी. लौवा नदी आज अपने अस्तित्व के लिए कर रही संघर्ष

JK Gupta by JK Gupta
May 10, 2026
in सोनभद्र
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संवाददाता@मोहम्मद इब्राहिम……


कनहर नदी में मिलने वाली लौवा नदी आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कभी इस क्षेत्र की जीवनदायिनी कही जाने वाली यह नदी लगातार मानवीय हस्तक्षेप, अवैध बालू खनन और अनियंत्रित दोहन के कारण बूंद-बूंद पानी को तरसने लगी है। गर्मियों की शुरुआत होते ही नदी का पानी पूरी तरह सूख चुका है और अब जलधारा की जगह केवल रेत और सूखी मिट्टी नजर आ रही है।

दर्जनों गाँवों का जलस्तर खतरे में लौवा नदी अपने सफर में बलियरी, मुरता, महुअरिया, लीलासी, झारोकला, कादल, दुमहान, रजखड़, बीड़र और मल्देवा सहित दर्जनों गाँवों को सींचती आई है। नदी के इस तरह सूख जाने से इन सभी तटवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों का भूगर्भ जलस्तर (Water Table) तेजी से नीचे गिर रहा है। ग्रामीणों के सामने पशुओं के पीने के पानी और कृषि सिंचाई का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

अंधाधुंध दोहन और प्रशासनिक उदासीनता

स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि जब तक यह नदी स्वतंत्र रूप से बहती थी, तब तक इसका प्रवाह बेहद मजबूत और पानी साफ रहता था। पिछले कुछ वर्षों में नदी के जलग्रहण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ की गई है। पानी को रोकने या प्राकृतिक बहाव को मोड़ने की कोशिशों और बड़े पैमाने पर हो रहे रेत के अवैध दोहन ने नदी के प्राकृतिक स्रोतों को हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

‘बावन झरिया’ के भरोसे बची है सांसें-

रजखड़ और बीड़र गाँव को पार करने के बाद बराईडाड़ के पास स्थित औषधीय गुणों से युक्त ‘बावन झरिया’ जलस्रोत इस नदी को कुछ हद तक पुनर्जीवित करता है। इसी स्रोत के सहारे सामान्य दिनों में इसकी बची-खुची जलधार आगे बढ़कर कनहर नदी में समाहित हो पाती है। लेकिन अगर उद्गम स्थल से लेकर पूरे मार्ग में दोहन पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो यह प्राकृतिक जलस्रोत भी नदी को बचाने में नाकाम साबित होगा।

स्थानीय जनता की माँग

क्षेत्रीय नागरिकों और समाजसेवियों ने शासन-प्रशासन से लौवा नदी के संरक्षण के लिए तुरंत कड़े कदम उठाने की माँग की है। ग्रामीणों का कहना है कि नदी के किनारों पर पौधारोपण करने, अवैध खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और नदी की सफाई कराकर इसके प्राकृतिक स्वरूप को बहाल किया जाए, अन्यथा यह जीवनदायिनी नदी पूरी तरह इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी।

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