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Raunak Raj Karate Champion: यह कहानी पटना के उस युवा खिलाड़ी की है, जिसने कराटे के लिए सर्द रातों में भी घर से बाहर रहने की सज़ा झेली. उसका नाम रौनक राज है. अक्षय कुमार की फिल्म देखकर कराटे सीखने की ठानी ज़िद ने आज ऐसा मुकाम दिलाया है कि घर की दीवारों पर 100 से भी ज़्यादा मेडल टंगे हुए हैं.

फर्स्ट साइको काई ईस्ट इंडिया कराटे चैंपियनशिप में पटना के रौनक राज ने पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और झारखंड के खिलाड़ियों को हराते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया. इस टूर्नामेंट में रौनक ने तीन राउंड का मुकाबला खेला. पहले राउंड में पश्चिम बंगाल को 5-0 से, दूसरे राउंड में उड़ीसा को 6-0 से और तीसरे राउंड में झारखंड के साथ 4-0 से जीत दर्ज की. आपको बता दें कि यह टूर्नामेंट पूर्वी भारत के राज्यों के बीच खेला गया.

यह पहला मौका नहीं है. जब रौनक ने गोल्ड मेडल जीता है. इसके पहले वो 2018 से 2024 तक लगातार स्टेट चैंपियन रह चुके चुके हैं. हर साल गोल्ड मेडल हासिल किया है. इसके अलावा, पहली बार 2021 में नेशनल लेवल का मुकाबला खेला, लेकिन असफल रहे. इसके बावजूद उन्होंने अगले साल यानी 2022 में ब्रॉन्ज, 2023 में ब्रॉन्ज और 2024 में सिल्वर मेडल जीता. इस साल भी नेशनल के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं और गोल्ड मेडल पर कब्जा करने की तैयारी में लगे हुए हैं.

रौनक छह साल की उम्र से कराटे खेल रहे हैं. उन्होंने 2013 में अपना पहला मुकाबला खेला और मेडल जीतकर पहचान बनाई. जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में अब तक वह 100 से अधिक मेडल जीत चुके हैं, जिनमें अधिकांश गोल्ड मेडल हैं. रौनक पढ़ाई के साथ-साथ अपने शौक को भी बैलेंस रूप से निभा रहे हैं. इस खेल में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना संजोए हुए हैं.
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इस खेल के प्रति रौनक की रुचि तब जागी, जब वह स्कूल से लौटकर टीवी पर अक्षय कुमार की फिल्म खिलाड़ी देख रहे थे. तभी उन्होंने ठान लिया कि वह भी अक्षय कुमार की तरह कराटे करेंगे. सबसे पहले उन्होंने अपने स्कूल टीचर को इसकी जानकारी दी और स्कूल में ही कराटे सीखना शुरू किया. इसके बाद रौनक की मुलाकात कोच पंकज कमली से हुई, जिन्होंने उनके खेल को निखारा और उन्हें अलग-अलग टूर्नामेंटों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया.

काफी दिनों बाद जब घरवालों को इस बात की जानकारी हुई तो रौनक को खूब मार खानी पड़ी. उनके पिता खेल के पक्ष में नहीं थे. वह चाहते थे कि रौनक पढ़ाई पर ध्यान दें और आगे चलकर सरकारी नौकरी करें, लेकिन रौनक पर कराटे का जुनून इस कदर सवार था कि वह बिना बताए स्कूल के बाद प्रैक्टिस करने चले जाते थे. देर शाम घर लौटने पर उन्हें मार भी पड़ती थी और कई बार रातभर घर से बाहर रहना पड़ता था. घर में एंट्री नहीं मिलती थी, ताकि वह खेल नहीं बल्कि पढ़ाई पर ध्यान दें.

रौनक बताते हैं कि उनके इस सफर में मां का सबसे बड़ा सहयोग रहा. जब पिता उन्हें घर में घुसने नहीं देते थे, तब मां चुपचाप उनके लिए खाना लेकर आती थीं और रातभर उनके साथ बाहर ही बैठी रहती थीं. दूसरे शहर टूर्नामेंट खेलने जाना होता तो वह बिना किसी को बताए पड़ोसियों से पैसे उधार लेकर रौनक को देती थीं. रौनक कहते हैं कि मां का यह सहयोग ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा है.

हालांकि, जब खेल में धीरे-धीरे सुधार होने लगा तो कोच सहित कई लोगों ने उनके पिता को भी समझाए. घर में मेडल और थोड़ी बहुत सफलता देख पिता भी मान गए. रौनक कहते हैं कि अब परिवार और आसपास के सभी लोगों का पूरा सहयोग मिलता है, जिससे मेहनत करने में और भी आनंद आता है. एक दिन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधत्व कर पापा को प्राउड फील करवाऊंगा.

