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Siwan News: सीवान जिले के बड़हरिया प्रखंड के लौवान गांव की 17 वर्षीय प्रतिभाशाली बेटी शगुफ्ता नाज हैहरिद्वार (उत्तराखंड) में 14 से 16 नवंबर तक आयोजित 18वीं राष्ट्रीय जूनियर ग्रैपलिंग चैंपियनशिप में शगुफ्ता ने एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर न सिर्फ बिहार, बल्कि सम्पूर्ण देश में सीवान का नाम रोशन किया है
हालिया राष्ट्रीय खेलों की दुनिया में जिस नाम ने बिहार का परचम बुलंद किया है. वह बड़हरिया प्रखंड के लौवान गांव की 17 वर्षीय बेटी शगुफ्ता नाज है. हरिद्वार (उत्तराखंड) में 14 से 16 नवंबर तक आयोजित 18वीं राष्ट्रीय जूनियर ग्रैपलिंग चैंपियनशिप में शगुफ्ता ने एक स्वर्ण व एक रजत पदक जीतकर न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश में सीवान का नाम रोशन किया है.
52 किलोग्राम वर्ग में दिखाया दम
जूनियर वर्ग की 52 किलोग्राम भार श्रेणी में शगुफ्ता नाज़ ने एक के बाद एक बेहतरीन मुकाबले जीते.
उत्तर प्रदेश की खिलाड़ी को नॉकआउट कर चौंकाया.हिमाचल प्रदेश की खिलाड़ी को 0–9 से मात दी. हरियाणा की मजबूत प्रतिद्वंद्वी को 1–9 से हराकर स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया. इस प्रतियोगिता में देशभर के राज्यों की दिग्गज जूनियर खिलाड़ी हिस्सा ले रही थीं. लेकिन शगुफ्ता ने अपने हुनर फिटनेस और तकनीक के दम पर सबको पीछे छोड़ते हुए स्वर्ण अपने नाम किया.
तीन वर्षों में 10 पदक
शगुफ्ता पिछले तीन वर्षों से लगातार राष्ट्रीय स्तर पर दबदबा बनाए हुई हैं. अब तक वह 10 पदक जीत चुकी हैं।2023 में हरियाणा के सोनीपत में आयोजित ओपन नेशनल चैंपियनशिप में भी वे अपने आयु वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर बिहार की चैंपियन बनी थीं।ग्रैपलिंग जैसे कठोर और तकनीकी खेल में एक मुस्लिम लड़की का राष्ट्रीय फ़लक पर लगातार चमकना, समाज के लिए भी प्रेरणादायक है.
अनाथ होकर भी नहीं टूटी हिम्मत
शगुफ्ता की सफलता की कहानी केवल खेल की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष की भी दास्तां है।बहुत कम उम्र में ही उन्होंने माता-पिता को खो दिया। अनाथ होने के बाद उनकी जिम्मेदारी उनके मामा मो. कलीम उर्फ़ विकास अहमद ने उठाई. इन सबके बीच शगुफ्ता ने जीएम हाई स्कूल, बड़हरिया में पढ़ाई करते हुए अपनी मेहनत और लगन से यह मुकाम हासिल किया.परिवारिक समर्थन और व्यक्तिगत जज़्बे का यह अद्भुत संगम आज उनके स्वर्ण पदकों में साफ झलकता है.
मुस्लिम समाज की बेटियों के लिए बनी मिसाल
आज के दौर में जब बेटियों के लिए खेलों में करियर बनाना चुनौतीपूर्ण माना जाता है. खासकर ग्रामीण और मुस्लिम समाज में अवसर कम देखने को मिलते हैं. वहीं शगुफ्ता नाज़ एक नई दिशा दिखा रही हैं. वे साबित कर रही हैं कि हिम्मत, मेहनत और सपनों पर भरोसा हो तो हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, मंज़िल दूर नहीं रहती.शगुफ्ता बताती हैं कि खेल ने उन्हें आत्मविश्वास दिया है. उनके गांव और जिले की अधिक से अधिक बच्चियां आगे आएं. उनकी कामयाबी लड़कियों में खेल के प्रति नया उत्साह भर रही है.
सीवान की पहचान बन रही है बेटियों की सफलता
सीवान की मिट्टी ने हमेशा प्रतिभाएं दी हैं. अब बेटियां भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं. स्थानीय खेल प्रशिक्षकों ने भी शगुफ्ता की मेहनत और अनुशासन की सराहना की है. समाज के लोगों का कहना है कि शगुफ्ता नाज़ की उपलब्धि न केवल उनके परिवार के लिए गौरव है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि अनाथ होने का मतलब अंत नहीं, बल्कि मजबूती से उठने की शुरुआत भी हो सकता है.
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