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धान की फसल में हल्दी रोग से किसान परेशान हैं. इसे कंडुआ रोग भी कहते हैं, जो एक फफूंद जनित रोग है. यह रोग बाली में दाना बनने के दौरान फैलता है और फसल के उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है. डॉ. नूतन वर्मा ने बताया है क…और पढ़ें
कृषि एक्सपर्ट डॉ नूतन वर्मा ने बताया कि धान की फसल में आने वाला हल्दी रोग एक फफूंद जनित रोग है, यह फसल को तब नुकसान पहुंचाता है, जब बाली में दाना बन रहा होता है. यह रोग मौसम में आने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से फैलता है. खास तौर पर उच्च आद्रता और उच्च तापमान वाली स्थिति में यह रोग एक तेजी के साथ बढ़ता है.
इस रोग की चपेट में आने से धान की फसल बालियों के ऊपर काले और भूरे रंग का पाउडर दिखाई देने लगता है, और यह पाउडर हवा के साथ उड़कर आसपास के दूसरे पौधों को भी चपेट में ले लेता है. इसके बाद प्रभावित दाने सिकुड़ जाते हैं या तो सूख जाते हैं, और दानों का वजन कम हो जाता है. कई बार दाने फटने भी लगते हैं, अगर खेत में लगातार जल भराव बना रहे तब भी इस रोग के फैलने की संभावना और ज्यादा बढ़ जाती है.
इस दवा का करें छिड़काव
धान की फसल में हल्दी रोग के लक्षण शुरुआती दौर में देखने पर अगर रोकथाम कर ली जाए तो होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसके नियंत्रण के लिए 400 प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी (Propiconazole 25% EC) दवा को लेकर 140 से 150 लीटर पानी में घोल बनाकर एक एकड़ फसल में छिड़काव कर दें. छिड़काव करने से काफी हद तक रोग से निजात मिल जाएगी.
बीज उपचारित कर ही करें फसल बुवाई
हल्दी रोग बीज जनित रोग है. अगर धान की पौध डालते समय बीज को उपचारित कर लें, तो फसल को हल्दी रोग की चपेट में आने से बचाया जा सकता है. बीज शोधन के लिए कार्बेंडाजिम (Carbendazim) 2.5 ग्राम से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित कर सकते हैं. इसके अलावा मृदा शोधन करना भी जरूरी है. खेत की गहरी जुताई करें और खेत में ट्राईकोडरमा कल्चर से मृदा को उपचारित करें. इसके अलावा धान की फसल में यूरिया कम से कम मात्रा में इस्तेमाल करें.

काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. डिजिटल में 7 साल से ज्यादा का अन…और पढ़ें
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