मुख्यालय संवाददाता@विशाल टंडन…
..ऑनलाइन बाजार की चमक में न खो जाएं छोटी दुकानों की उम्मीदें, आपकी खरीदारी से जलते हैं कई घरों के चूल्हे

मोबाइल पर एक क्लिक और सामान घर पहुंच जाता है। ऑनलाइन बाजार की चमक, आकर्षक छूट और सुविधाजनक खरीदारी के दौर में बाजार का यह बदलता स्वरूप लोगों को खूब लुभा रहा है। लेकिन इस चमक के बीच उन छोटे दुकानदारों की जिंदगी भी देखनी होगी, जिनकी रोजी-रोटी ग्राहकों की छोटी-छोटी खरीदारी पर निर्भर है।

गली-मोहल्लों में सब्जी बेचने वाला, ठेले पर फल सजाने वाला, छोटी किराना दुकान चलाने वाला या सड़क किनारे चाय की दुकान लगाने वाला व्यक्ति सिर्फ सामान नहीं बेचता, बल्कि अपने परिवार की उम्मीदें भी संजोए रहता है। उसकी दुकान की कमाई से बच्चों की फीस, घर का राशन, बिजली का बिल और बुजुर्गों की दवाइयों का खर्च निकलता है। महंगाई और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच इन जिम्मेदारियों को निभाना आसान नहीं है।

बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की पहुंच और छूट के मुकाबले छोटे दुकानदारों के पास सीमित संसाधन हैं। दुकान का किराया, बिजली का बिल और सामान खरीदने की लागत चुकाने के बाद उनकी कमाई अक्सर सीमित रह जाती है। इसके बावजूद वे हर सुबह इस उम्मीद में दुकान खोलते हैं कि आज कुछ बिक्री होगी और परिवार की जरूरतें पूरी हो सकेंगी।

ऐसे में जरूरी नहीं कि लोग ऑनलाइन खरीदारी पूरी तरह छोड़ दें। लेकिन जहां सुविधा, गुणवत्ता और उचित कीमत के लिहाज से संभव हो, वहां स्थानीय दुकानों से सामान खरीदने को प्राथमिकता दी जा सकती है।

सौ-दो सौ रुपये की खरीदारी भी छोटे कारोबारी के दैनिक कारोबार में अहम हो सकती है। इससे स्थानीय बाजार में पैसा बना रहता है और छोटे व्यवसायों को सहारा मिलता है।

हालांकि, ग्राहकों के भरोसे को कायम रखने की जिम्मेदारी दुकानदारों की भी है। उचित कीमत, सही तौल, गुणवत्तापूर्ण सामान और अच्छा व्यवहार इस रिश्ते को मजबूत बनाते हैं।

आखिर सवाल सिर्फ खरीदारी का नहीं, संवेदना का भी है। हर कोई अमीर बनने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान के साथ दो वक्त की रोटी कमाने के लिए मेहनत करता है।

इसलिए अगली बार खरीदारी करते समय आसपास की छोटी दुकानों को भी याद रखिए, क्योंकि आपकी एक छोटी खरीदारी किसी परिवार की बड़ी जरूरत पूरी करने में मददगार बन सकती है। तो आइये इस दीपावली की खरीददारी से हम अपने परिवार मे खुशियों के साथ कई और परिवारों मे खुशियों के दीप जलायें।