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Belgium Vessel Bahubali Truck : कई दिनों से सुर्खियां बटोर रहा 308 पहिए वाला बाहुबली ट्रक अपने गंतव्य तक पहुंच चुका है. लखीमपुर खीरी के कुंभी में देश का पहला इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट लगाया जा रहा है. इस प्लांट के लिए बेल्जियम से वेसल (साइक्लाजेसन रिएक्टर) को मंगाया गया है. यहां गन्ने से बायोप्लास्टिक बनने की प्रक्रिया एक ही छत के नीचे पूरी होगी. इसका कच्चा माल भी यही मिलेगा और अंतिम उत्पाद भी यही तैयार किए जाएंगे. प्लांट के यूनिट हेड डॉ. सुनील यादव लोकल 18 से बताते हैं कि पारंपरिक प्लास्टिक पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाती है. नया बायोप्लास्टिक जमीन में जाने के बाद महज छह महीने के भीतर पूरी तरह मिट्टी में घुल जाता है.
लखीमपुर खीरी. उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी में करीब 3080 करोड़ रुपये की लागत से देश का पहला इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट स्थापित किया जा रहा है. इस प्लांट के लिए बेल्जियम से वेसल (साइक्लाजेसन रिएक्टर) मुख्य मशीन को मंगाया गया है. गन्ने और चीनी से लैक्टिक एसिड तैयार कर पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए बायोप्लास्टिक बनाया जाएगा. यह दुनिया का ऐसा पहला एकीकृत प्लांट होगा जहां एक ही छत के नीचे सभी प्रक्रियाएं पूरी होंगी. वेसल लेकर यहां पहुंचा 308 पहिए वाला बाहुबली ट्रक अपनी यात्रा के पहले दिन से सुर्खियों में था. लखीमपुर खीरी में देश का पहला पीएलए प्लांट के स्थापित होने से हर साल लगभग 80,000 टन पीएलए का उत्पादन होगा. यह दुनिया का पहला ऐसा इंटीग्रेटेड प्लांट होगा, जहां गन्ने से बायोप्लास्टिक बनने की प्रक्रिया एक ही छत के नीचे पूरी होगी. इसका कच्चा माल भी यही मिलेगा और अंतिम उत्पाद भी यही तैयार किए जाएंगे. बेल्जियम में तैयार किया गया यह वेसल बायोप्लास्टिक उत्पादन संयंत्र की महत्वपूर्ण मशीनरी का हिस्सा है. इसे विशेष हाइड्रोलिक मल्टी-एक्सल ट्रेलर पर लादकर सड़क मार्ग से कुंभी लाया गया है.
वेसल की खासियत
- वजन करीब 200 टन, निर्माण बेल्जियम में
- लंबाई करीब 110 फीट, चौड़ाई करीब 20 फीट
- ऊंचाई करीब 20 फीट
ऐसे करेगा काम
प्लांट के महाप्रबंधक (यूनिट हेड) डॉ. सुनील कुमार यादव लोकल 18 से बताते हैं कि इसमें सबसे पहले शुगर या चीनी से लैक्टिक एसिड तैयार किया जाता है. इसके बाद लैक्टिक एसिड में कैटालिस्ट डालकर रिएक्शन कराया जाता है, जिससे पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए बनता है, जो पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल होता है. इस प्रक्रिया से बने उत्पाद और पैलेट्स से कपड़े, धागे, कटलरी और पॉलिथीन जैसी कई चीजें बनाई जा सकेंगी.
प्रदूषण से मुक्ति, किसानों की चांदी
डॉ. सुनील कहते हैं कि पारंपरिक प्लास्टिक पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाती है और नालों को चोक कर देती है. इसके विपरीत, यह नया बायोप्लास्टिक जमीन में जाने के बाद महज छह महीने के भीतर पूरी तरह मिट्टी में घुल जाता है, जिससे प्रदूषण की समस्या खत्म होगी. इस मेगा प्रोजेक्ट के शुरू होने से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा बूस्ट मिलेगा, बल्कि रिटेलर्स और होलसेलर्स को भी दूसरे राज्यों और देशों में व्यापार करने के नए मौके मिलेंगे. कृषि अवशेषों का बायोपॉलिमरों निर्माण में उपयोग होने से स्थानीय गन्ना किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल मिलेगा. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…