उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की गूंज अब साफ सुनाई देने लगी है. विपक्षी पार्टियां गठबंधन की रूपरेखा बनाने में लगी हैं तो भाजपा भी खामोश नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य में भारी झटका लगा था. उसकी सीटें 2019 की 62 सीटों से घटकर 33 पर सिमट गई थीं. इसका फायदा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को हुआ.
यह भाजपा के लिए अपनी कमियों को दुरुस्त करने की स्पष्ट चेतावनी थी. इस हालत की समीक्षा में यह बात सामने आई थी कि उम्मीदवारों के चयन में चूक हुई. अब पार्टी उस अनुभव से सबक लेकर नई रणनीति पर काम कर रही है. हाल के सर्वे, संगठनात्मक बदलाव और विकास कार्यों से साफ है कि भाजपा पुरानी गलतियों से बचते हुए आगे बढ़ना चाहती है. योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी बनी हुई है.
सर्वे में दिख रहा योगी का जलवा
योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता समझने के लिए हाल में आए 2 सर्वेक्षणों से समझी जा सकती है. अक्टूबर 2026 में न्यूज18 के मेगा सर्वे ने भाजपा और योगी आदित्यनाथ के पक्ष में साफ तस्वीर पेश की है. सर्वे में 75 जिलों के 30,925 लोगों से बात की गई. नतीजों के अनुसार 66.2 प्रतिशत लोग योगी आदित्यनाथ को अगला मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं.
समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव को सिर्फ 24.4 प्रतिशत लोग ही सीएम के रूप में पसंद करने वाले मिले. कभी सीएम रहीं मायावती तो इस दौड़ से बाहर ही दिखाई पड़ीं. उनके सिर्फ 5 प्रतिशत चहेते उन्हें सीएम बनते देखना चाहते हैं. सर्वे में यह भी सच सामने आया कि अगर आज चुनाव हों तो भाजपा नीत एनडीए को 66.6 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन को 26.4 प्रतिशत से संतोष करना पड़ेगा. 77.1 प्रतिशत लोग योगी सरकार के कामकाज से संतुष्ट हैं.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ.
कानून-व्यवस्था सबको पसंद आई
योगी की सबसे बड़ी पूंजी कानून-व्यवस्था रही है, जिसे पसंद करने वाले 74 प्रतिशत मिले. बुनियादी ढांचे के लिए उनके किए काम को 68.6 प्रतिशत लोगों ने सराहा. सर्वे की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 65.2 प्रतिशत लोगों का साफ मानना था कि भाजपा को सूबे में सरकार बनाने की तीसरा मौका मिलना चाहिए. 2024 के लोकसभा चुनाव में जहां स्थानीय असंतोष और जातीय समीकरणों ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया था, वहीं योगी की व्यक्तिगत छवि पहले की तरह ही मजबूत है. दूसरा सर्वे यूपी तक (UP Tak) और मैटराइज (Matrize) का सामने आया है, जिसमें भाजपा को विधानसभा की कुल 403 सीटों में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन (NDA) को 267 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत मिलने का अनुमान जताया गया है. सपा-कांग्रेस गठबंधन 132 सीटों पर खड़ा दिख रहा है तो मायावती की बसपा 2 सीटों पर सिमटती दिख रही हैं.
BJP बदल सकती है उम्मीदवार
सर्वेक्षणों के इन मजबूत संकेतों के बावजूद भाजपा लोकसभा चुनाव की तरह की कोई चूक नहीं करना चाहती. पार्टी के अंदर चर्चा है कि 2027 में 30 से 40 प्रतिशत सीटिंग विधायकों को टिकट से वंचित किया जा सकता है. गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और असम के मॉडल को अपनाने की बात चल रही है, जहां बड़े पैमाने पर नए चेहरों को मौका देकर एंटी-इनकम्बैंसी को भाजपा ने बेअसरकर दिया था. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने करीब 32 प्रतिशत विधायकों को बदला था. 2024 लोकसभा में सिटिंग सांसदों को दोबारा मौका देना भाजपा के लिए घातक साबित हुई थी.
नए उम्मीदवारों की सफलता दर ऐसे सीटिंग सांसदों से बेहतर रही थी. वर्तमान में 186 भाजपा विधायक 2 या उससे ज्यादा बार जीत चुके हैं. आंतरिक सर्वे में कई क्षेत्रों में स्थानीय विधायकों के खिलाफ नाराजगी दिख रही है, जबकि सरकार और मुख्यमंत्री से लोग संतुष्टी जता रहे हैं. भाजपा राज्य समिति में भी बड़े बदलाव कर चुकी है. करीब 70 प्रतिशत नए चेहरे लाए गए हैं. राज्यसभा चुनाव में भी सभी 8 पुराने सदस्यों की जगह नए उम्मीदवार उतारे गए. टिकट वितरण में सक्रियता, जनसंपर्क, योजनाओं का क्रियान्वयन और जातीय समीकरण को आधार बनाया जा रहा है. बूथ स्तर पर 18,900 कमजोर बूथों को चिह्नित किया गया है, जहां 2022 में जीत मिली थी, लेकिन 2024 में वोट कम हुए.
संसदीय चुनाव नतीजों से सबक
2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा को कई सबक दिए. पार्टी का वोट शेयर करीब 8 प्रतिशत गिरा. गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों में कमी आई. संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष का नैरेटिव असरदार रहा. कई क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवारों की छवि ने नुकसान पहुंचाया. अब पार्टी इन गलतियों से बचने की कोशिश में है. ‘400 पार’ जैसे बड़े नारे से दूरी बनाई जा रही है फोकस पूर्ण बहुमत और विकास पर है. पूर्वांचल और अवध जैसे क्षेत्रों में बूथ स्तर की मजबूती पर जोर है. योगी आदित्यनाथ ने 115 विधानसभा क्षेत्रों में 38 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया है. इनमें से कई क्षेत्र वे हैं जहां 2024 में सपा-कांग्रेस आगे रही थी. इसके साथ ही संगठन को अलर्ट मोड में लाया गया है. शक्ति केंद्रों से सफलता की कहानियां जुटाने, डिजिटल प्रचार और फीडबैक सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है. संघ के साथ समन्वय बढ़ाया गया है ताकि जमीनी स्तर पर सक्रियता बनी रहे.
चिराग संभालेंगे दलित वोटरों को
केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान की यूपी चुनाव को लेकर बढ़ी दिलचस्पी और सक्रियता के पीछे भी भाजपा की सुविचारित रणनीति है. उत्तर प्रदेश में दलित वोटर निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. मायावती का मुख्यमंत्री बनना इन्हीं दलित वोटरों के समर्थन से संभव हो पाया था. उत्तर प्रदेश की कुल आबादी और मतदाता सूची में दलितों की हिस्सेदारी लगभग 21-22 प्रतिशत मानी जाती है.
यूपी की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा, राज्य की करीब 140 से अधिक सीटों पर दलित मतदाता जीत-हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. चिराग पासवान भाजपा के विश्वसनीय सहयोगी रहे हैं. वे दलित राजनीति का उभरता चेहरा हैं. अगर उनकी पार्टी को गठबंधन के तहत कुछ सीटें देकर भाजपा आगे करती है तो लोकसभा चुनाव में छिटके दलित नेताओं को साथ लाने में उसे सहूलियत होगी. यही वजह है कि चिराग के बहनोई और सांसद अरुण भारती राज्य भर में संगठन खड़ा करने का प्रयास महीनों से कर रहे हैं. चिराग भी आते-जाते रहे हैं. मसलन, छोटी-छोटी बातों का भी भाजपा पूरा ख्याल रख रही है.

