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Varanasi ki local news : वाराणसी में पागल हाथी के उत्पात का वीडियो आपने भी देखा होगा. गजराज ने न केवल अपने महावत को पटका, बिजली के खंभे तोड़े और कई घरों के दीवारों पर गुस्सा उतारा. रामलीला भी स्थगित करनी पड़ी. इसी गजराज पर बैठकर काशी नरेश रामलीला में शामिल होने वाले थे. काशी नरेश के गजराज का ये गुस्सा कोई नया नहीं है. करीब पांच दशक पहले ऐसा ही एक तांडव देखने को मिला था, जब तत्कालीन काशी नरेश विभूति नारायण सिंह का हाथी मंगला प्रसाद पागल हो गया. गोखरू का प्रयोग कर काफी मशक्कत के बाद उसे काबू में लाया जा सका था.
वाराणसी. काशी के रामनगर की रामलीला में प्रयोग होने वाले गजराज (हाथी) का उत्पात 15 घंटो तक जारी रहा. घंटों चले इस उत्पात में गजराज ने महावत को पटका, बिजली के खंभे तोड़े और कई घरों के दीवारों पर अपना गुस्सा उतारा. इसी गजराज पर बैठकर रविवार की शाम काशी नरेश रामलीला में शामिल होने वाले थे, लेकिन जब हाथी काबू में नहीं आया तो रामलीला भी स्थगित करनी पड़ी. हालांकि काशी नरेश के गजराज का ये गुस्सा कोई नया नहीं है. इसके पहले भी काशी राज परिवार का एक हाथी रामनगर में खूब उत्पात मचा चुका है. बात 1976-77 की है. उस वक्त के तत्कालीन काशी नरेश विभूति नारायण सिंह के पास मंगला प्रसाद नाम का एक हाथी था. स्थानीय लोगों के मुताबिक, महावत से ज्यादा यह हाथी काशी नरेश को मानता था. काशी नरेश भी इसे उतना ही मानते थे. एक दिन हाथी (मंगला प्रसाद) गुस्से से पागल हो गया और किले के आसपास तोड़फोड़ शुरू कर दी. काशी नरेश को जब इसकी जानकारी हुई तो वे भी उसे मनाने आए, लेकिन हाथी नहीं माना. इसके बाद गोखरू का प्रयोग कर काफी मशक्कत के बाद उसे काबू में लाया गया.
क्या होता है गोखरू
गोखरू कोई हथियार नहीं बल्कि प्राकृतिक कांटेदार फल है. इस फल में 3-4 जोड़े बेहद मजबूत और नुकीले होते हैं, जिनका प्रयोग युद्ध के दौरान अक्सर दुश्मनों के हाथी और घोड़ों के पैरो को जख्मी करने के लिए किया जाता है. रामनगर किले के म्यूजियम में आज भी ये कांटेदार प्राकृतिक हथियार देखने को मिल जाते हैं.
मारनी पड़ी थी गोली
रामनगर के रहने वाले सृजन श्रीवास्तव लोकल 18 से बताते हैं कि एक हाथी का कब्र PAC कैंप में गिरिजा मंदिर के करीब भी है. बात 1999 के आसपास की है, जब इस हाथी ने रामनगर क्षेत्र में काफी उत्पात मचाया था. लंबे समय बाद जब हाथी काबू में नहीं आया तो आखिर में उसे गोली मारनी पड़ी. इसके बाद उस हाथी को वहीं मिट्टी में दफनाया गया. हाथी का वजन काफी ज्यादा होता है, इसलिए वो जिस जगह मरता है, उसे वहीं दफना दिया जाता है. हालांकि इस हाथी का कोई संबंध काशी राज परिवार से नहीं रहा है. पहले रामनगर में हाथी खाना भी था, जिसमें हाथियों को रखा जाता था.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…

