एसआईआर में कथित गड़बड़ी, सरकारी नौकरी की मांग, स्कूलों-कॉलेजों में सुविधा और बढ़ाने आदि मुद्दों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा आंदोलनरत हैं. ऐसे में उत्तर प्रदेश के यूनिवर्सिटीज में छात्र संघ के चुनाव कराने की मांग नये सिरे से उठती दिख रही है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में लंबे समय बाद 5 नवंबर को छात्र संघ चुनाव कराने की मिली इजाजत के बाद पूरे प्रदेश के विश्वविद्यालयों में यह मांग शुरू हुई है. सवाल उठ रहे हैं कि अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (JNU) में हर साल नियमित रूप से छात्र संघ के चुनाव होते हैं तो उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों को इससे वंचित क्यों रखा जा रहा है.
यूपी चुनाव में छात्र संघ चुनाव को मुद्दा बनाने पर जोर
छात्रों की यह मांग इसलिए चर्चा में है क्योंकि 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं. वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव को टाल रही राज्य सरकार को आदेश दिया है कि इसे अगले तीन महीने के भीतर कराया जाए. हालांकि राज्य सरकार पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव तक टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है. इसी बीच 18 अक्टूबर को जब समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव से छात्र संघ चुनाव कराने को लेकर सवाल पूछे गए तो उन्होंने केवल इतना कहा- ‘हम सत्ता में आएंगे तो सब हो जाएगा.’ यह भी बातें शुरू हो गई हैं कि विधानसभा चुनाव में छात्रों का वोट पाने के लिए क्या बीजेपी, सपा, बसपा, कांग्रेस जैसे दल छात्र संघ चुनाव को लेकर कोई बड़ी घोषणा करेंगे?
मायावती की सरकार ने पहले छात्रसंघ चुनाव पर लगाया बैन फिर हटाया
2007 में मायावती की सरकार बनने के बाद यूनिवर्सिटीज कैंपस में हिंसा और इसकी वजह से एकेडमिक सेशन शेड्यूल में होने वाली देरी का हवाला देकर छात्र संघ चुनाव पर रोक लगा दी गई थी. हालांकि छात्रों की मांग पर इसे साल 2008 में हटा लिया गया था. इस संदर्भ में मेरठ यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर वीसी गोयल ने कहा कि सरकार ने स्टूडेंट यूनियन चुनाव कराने के लिए कोई निर्देश जारी नहीं किया है.
छात्र संघ चुनाव को लेकर छात्रों की क्या हैं चिंताएं
छात्रों का आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने चुनाव टालने के लिए बार-बार अलग-अलग कारण बताए हैं. उनका कहना है कि न तो राज्य सरकार और न ही जिला प्रशासन ने चुनावों पर रोक लगाई है. छात्रों का सीधा आरोप है कि यूनिवर्सिटी अधिकारी छात्र संघ चुनाव कराने में आनाकानी कर रही हैं.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में लखनऊ यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी (समाजशास्त्र) के पीचडी स्टूडेंट विशाल सिंह ने कहा, ‘कभी-कभी वे कहते हैं कि एडमिशन प्रोसेस चल रहा है, और कभी-कभी वे कहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन और स्टेट गवर्नमेंट ने परमिशन नहीं दी है. वे सुरक्षा की चिंताओं का भी हवाला देते हैं, कहते हैं कि उनके पास सिचुएशन को मैनेज करने के लिए फोर्स की कमी है, क्योंकि इलेक्शन के टाइम क्रिमिनल एक्टिविटी बढ़ सकती हैं.’
छात्र विशाल सिंह ने कहा कि लखनऊ यूनिवर्सिटी में आखिरी बार 2005 में स्टूडेंट यूनियन इलेक्शन हुए थे. उन्होंने आगे कहा, ‘जब भी स्टूडेंट्स यह मुद्दा उठाते हैं, तो गवर्नमेंट कहती है कि उसने इलेक्शन नहीं रोके हैं और यूनिवर्सिटी को ही इलेक्शन कराने चाहिए. हालांकि, एडमिनिस्ट्रेशन ने कोई क्लियर टाइमलाइन नहीं बताई है.’
छात्रों का तर्क है कि अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) स्टूडेंट यूनियन इलेक्शन करा सकते हैं, तो पूरे उत्तर प्रदेश में इलेक्शन को लंबे समय तक रोकने का कोई मतलब नहीं है.
बीएचयू में 1997 से नहीं हुए छात्रसंघ चुनाव
उत्तर प्रदेश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में सालों से छात्र संघ के चुनाव नहीं हुए हैं. बड़े विश्वविद्यालयों की बात करें तो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) में सबसे लंबे समय से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं. यहां अंतिम बार 1997 में छात्र संघ के चुनाव हुए थे.
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्र लंबे समय से छात्र संघ चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मांग पर ध्यान नहीं दे रहा है. अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में छात्र संघ चुनाव कराने की इजाजत मिलने के बाद बीएचयू के छात्रों को भी उम्मीद जगी है. वे अपनी मांग को लेकर प्रशासन पर दबाव बनाने की तैयारी कर रहे हैं.
बीएचयू में पीएचडी के छात्र रोहित राणा ने कहा कि निर्वाचित छात्र संघ नहीं होने से छात्रों के पास अपनी समस्याएं उठाने के लिए कोई प्रभावी मंच नहीं है. उन्होंने कहा, ‘बिना पहले से इजाजत लिए जयंती समारोह आयोजित करना भी गलत माना जा सकता है. मुझे 26 गलत काम के नोटिस दिए गए हैं.’
रोहित राणा के मुताबिक, छात्र अब तक करीब तीन दर्जन बार चुनाव कराने की मांग उठा चुके हैं. इसके बावजूद उनकी मांग पूरी नहीं हुई है.
एएमयू के घटनाक्रम के बाद सक्रिय हुए छात्र
बीएचयू में कानून के छात्र मिहिर उपाध्याय ने बताया कि एएमयू में हुए घटनाक्रम के बाद अलग-अलग छात्र समूहों ने बैठकें शुरू कर दी हैं. इन बैठकों में चर्चा हो रही है कि छात्र संघ चुनाव की मांग विश्वविद्यालय प्रशासन तक कैसे पहुंचाई जाए. छात्र अब अपनी मांग को लेकर आगे की रणनीति बनाने में जुटे हैं.
गोरखपुर विश्वविद्यालय में भी चुनाव की मांग
दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र भी छात्र संघ चुनाव के लिए अपना अभियान दोबारा शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं. हिंदी में पीएचडी कर रहे विवेक कुमार ने कहा कि छात्र अब सवाल उठा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में ही स्थित एएमयू में चुनाव कराने की तैयारी हो सकती है, तो गोरखपुर विश्वविद्यालय में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?
विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर छात्र योगेश प्रताप ने कहा कि लगातार विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल के बावजूद प्रशासन ने चुनाव को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है.
उन्होंने कहा, ‘जब भी हम विरोध करते हैं, विश्वविद्यालय कहता है कि वह इस मामले को अधिकारियों के सामने उठाएगा और राज्यपाल को पत्र लिखेगा. विरोध खत्म हो जाता है, लेकिन किसी को नहीं पता कि उन आश्वासनों का क्या होता है.’ योगेश प्रताप के मुताबिक, गोरखपुर विश्वविद्यालय में आखिरी बार 2017-18 में छात्र संघ चुनाव हुए थे. इसके बाद से छात्र लगातार चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं. गोरखपुर विश्वविद्यालय के मुख्य प्रॉक्टर प्रोफेसर गोपाल प्रसाद और बीएचयू के संदीप पोखरिया से इस मामले में प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क नहीं हो सका.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी उठाए सवाल
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का कहना है कि निर्वाचित छात्र संघ नहीं होने से राजनीतिक शिक्षा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का एक अहम रास्ता कमजोर हुआ है. उनके मुताबिक, विश्वविद्यालयों में छात्र संघ की भूमिका केवल छात्रों की समस्याएं उठाने तक सीमित नहीं है. यह भविष्य के राजनीतिक नेतृत्व को तैयार करने में भी मदद करता है.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र शशांक अनिरुद्ध ने कहा, ‘विश्वविद्यालय पारंपरिक रूप से राजनीतिक नेताओं की नर्सरी रहे हैं. ये ऐसी जगहें हैं, जहां छात्र संगठन बनाना, सार्वजनिक नीतियों को समझना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना सीखते हैं. अगर छात्रों को यूनियन बनाने से मना किया जाएगा, तो वे ये कौशल कैसे सीखेंगे? राजनीतिक शिक्षा और छात्र संगठन बनाने की पूरी प्रक्रिया को कुचल दिया गया है.’
लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू करने की मांग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्नातक छात्र रोशन कुमार ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को लिंगदोह समिति की सिफारिशों के मुताबिक छात्र संघ चुनाव कराने चाहिए. उन्होंने कहा, ‘अगर राज्य की एक यूनिवर्सिटी चुनाव करा सकती है, तो दूसरों को इससे बाहर रखने का कोई कारण नहीं है.’ छात्रों का तर्क है कि जब एक विश्वविद्यालय में चुनाव कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है, तो दूसरे संस्थानों में भी इस पर विचार होना चाहिए. उनका कहना है कि छात्र संघ चुनाव से विद्यार्थियों को अपनी समस्याएं उठाने और लोकतांत्रिक तरीके से नेतृत्व चुनने का अवसर मिलता है.
कॉलेज के छात्रों का भी मिला समर्थन
छात्र संघ चुनाव की मांग को कॉलेज के विद्यार्थियों का भी समर्थन मिल रहा है. बरेली कॉलेज के स्नातक छात्र और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कॉलेज अध्यक्ष शिव कुमार ने कहा कि छात्र संघ चुनाव विद्यार्थियों के जीवन में अहम भूमिका निभाते हैं. उन्होंने चुनाव कराने की मांग का समर्थन किया.
छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी आवाज सुने और छात्र संघ चुनाव कराने की दिशा में ठोस कदम उठाए. अब देखना होगा कि एएमयू में चुनाव को लेकर हुए घटनाक्रम के बाद दूसरे विश्वविद्यालयों में भी इस मांग पर क्या कार्रवाई होती है.

