Kanpur Fake Encounter Case: उत्तर प्रदेश के कानपुर में करीब साढ़े तीन दशक पुराने कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ कांड में कानून का शिकंजा आखिरकार कस गया है. महाराजपुर थाना क्षेत्र में वर्ष 1991 में रची गई मुठभेड़ की मनगढ़ंत पटकथा की सीआईडी (क्राइम ब्रांच) जांच में पोल खुलने के बाद तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. इस बहुचर्चित मामले में जांच एजेंसी ने पुलिस की ओर से दिखाई गई मुठभेड़, गिरफ्तारी और असलहों की कथित बरामदगी पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए झूठे साक्ष्य गढ़ने की पुष्टि की है.
नहीं दिया प्लॉट तो झूठा फंसा
मामले की शिकायत चकेरी के गांधीग्राम निवासी देव प्रसाद पाठक ने शासन से की थी. उनका आरोप था कि मुफ्त में प्लॉट नहीं देने पर तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी ने उनके छोटे भाई राकेश पाठक समेत 12 लोगों को झूठे मुकदमों में फंसा दिया. शिकायत के बाद शासन ने 11 फरवरी 1991 को मामले की जांच सीआईडी की अपराध शाखा, कानपुर खंड को सौंप दी थी.
नर्वल मोड़ पर लूट की साजिश दिखाने का दावा
दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को पुलिस को मुखबिर से सूचना मिलने की बात कही गई थी कि नर्वल मोड़ स्थित जीटी रोड पर बदमाश वाहनों को रोककर लूटपाट करने की तैयारी में हैं. पुलिस ने दावा किया था कि 23 अगस्त की रात करीब 12:30 बजे बदमाशों ने सड़क पर बबूल की डालियां डालकर ट्रक और डीसीएम रोकने की कोशिश की. इसके बाद पुलिस मुठभेड़ में राकेश पाठक समेत 12 लोगों की गिरफ्तारी और असलहे व बम बरामद होने की बात कही गई थी. इसी आधार पर महाराजपुर थाने में दो मुकदमे दर्ज किए गए थे.
ट्रक चालक और क्लीनर के बयान बने अहम
सीआईडी जांच के दौरान डीसीएम चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर बुजेंद्र सिंह के बयान महत्वपूर्ण रहे. दोनों ने कथित मुठभेड़ की कहानी का समर्थन नहीं किया. उनके मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को वे डीसीएम में साबुन लादकर कानपुर से बनारस जा रहे थे. रामादेवी चौराहे पर एक सिपाही वाहन में बैठा और बाद में कुछ अन्य लोगों को भी वाहन में बैठाया गया. इसके बाद डीसीएम को महाराजपुर थाने ले जाया गया.
दोनों के बयानों के मुताबिक, वाहन में सवार पांच लोगों में से दो भाग गए, जबकि तीन को पुलिस ने पकड़ लिया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने बाद में उनसे लिखे हुए कागजों पर हस्ताक्षर कराए, लेकिन उन्हें पढ़कर नहीं सुनाया गया. सीआईडी जांच के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज बयानों में भी कथित मुठभेड़ की कहानी को लेकर सवाल उठे.
घर से उठाया, लाइसेंसी राइफल भी ले गए साथ
शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों ने आरोप लगाया कि राकेश पाठक, दिनेश कुमार, शिवकुमार और जगदीश द्विवेदी को उनके घरों से सोते समय उठाया गया था. आरोप है कि राकेश पाठक के पिता की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और देव प्रसाद पाठक की लाइसेंसी राइफल भी पुलिस अपने साथ ले गई थी. बाद में इन्हें मुकदमों में बरामद हथियारों के रूप में दर्शाने का आरोप लगाया गया. सीआईडी जांच में मौखिक, अभिलेखीय और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई.
6 पुलिसकर्मियों की हो चुकी है मृत्यु
मामले में नामजद 18 पुलिसकर्मियों में तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी, उपनिरीक्षक दुर्विन सिंह, उपनिरीक्षक रमाकांत समेत अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे. इनमें छह की मौत हो चुकी है. शेष 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब प्राथमिकी दर्ज की गई है. आरोपियों में सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक, हेड कांस्टेबल और आरक्षी भी शामिल हैं.
पुलिसकर्मियों के खिलाफ झूठे साक्ष्य गढ़ने, लोकसेवक को गलत सूचना देने, गलत अभिलेख तैयार करने, अवैध रूप से हिरासत में रखने और चोट पहुंचाने समेत आठ धाराओं में आरोप लगाए गए हैं. करीब साढ़े तीन दशक पुराने इस मामले में मुकदमा दर्ज होना कानपुर पुलिस के लिए बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है. अब मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों पर नजर रहेगी. आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होगी.
