UP Election 2027 Asaduddin Owaisi: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटों को लेकर सियासी हलचल बढ़ रही है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सामने अब असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM भी चुनौती पेश करने की तैयारी में है. जिसके बाद से ही पश्चिमी यूपी की मुस्लिम बहुल सीटों पर ओवैसी की सक्रियता की चर्चा लगातार बनी हुई है. पश्चिमी यूपी में कई ऐसे जिले हैं जहां मुस्लिम आबादी राज्य के औसत से ज्यादा है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या उनकी एंट्री सपा की साइकिल और कांग्रेस के हाथ का चुनावी गणित बिगाड़ सकती है? जान लेते हैं पश्चिमी यूपी की पूरी कहानी.
पश्चिमी यूपी में कहां कितनी मुस्लिम आबादी?
पश्चिमी यूपी में मुस्लिम आबादी का आंकड़ा जिले-दर-जिले अलग है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, रामपुर में मुस्लिम आबादी 50.57 फीसदी थी. मुरादाबाद में यह 47.12 फीसदी, बिजनौर में 43.04 फीसदी और सहारनपुर में 41.95 फीसदी थी. मुजफ्फरनगर की तत्कालीन जिला सीमा में यह हिस्सा 41.30 फीसदी था. अमरोहा, जिसे उस समय ज्योतिबा फुले नगर कहा जाता था. वहां मुस्लिम आबादी 40.78 फीसदी दर्ज की गई थी. मेरठ में यह 34.43 फीसदी और बरेली में 34.54 फीसदी थी. इन आंकड़ों को देखें तो रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और अमरोहा जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका बहुत खास है.
रामपुर से अमरोहा तक मुस्लिम आबादी के आंकड़े
| पश्चिमी यूपी: जिलेवार मुस्लिम आबादी के आंकड़े:- नीचे दिए गए आंकड़े 2011 की जनगणना पर आधारित हैं. | |
|---|---|
| जिला | मुस्लिम आबादी का हिस्सा |
| रामपुर | 50.57% |
| मुरादाबाद | 47.12% |
| बिजनौर | 43.04% |
| सहारनपुर | 41.95% |
| मुजफ्फरनगर 41.30% | |
| अमरोहा | 40.78% |
| मेरठ | 34.43% |
| बरेली | 34.54% |
| स्रोत: जनगणना 2011 के धर्म-आधारित आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली Centre for Policy Studies की रिपोर्ट. |
200 सीटों पर चुनाव लड़ने की चर्चा
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को लेकर सपा, कांग्रेस और AIMIM के बीच सियासी मुकाबले की चर्चा तेज है. AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी यूपी में अपनी पार्टी का आधार बढ़ाना चाहते हैं. हाल की खबरों में पार्टी के करीब 150 से 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की संभावना का जिक्र आया है. ओवैसी मुस्लिम समुदाय को केवल वोट देने तक सीमित न रहने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात भी कहते रहे हैं. सपा के साथ संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चा हुई, लेकिन दोनों दलों के बीच सहमति बनने की पुष्टि नहीं हुई है. ऐसे में AIMIM अलग रास्ता चुनती है, तो विपक्षी दलों के बीच मुकाबले की स्थिति कुछ सीटों पर बदल सकती है.
क्या 24 सीटों पर ओवैसी की नजर?
पश्चिमी यूपी में रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, सहारनपुर, बिजनौर, शामली और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों को लेकर चर्चा तेज है. अगर हम विधानसभा क्षेत्रों की बात करें तो रामपुर नगर, चमरौआ, स्वार, कुंदरकी, मुरादाबाद ग्रामीण, संभल, असमोली, अमरोहा, बेहट, कैराना और नगीना जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं पर सबकी नजर है. हां एक बात यहां हम आपको क्लियर कर देते हैं कि जिला स्तर पर मुस्लिम आबादी ज्यादा होने का मतलब यह नहीं है कि जिले की हर विधानसभा सीट पर भी वही अनुपात होगा. इसी तरह, किसी सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी संख्या होने से यह तय नहीं हो जाता कि चुनाव का नतीजा केवल उन्हीं के वोट तय करेंगे. इसलिए वोटों के अलावा बहुत सारे समीकरण चीत-हार के समीकरण तय करते हैं. लेकिन उसमें एक मुश्त वोट पड़ने वालों की ताकत थोड़ी अधिक होती है. जिन्हें एक तरफा वोट मिल गया तो वह बढ़त पा जाते हैं.
वोट बंटे तो सपा-कांग्रेस को नुकसान?
सपा लंबे समय से यूपी में बीजेपी की प्रमुख विरोधी पार्टियों में रही है. कांग्रेस भी राज्य में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में AIMIM अगर कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारती है, तो वहां तीनों दलों के बीच वोटों का बंटवारा संभव है. यदि बीजेपी विरोधी मतदाता अलग-अलग पार्टियों को वोट देते हैं, तो कुछ सीटों पर मुकाबले का अंतर बदल सकता है. इससे बीजेपी को फायदा मिलने की संभावना भी बन सकती है. हालांकि, हर सीट पर ऐसा ही होगा यह मानना सही नहीं है. किसी क्षेत्र में AIMIM का स्थानीय संगठन कितना मजबूत है, उम्मीदवार की पहचान क्या है, सपा और कांग्रेस किसे टिकट देती हैं और दूसरी पार्टियों का प्रदर्शन कैसा रहता है, इन सभी बातों का असर होगा.
पश्चिम यूपी में गन्ना, रोजगार और खेती भी बनेंगे मुद्दे
पश्चिमी यूपी के चुनाव में मुस्लिम आबादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ स्थानीय समस्याएं भी मेन है. जिसमें गन्ने का बकाया, फसल का उचित दाम, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और सिंचाई जैसे मुद्दे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं. लेकिन इतना तो साफ है कि AIMIM पश्चिमी यूपी समेत प्रदेश में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है. अगर पार्टी अलग चुनाव लड़ती है, तो सपा और कांग्रेस के लिए कुछ सीटों पर चुनौती बढ़ सकती है. लेकिन ओवैसी की मौजूदगी से किसे कितना फायदा या नुकसान होगा, इसका फैसला उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों, गठबंधन और मतदाताओं के रुझान से होगा. जो आने वाला समय बताएगा.
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