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कुछ गाने ऐसे होते हैं, जिन्हें सुनते ही आंखें नम हो जाती हैं. उर्मिला मातोंडकर का 23 साल पुराना एक गाना भी ऐसा ही है, जिसे सुनकर आज भी बेटियां अपनी मां को याद कर भावुक हो जाती हैं. अमृता प्रीतम के बोल और प्रीति की आवाज से सजे इस गाने को संगीत उत्तम सिंह ने दिया. आज भी इस गाने के एक एक बोल बेटियों का सीना छलनी कर देता है. वो गाना है फिल्म ‘पिंजर’का हिट गाना ‘चरखा चलाती मां’.
गाने ने लोगों को थिएटर में रोने पर कर दिया था मजबूर
नई दिल्ली. 23 साल पुराना वो गाना जिसे सुनकर आज भी बेटियां रो पड़ती हैं. इतना ही नहीं इस गाने को गाते हुए सिंगर के भी आंसू बहने लगे थे. अमृता प्रीतम का लिखा वो गाना है, फिल्म ‘पिंजर’का हिट गाना ‘चरखा चलाती मां’. इस गाने में उर्मिला दिल खोलकर रोई थीं. गाने को बोल भी बेहद शानदार हैं.आज भी ये गाना सुनते ही सीधा दिल में उतर जाता है.
साल 2003 में आई उर्मिला और मनोज बाजपेयी की फिल्म ‘पिंजर’ भले ही बहुत बड़ी सफल नहीं रही. लेकिन फिल्म को लोगों ने काफी पसंद किया था. फिल्म के इस गाने में मां के प्यार, बेटी की विदाई और परिवार से बिछड़ने के दर्द सब कुछ दिखाया गया. पंजाबी की मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम के लिखे बोल, प्रीति उत्तम सिंह की आवाज और उत्तम सिंह का संगीत इसे आज भी लोगों के दिल के करीब रखे हुए हैं.
गाने में दिखता है मां-बेटी के रिश्ते का दर्द
पिंजर के इस गाने की सबसे अहम चीज है, इस गाने के बोल. इस गाने के बोल उस सोच को भी सामने लाते हैं, जहां बेटों को घर का वारिस माना जाता है, जबकि बेटियों को शादी के बाद दूसरे घर जाना होता है. आखिर बेटी को अपना घर छोड़कर जाना ही क्यों पड़ता है? यह सवाल गीत को सिर्फ एक मां और बेटी के रिश्ते तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि समाज की पुरानी परंपराओं पर भी सोचने को मजबूर करता है. अमृता प्रीतम के लिखे शब्दों को प्रीति उत्तम सिंह ने जिस भावुक अंदाज में गाया है, वह इस गीत के असर को और गहरा कर देता है. उत्तम सिंह की बेटी और गायिका प्रीति उत्तम जिस वक्त ये गाना गा रही थी, उस वक्त वह कई बार रो भी पड़ी थीं.
उर्मिला मातोंडकर और मनोज बाजपेयी की जमी जोड़ी
साल 2003 में आई फिल्म ‘पिंजर’ के डायरेक्शन की कमान चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने संभाली थी. फिल्म की कहानी भारत के बंटवारे के दौर पर आधारित थी. फिल्म में उस समय की हिंसा, लोगों के पलायन और खासकर महिलाओं की जिंदगी पर पड़े गहरे असर को दिखाया गया था. फिल्म में उर्मिला मातोंडकर ने पूरो का किरदार निभाया था, जबकि मनोज बाजपेयी राशिद के रोल में नजर आए थे. इनके अलावा फिल्म में संजय सूरी, प्रियांशु चटर्जी, संदली सिन्हा, ईशा कोप्पिकर, लिलेट दुबे, फरीदा जलाल और कुलभूषण खरबंदा भी अहम भूमिकाओं में थे. फिल्म की कहानी मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम के उपन्यास ‘पिंजर’ से ली गई थी.
बता दें कि इस गाने के बोल आज भी आज भी मां और बेटियों के कलेजे को चीर देते हैं. इस गीत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें भारी-भरकम शब्दों के बजाय रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी चीजों के सहारे गहरी बात कही गई है. मां का चरखा चलाना, धागा बनाना और सपनों की चादर बुनना, ये सभी बातें बेटी के लिए उसके प्यार और उम्मीदों को दर्शाती हैं. लेकिन जैसे ही बेटी की विदाई का ख्याल आता है, गीत का भाव बदल जाता है. गाने में बेटों और बेटियों के बीच समाज के अलग-अलग नजरिए को भी सामने रखा गया है. बेटों को घर और संपत्ति से जोड़कर देखा जाता है, जबकि बेटी को शादी के बाद दूसरे घर की मान लिया जाता है. यही वजह है कि इस गीत को सुनते हुए कई लोगों को अपनी मां, बेटी या घर से जुड़ी यादें ताजा हो जाती हैं.
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न्यूज 18 हिंदी में एंटरटेनमेंट सेक्शन में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार दिल्ली के रहने वाले हैं. डिजिटल मीडिया में उन्हें 10 साल का अनुभव है.राजधानी कॉलेज (DU) से पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) की पढ…
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