अमेठी: ‘ख्वाहिशों से नहीं गिरते फूल झोली में, अपने कर्म की साख को हिलाना पड़ता है. अंधेरे को खोजने से कुछ नहीं होता, अपने हिस्से का दीया खुद जलाना पड़ता है’, इस कहावत को अमेठी के युवा खिलाड़ी ने सच साबित कर दिखाया है. पिता की मौत के बाद जिस सलमान खान पर जिम्मेदारियां का बोझ था, वही सलमान आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए. उनकी कहानी काफी संघर्षभरी है. आईए समझते हैं उनकी कहानी.
अमेठी के सलमान की कहानी काफी संघर्षों भारी है. 2016 में उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद सबसे बड़ा बेटा होने के कारण उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई और परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ सलमान के सिर पर था. पिता का सपना था कि सलमान सेना में जाए और देश की सेवा करे. सलमान ने भी उस सपने को पूरा किया और उनकी मेहनत ही उन्हें प्रमोशन के साथ इस गेम के सफर तक पहुंचने में उनका रास्ता बनी.
पहले भी जीत चुके हैं कई मेडल
अमेठी के धिगीइ गांव के रहने वाले सलमान खान ने विश्व पटेल पर देश का मान बढ़ाया है. एशियन गेम्स 2026 में कांस्य पदक जीतकर अमेठी का गौरव बढ़ाया है. जिस नौकायन खेल की सलमान खान को जानकारी तक नहीं थी, उसी में उन्होंने दुनिया के बड़े खेल मंच पर देश का मान बढ़ाया. तिलोई के धिगीइ खेरहना गांव निवासी सलमान ने जापान में आयोजित एशियन गेम्स 2026 में पुरुष डबल स्कल्स में कांस्य पदक जीता. उनकी यह उपलब्धि संघर्ष, मेहनत और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच लक्ष्य हासिल करने की कहानी है.
खेल से कर दिया था इनकार
साल 2018 में मुंबई इंजीनियर ग्रुप, पुणे के जरिये सेना में भर्ती हुए सलमान का वर्ष 2019 में लंबाई अधिक होने के कारण नौकायन टीम में चयन हुआ. शुरुआत में उन्होंने खेल से इनकार कर दिया. आर्मी के मेजर नागेंद्र हुड्डा के समझाने पर नाव संभाली और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 2021 में रोइंग का नियमित ट्रेनिंग शुरू की फिर 2022 में टीम में जगह बनाई और गुजरात की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहले ही मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता. 2024 में ओलंपिक के लिए चयन हुआ, मगर ट्रायल में सफलता नहीं मिली.
इसके बाद दक्षिण कोरिया में एशियाई रोइंग चैंपियन कप में स्वर्ण पदक जीतना उनके करिअर का बड़ा मोड़ बना. इस उपलब्धि के बाद सेना में सिपाही से सीधे नायब सूबेदार पद पर पदोन्नति मिली. साल 2026 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में रजत पदक के बाद एशियन गेम्स के लिए चयन हुआ. जापान में 1500 मीटर में रजत और 1800 मीटर में स्वर्ण हासिल किया. फाइनल में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने तिरंगे का मान बढ़ाया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे हैं सलमान
सलमान ने लोकल 18 से खास बातचीत में बताया कि उनकी कहानी काफी संघर्षों भरी है और उन्होंने 2016 से लेकर 26 तक 10 सालों में कई बार असफल होने के बावजूद भी हार नहीं मानी. उन्होंने कहा कि आज जिस तरीके से एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनी है, उसमें सबका योगदान है और एक सफल होने के पीछे सबका साथ होता है. उन्होंने कहा कि पिता का सपना था कि वह सेवा में जाएं, लेकिन पिता की मौत के बाद वह बड़े थे तो परिवार की जिम्मेदारी भी थी. लेकिन दोस्त ने सहारा बनकर उनके साथ दिया और वह सेना में चले गए और आखिरकार इस एशियन गेम में वह इसी सेना के रास्ते वह सफल हो गए.
टैक्सी चलाकर परिवार का किया भरण पोषण
उन्होंने कहा कि संघर्ष का वह भी दिन था, जब उन्होंने अपनी खुद की गाड़ी से टैक्सी तक चलाई थी और परिवार का भरण पोषण किया था. आज वह सफल हैं, तो उन्हें बहुत खुशी है और भावुक भी हैं. उन्होंने कहा कि युवाओं को यही संदेश है कि कभी असफल होने पर हार न मानें और संघर्ष करते रहें, एक दिन उनकी सफलता उनके कदमों पर जरूर आएगी. वह सफल होने के साथ-साथ अपनी पहचान बनाने में कामयाब होंगे.

