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Kumkum Mahod father makes cardboard boxes: महाराष्ट्र की कुमकुम मोहोद ने एशियन गेम्स 2026 में इतिहास रचते हुए महिला इंडिविजुअल रिकर्व में भारत को 48 साल बाद पहला पदक और सीधा स्वर्ण दिलाया है. कभी अपनी दादी के 3000 रुपये से साधारण लकड़ी का धनुष खरीदने वाली कुमकुम ने फाइनल में दक्षिण कोरिया की दिग्गज तीरंदाज को शूट-ऑफ में 6-5 से मात दी. एक सेकंड-हैंड धनुष और सीमित संसाधनों के बावजूद, कुमकुम का यह सफर उनके और उनके पिता के कड़े संघर्ष की शानदार मिसाल है. इस गेम्स में यह उनका दूसरा स्वर्ण है.
कुमकुम मोहोद के पिता मिठाई शॉप के लिए डिब्बे बनाते हैं.
नई दिल्ली. खेल की दुनिया में कुछ कहानियां महज जीत के आंकड़े नहीं होतीं, बल्कि वे जज्बे, संघर्ष और कभी हार न मानने की जिद का जीवंत दस्तावेज होती हैं. महाराष्ट्र के अमरावती की रहने वाली कुमकुम मोहोद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. जिस लड़की ने कभी अपनी दादी के दिए पैसों से तीन हजार रुपये का एक साधारण लकड़ी का धनुष खरीदा था, उसने आज एशियन गेम्स 2026 में भारत के लिए इतिहास रच दिया है. कुमकुम ने न सिर्फ भारत को 17वां स्वर्ण पदक दिलाया, बल्कि उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसका इंतजार भारतीय खेल प्रेमी पिछले 48 सालों से कर रहे थे.
कुमकुम मोहोद (Kumkum Mahod) के इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत साल 2018 में हुई थी. उनकी मां रूपाली ने जब एक रिश्तेदार की बेटी को अमरावती की राधे आर्चरी अकादमी में ट्रेनिंग करते देखा, तो उन्होंने कुमकुम को भी इस खेल से जुड़ने के लिए प्रेरित किया. लेकिन एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए तीरंदाजी जैसे महंगे खेल को चुनना आसान नहीं था. उनके पिता अनिल मोहोद अमरावती में मिठाई की दुकानों के लिए कार्डबोर्ड के डिब्बे बनाने का काम करते हैं. परिवार का पूरा खर्च और कुमकुम की ट्रेनिंग का बोझ इसी छोटे से व्यवसाय पर टिका था.
पिता का त्याग और एक ‘सेकंड-हैंड’ धनुष
शुरुआती दौर में जब सफर और ट्रेनिंग का खर्च उठाना मुश्किल होने लगा, तो उनके पिता ने हार नहीं मानी. वे खुद अपनी मोटरसाइकिल पर बेटी को हर दिन अकादमी तक ले जाने लगे. कुमकुम की शुरुआत एक पारंपरिक बांस के धनुष से हुई थी. दादी के दिए 3000 रुपयों से खरीदे गए उस पहले लकड़ी के धनुष ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी थी. इस साधारण शुरुआत के बावजूद, महज छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद ही उन्होंने सब-जूनियर नेशनल में रजत पदक अपने नाम कर लिया था. संसाधनों की भारी कमी के बावजूद उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ. हैरानी की बात यह है कि आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तहलका मचाने वाली यह चैंपियन अब भी पांच साल पुराने एक ‘सेकंड-हैंड’ धनुष का ही इस्तेमाल कर रही है.
2026 बना टर्निंग पॉइंट और प्रीमियर लीग का अनुभव
उनकी प्रतिभा को असल उड़ान साल 2026 में मिली, जो उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. उन्होंने शंघाई में आयोजित आर्चरी वर्ल्ड कप स्टेज 2 में भारतीय महिला टीम को स्वर्ण पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई. इसके बाद अंताल्या में हुए स्टेज 3 में उन्होंने धीरज बोम्मदेवरा के साथ मिलकर मिक्स्ड टीम स्पर्धा का स्वर्ण भी अपने नाम किया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े मैचों के दबाव को झेलने की उनकी क्षमता आर्चरी प्रीमियर लीग (एपीएल) के पहले सीजन से काफी निखरी. एपीएल ने कुमकुम को दुनिया के बेहतरीन तीरंदाजों के साथ खेलने और एक बेहद तेज गति वाले प्रतिस्पर्धात्मक माहौल का अनुभव दिया. इस लीग में हर शॉट के लिए केवल 15 सेकंड का टाइमर होता है. इस सख्त समय सीमा ने कुमकुम को तेजी से फैसले लेने और भारी दबाव के बीच अचूक निशाना लगाने की कला सिखाई. यही अनुभव उनके बहुत काम आया, खासकर जब वे इतनी कम उम्र में सीनियर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के मंच पर उतरीं.
48 साल का सूखा खत्म कर कोरियाई वर्चस्व को दी मात
जापान के नागोया में चल रहे 2026 एशियन गेम्स में कुमकुम इसी मानसिक मजबूती के साथ मैदान में उतरी थीं. महिला इंडिविजुअल रिकर्व के फाइनल में उनका सामना तीरंदाजी में हमेशा से दबदबा रखने वाले दक्षिण कोरिया की मजबूत खिलाड़ी येजिन ओह से था. मुकाबला इतना कांटे का था कि फैसला शूट-ऑफ तक पहुंच गया. लेकिन दबाव की भट्ठी में तपकर कुंदन बनीं कुमकुम ने यहां अपने स्नायुतंत्र पर गजब का नियंत्रण दिखाया और 6-5 से शानदार जीत दर्ज करते हुए स्वर्ण पदक अपने गले में सजा लिया.
कुमकुम मोहोद ने गोल्ड जीतकर रचा इतिहास.
यह जीत कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है. 1978 में जब एशियन गेम्स में इस स्पर्धा को शुरू किया गया था, तब से लेकर 2026 तक भारत की कोई भी महिला तीरंदाज इंडिविजुअल रिकर्व स्पर्धा में पदक नहीं जीत सकी थी. कुमकुम ने इस 48 साल के सूखे को न सिर्फ खत्म किया, बल्कि देश को सीधा स्वर्ण पदक दिलाया. दक्षिण कोरियाई वर्चस्व को तोड़ते हुए हासिल किया गया यह पदक भारतीय तीरंदाजी के लिए एक नई सुबह है.
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कमलेश कुमार राय नेटवर्क18 ग्रुप में बतौर चीफ सब एडिटर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. वह बीते 15 सालों से खेल पत्रकारिता की पिच पर डटे हुए हैं. हिंदी स्पोर्ट्स सेक्शन में वह खेल कंटेंट की गहरी समझ, सटीक विश्लेषण और ब…
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