नई दिल्ली. जिस मुक्केबाज को फाइनल से पहले सिर्फ 2 फीसदी जीत का दावेदार माना जा रहा था, उसने रिंग में उतरते ही सारे समीकरण बदल दिए. सामने मौजूदा एशियन चैंपियन चीन की मुक्केबाज थी, लेकिन लवलीना बोरगोहेन के इरादे उससे कहीं ज्यादा मजबूत थे. जन्मदिन के मौके पर लवलीना ने सिर्फ गोल्ड मेडल नहीं जीता, बल्कि उन तमाम आलोचकों को भी जवाब दे दिया, जिन्होंने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में मिली हार के बाद उन्हें ट्रोल किया था. यह जीत सिर्फ एक मुकाबले की नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और खुद को साबित करने के जज्बे की कहानी है.
एशियन गेम्स का फाइनल लवलीना बोरगोहेन के लिए बिल्कुल आसान नहीं था. उनके सामने चीन की मौजूदा एशियन चैंपियन मुक्केबाज थी. मुकाबले से पहले एक बॉक्सिंग ऐप ने भी लवलीना की जीत की संभावना महज 2 फीसदी बताई थी. लेकिन खेल कभी किसी ऐप के आंकड़ों से नहीं जीता जाता. यहां जीत के लिए जज्बा, मेहनत, प्रतिबद्धता और सही रणनीति की जरूरत होती है. लवलीना के पास ये सभी खूबियां थीं और अपने जन्मदिन पर वह किसी भी कीमत पर हार मानने को तैयार नहीं थीं.
ग्लासगो में ट्रोल हुईं, अब गोल्ड से दिया जवाब
लवलीना के लिए यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद उन्हें काफी आलोचनाओं और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा था. दुख की बात यह थी कि कुछ वरिष्ठ जानकारों ने भी उनकी उपलब्धि को सही नजरिए से देखने के बजाय उनके खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाने में हिस्सा लिया. हकीकत यह थी कि लवलीना ने ऑस्ट्रेलिया की एम्मा सु ग्रीनट्री के खिलाफ बेहद करीबी मुकाबले में फाइनल गंवाया था. उनकी प्रतिद्वंद्वी अनुभवी मुक्केबाज थीं और दो बार वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक जीत चुकी थीं. ऐसे में एक करीबी हार के बाद लवलीना के खेल पर सवाल उठाना सही नहीं था.
आलोचना का जवाब मेडल से
कुछ लोगों ने इस बात को लेकर भी उनकी आलोचना की कि वह सिर्फ एक मुकाबला जीतकर सिल्वर मेडल लेकर लौट रही हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या लवलीना ने खुद बाई मांगी थी? बिल्कुल नहीं. वह ग्लासगो में मुकाबला करने और अपने दम पर आगे बढ़ने पहुंची थीं. अगर उन्हें किसी दौर में बाई मिली, तो वह प्रतियोगिता के नियमों का हिस्सा था. खेल में किस्मत की भी भूमिका होती है और बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी. लेकिन लवलीना ने इन आलोचनाओं का जवाब शब्दों से नहीं, बल्कि अपने प्रदर्शन से दिया.
मैरी कॉम भी नहीं कर सकीं जो, लवलीना ने कर दिखाया
लवलीना ने एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया. वह दो एशियन गेम्स फाइनल में पहुंचने वाली भारत की पहली महिला मुक्केबाज बन गईं और इनमें से एक फाइनल जीतकर उन्होंने स्वर्ण पदक भी अपने नाम किया. महान मुक्केबाज मैरी कॉम भी अपने करियर में दो एशियन गेम्स फाइनल तक नहीं पहुंच सकी थीं. ऐसे में लवलीना की यह उपलब्धि भारतीय बॉक्सिंग के लिए बेहद खास है.
रिंग में प्रदर्शन तय करता है पहचान
लवलीना की कहानी हर उस खिलाड़ी के लिए एक मिसाल है, जिसे आलोचनाओं और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है. अगर आप किसी खिलाड़ी का समर्थन नहीं कर सकते तो कम से कम उसके प्रदर्शन को कमतर दिखाने से बचना चाहिए. किसी खिलाड़ी की उपलब्धि को छोटा बताने से खेल का कोई भला नहीं होता. लवलीना का यह सफर बताता है कि एक हार किसी खिलाड़ी की पहचान तय नहीं करती. ग्लासगो की निराशा से निकलकर एशियन गेम्स के गोल्ड मेडल तक पहुंचना उनके संघर्ष और मेहनत का प्रमाण है.

