आप जानते हैं कि आजकल एशियन गेम्स चल रहे हैं. भारत और वेस्टइंडीज के बीच क्रिकेट सीरीज भी चल रही है. रेडियो पर कमेंट्री आती है. दूरदर्शन पर आती है. निजी टीवी चैनलों पर भी आती है. मैच देखते हुए आवाज साथ चलती है. पर सुनने का आनंद अब कम रह गया है. भाषा ढीली पड़ गई है. खेल का गहरा ज्ञान भी कम दिखता है. वाक्य अधूरे रहते हैं. आंकड़े गलत निकलते हैं. उत्साह नारेबाजी बन जाता है. समझ पीछे रह जाती है. दर्शक देखता है. सुनता भी है. फिर भी संतोष नहीं मिलता.
एक दौर और था. उस दौर में लोग रेडियो से दूर नहीं होते थे. टीवी से भी नहीं उठते थे. सुशील दोषी कमेंट्री करते थे. रवि चतुर्वेदी कमेंट्री करते थे. बी.पी. ओझा भी कमेंट्री करते थे. आवाज शांत होती थी. वाक्य पूरे होते थे. खेल की समझ साफ होती थी. श्रोता मैदान को आंखों से देख लेता था. भले वह घर में बैठा हो. कमरे में बैठकर भी मैदान दिख जाता था. क्योंकि शब्द पूरे होते थे.
सुशील दोषी की आवाज पहचान बन गई थी. क्रिकेट में उनकी शैली घर-घर पहुंची. रवि चतुर्वेदी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे. पढ़ाई और खेल दोनों उनके पास थे. बी.पी. ओझा भारत सरकार में आला अधिकारी थे. वे केवल माइक के पीछे नहीं बैठे थे. वे मैदान भी जानते थे. वे राज्य स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी रहे थे. दिल्ली हॉकी लीग भी खेली थी. रेफरी भी रहे थे. इसलिए उनकी कमेंट्री में केवल शब्द नहीं होते थे. अनुभव होता था.
ओझा ने कमेंट्री 1978 में शुरू की. उसके बाद कई बड़े आयोजन उनके हिस्से आए. उन्होंने डीसीएम और डूरंड फुटबॉल कप के कई फाइनल देखे. रोवर्स कप देखा. संतोष ट्रॉफी देखी. आईएफए शील्ड के फाइनल देखे. 1984 में सिंगापुर में एशिया कप फुटबॉल कवर किया. 1986 का हॉकी विश्व कप देखा. 1988 के सियोल ओलंपिक देखे. 1982 के दिल्ली एशियाई खेल देखे. अनेक टेस्ट मैच कवर किए.
यह सूची लंबी है. पर सूची से बड़ी बात यह है कि एक ही व्यक्ति हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट तीनों खेलों में माहिर था. आज ऐसा कमेंटेटर खोजना कठिन है. एक खेल में भी पकड़ अधूरी रहती है. तीन खेलों में पकड़ तब और दुर्लभ थी. ओझा के पास वह पकड़ थी. क्योंकि वे मैदान से आए थे. केवल स्टूडियो से नहीं आए थे. खिलाड़ी रहे. रेफरी रहे. फिर कमेंटेटर बने. यह क्रम उनकी आवाज में साफ सुनाई देता था.
जसदेव सिंह भी स्तरीय थे. उनकी आवाज पहचान बन गई थी. ओलंपिक और बड़े आयोजनों में वे घर-घर पहुंचे. गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की कमेंट्री भी उनके नाम रही. टीवी के आने के बाद उन पर सवाल भी उठे. नई माध्यम की मांग अलग थी. कैमरा सब दिखा देता था. कमेंटेटर से अब वर्णन कम, अर्थ अधिक चाहिए था. कुछ लोग मानते थे कि जसदेव सिंह पुरानी शैली में अटके रहे. कुछ मानते थे कि टीवी ने अपेक्षाएं बदल दीं. विवाद रहा. पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह पीढ़ी बिना तैयारी के माइक पर बैठती थी.
आज भाषा टूट गई है
आज की शिकायत इससे आगे की है. भाषा टूट गई है. हिंदी में अंग्रेजी के अधूरे शब्द घुस आए हैं. क्रिकेट में हर गेंद पर एक ही उत्साह दोहराया जाता है. हॉकी में मैदान की समझ कम दिखती है. फुटबॉल में नियम अधूरे बताए जाते हैं. एशियन गेम्स जैसे बड़े मंच पर भी यही हाल है. कई खेल एक साथ चलते हैं. दर्शक को नाम भी नए लगते हैं. नियम भी नए लगते हैं. तब कमेंटेटर का काम और बढ़ जाता है. पर कई बार कमेंटेटर खेल की बारीकी से ज्यादा खुद को सामने रखते हैं. दर्शक थक जाता है. कान ऊब जाते हैं.
पुरानी कमेंट्री में संयम था. चुप्पी भी भाषा का हिस्सा होती थी. जब स्ट्रोक लगे तो शब्द कम होते थे. जब विकेट गिरे तो वाक्य साफ होता था. जब गोल हुआ तो आवाज उठती थी. पर अर्थ नहीं खोता था. ओझा और चतुर्वेदी के यहां खेल पहले आता था. सुशील दोषी के यहां भी खेल पहले आता था. व्यक्ति बाद में आता था.
भाई-भतीजावाद ने स्तर गिराया
अब सवाल यह है कि ऐसी आवाजें क्यों कम हो गईं. एक जवाब बार-बार आता है. रेडियो और टीवी कमेंट्री में भाई-भतीजावाद जम गया. जो मैदान जानते थे, उन्हें जगह नहीं मिली. जो अंदर की गलियारे जानते थे, वे माइक तक पहुंच गए. योग्यता पीछे रह गई. पहचान आगे आ गई. नए चेहरे आए. पर नई तैयारी नहीं आई. खेल का पाठ अधूरा रहा. भाषा का अभ्यास अधूरा रहा.
कमेंट्री कोई हल्की कला नहीं है. आंख से देखना होता है. दिमाग से जोड़ना होता है. फिर सरल वाक्य में कहना होता है. आज निजी चैनल ज्यादा हैं. घंटे ज्यादा हैं. मैच ज्यादा हैं. फिर भी संतोष कम है. क्योंकि मात्रा बढ़ी है. स्तर नहीं बढ़ा. एशियन गेम्स चल रहे हैं. कई खेल एक साथ दिख रहे हैं. दर्शक को गाइड चाहिए. नियम समझाने वाला चाहिए. इतिहास याद दिलाने वाला चाहिए. केवल शोर नहीं चाहिए. क्रिकेट सीरीज में भी यही जरूरत है.
पुरानी पीढ़ी पूर्ण नहीं थी. उन पर भी आलोचना हुई. यह स्वाभाविक है. समय बदलता है. शैली बदलती है. पर मूल बात नहीं बदलनी चाहिए. मूल बात खेल की समझ है. भाषा की साफगोई है. दर्शक के प्रति सम्मान है.ओझा की विशेषता यही सम्मान था. वे मैदान का सम्मान करते थे. खिलाड़ी का सम्मान करते थे. श्रोता का भी सम्मान करते थे. इसलिए उनकी कमेंट्री में दिखावा कम था. तथ्य ज्यादा थे. वे फाइनल मैचों में बैठे. विश्व कप देखे. ओलंपिक देखे. एशियाई खेल देखे. फिर भी आवाज में संयम रहा. यह संयम आज गायब है. जोर से बोलना आसान है. साफ बोलना कठिन है. अगर भाई-भतीजावाद न होता तो शायद और बेहतर कमेंटेटर सामने आते. और सुशील दोषी जैसे लोग लंबे समय तक बचते.
कसौटी वही रहनी चाहिए
आज जरूरत केवल नए चेहरों की नहीं है. जरूरत पुरानी कसौटी की है. खेल जानो. भाषा संभालो. दर्शक को साथ रखो. एशियन गेम्स इसी कसौटी पर चल रहे हैं. क्रिकेट सीरीज भी इसी कसौटी पर चल रही है. माइक खुला है. पर कान संतुष्ट नहीं हैं. यही अफसोस है. और यही याद भी है. एक समय था जब कुछ कमेंटेटर बोलते थे तो लोग रेडियो के पास बैठे रहते थे. टीवी के पास बैठे रहते थे. वह समय पूरी तरह नहीं लौटेगा. पर उसका स्तर लौट सकता है. अगर योग्यता को रिश्ता से ऊपर रखा जाए.

