UP 2027: का कहत बा यूपी? | Part 23
पश्चिमी यूपी में कैराना से सपा सांसद इकरा हसन और सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के बीच बीते दिनों जिस तरह बयानबाजी तेज हुई, उसने सपा-कांग्रेस गठबंधन की बातचीत को भी सार्वजनिक बहस में ला दिया है. इमरान मसूद कांग्रेस के संगठन और सीटों पर दावेदारी की बात कर रहे हैं, तो इकरा हसन सपा और अखिलेश यादव की राजनीतिक भूमिका को सामने रखकर कांग्रेस के दावे पर सवाल उठा रही हैं. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इकरा और इमरान में कौन किसे जवाब दे रहा है किस स्तर पर दे रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जुबानी जंग के पीछे दोनों पार्टियों की कौन-सी राजनीतिक जरूरत काम कर रही है? इमरान मसूद लगातार मुखर क्यों हैं? सपा ने उनके जवाब में इकरा हसन को ही आगे क्यों किया? अमीर आलम और नवाजिश आलम की कांग्रेस में एंट्री का पश्चिमी यूपी के इस समीकरण से क्या कनेक्शन है? और क्या सहारनपुर से शामली और मुजफ्फरनगर तक कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश कर रही है? इन सवालों के जवाब सिर्फ स्थानीय सियासत में नहीं मिलते. इनके तार दिल्ली और लखनऊ में चल रही गठबंधन, सीट बंटवारे और संगठन की रणनीति से भी जुड़े हैं. आइए, UP 2027: का कहत बा यूपी? पार्ट 23 में इकरा हसन और इमरान मसूद की इस सियासी भिड़ंत की पूरी कहानी सिलसिलेवार समझते हैं.
इकरा बनाम इमरान नहीं, यह पश्चिमी यूपी की सियासी जमीन की लड़ाई है
इकरा हसन और इमरान मसूद की बयानबाजी को अगर सिर्फ दो सांसदों की व्यक्तिगत नाराजगी माना जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह लड़ाई तीन स्तरों पर एक साथ चल रही है. पहला, 2027 के लिए सपा और कांग्रेस के बीच सीटों की दावेदारी. दूसरा, मुस्लिम नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा. तीसरा, सहारनपुर से शामली और मुजफ्फरनगर तक संगठन को मजबूत करने की कवायद. असल में 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने गठबंधन के तहत अच्छा प्रदर्शन किया. इसके बाद कांग्रेस के भीतर यह धारणा मजबूत हुई कि पश्चिमी यूपी में पार्टी को पहले से ज्यादा राजनीतिक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. दूसरी तरफ सपा मानती है कि उत्तर प्रदेश में उसकी जमीनी ताकत और संगठन कांग्रेस से कहीं बड़ा है. यही वजह है कि सीट बंटवारे का सवाल अब सार्वजनिक बयानबाजी तक पहुंच गया है.
इमरान मसूद क्यों लगातार फ्रंटफुट पर हैं?
सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद का राजनीतिक क्षेत्र सिर्फ एक लोकसभा सीट तक सीमित नहीं रहा है. उनका प्रभाव गंगोह, नकुड़, बेहट, देवबंद और आसपास के इलाकों तक माना जाता है. वह लंबे समय से पश्चिमी यूपी में कांग्रेस का बड़ा मुस्लिम चेहरा रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इमरान मसूद इस समय चुप रहते, तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश जा सकता था कि पार्टी सीटों और नेतृत्व के सवाल पर बैकफुट पर है. इसलिए उनकी आक्रामक बयानबाजी को कांग्रेस की संगठनात्मक राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है.
इमरान के बयानों को अगर ध्यान से डिकोड करें तो तीन बातें बहुत अच्छे से दिख रही है.
- गठबंधन हो, लेकिन सम्मानजनक हिस्सेदारी के साथ.
- कांग्रेस अपनी तैयारी अलग से भी कर रही है.
- पश्चिमी यूपी में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन खत्म नहीं हुई है.
यही कारण है कि इमरान मसूद लगातार यह बात दोहरा रहे हैं कि गठबंधन शीर्ष नेतृत्व तय करेगा, लेकिन पार्टी को कमजोर करके कोई फैसला नहीं होगा.
सपा ने इकरा हसन को ही क्यों आगे किया?
अब सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि इमरान मसूद के जवाब को सपा के कई सीनियर नेता भी दे सकते थे, लेकिन कैराना की युवा सांसद इकरा हसन को क्यों आगे किया गया? इसके पीछे भी कई राजनीतिक कारण माने जा रहे हैं. पहला, इकरा हसन पश्चिमी यूपी की नई पीढ़ी का चेहरा हैं. दूसरा, उनका परिवार कैराना, शामली और मुजफ्फरनगर की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखता है. तीसरा, वह गुर्जर-मुस्लिम सामाजिक समीकरण का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो पश्चिमी यूपी की राजनीति में अहम माना जाता है. जब इकरा जवाब देने के लिए आईं तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर गठबंधन टूटा तो कांग्रेस को ज्यादा नुकसान होगा और उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ मुख्य लड़ाई अखिलेश यादव ही लड़ सकते हैं. इसे सपा के आत्मविश्वास और दबाव की राजनीति, दोनों रूपों में देखा जा रहा है.
असली लड़ाई मुस्लिम नेतृत्व की भी है?
अगर इन दोनों नेताओं की बात करें तो दोनों मुस्लिम हैं. दोनों पश्चिमी यूपी से हैं. सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, अमरोहा और मेरठ की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता प्रभावशाली भूमिका में हैं. ऐसे में यह सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा का भी खेल चल रहा है. एक तरफ सपा यह संदेश देना चाहती है कि यूपी में विपक्ष की मुख्य धुरी वही है. दूसरी तरफ कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि उसका अपना सामाजिक आधार और नेतृत्व मौजूद है. इमरान मसूद राहुल गांधी और कांग्रेस की भूमिका की बात करते हैं, जबकि इकरा हसन अखिलेश यादव के नेतृत्व को सामने रखती हैं. इसीलिए यह बहस सिर्फ दो नेताओं की बयानबाजी नहीं, बल्कि दो राजनीतिक कथाओं की टक्कर भी है.
अमीर आलम और नवाजिश की एंट्री क्यों अहम?
इसी बची में पश्चिम यूपी में एक और राजनीतिक पहलू सामने आता है. पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके बेटे नवाजिश आलम का कांग्रेस में शामिल होना. जो पश्चिमी यूपी की राजनीति में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है. दोनों नेताओं का प्रभाव शामली और आसपास के इलाकों में रहा है. राजनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को कांग्रेस की पश्चिमी यूपी में नई गोलबंदी के रूप में देखा जा रहा है. यानी कांग्रेस सिर्फ गठबंधन की राजनीति पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि अपने पुराने सामाजिक और राजनीतिक नेटवर्क को भी सक्रिय करने की कोशिश कर रही है. अगर सहारनपुर में इमरान मसूद कांग्रेस का चेहरा हैं, तो शामली और आसपास अमीर आलम परिवार पार्टी के लिए नई ताकत बन सकता है.
सहारनपुर से शामली तक भूगोल भी समझिए
इस पूरी कहानी को समझने के लिए पश्चिमी यूपी का भूगोल भी महत्वपूर्ण है.
- सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र – इमरान मसूद.
- कैराना लोकसभा क्षेत्र – इकरा हसन.
- नकुड़ और गंगोह जैसी विधानसभा सीटें – कैराना और सहारनपुर के प्रभाव क्षेत्र को जोड़ती हैं.
- शामली और मुजफ्फरनगर – जाट, गुर्जर, मुस्लिम और दलित समीकरणों का मिश्रण.
यानी दोनों नेताओं की राजनीति पूरी तरह अलग-अलग नहीं है. कई इलाकों में उनका प्रभाव क्षेत्र एक-दूसरे को छूता है. इसलिए यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं दिखती.
क्या यह सीटों की प्रेशर पॉलिटिक्स है?
राजनीतिक जानकारों का एक वर्ग इसे ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ भी मानता है. कांग्रेस चाहती है कि 2024 के प्रदर्शन के आधार पर उसे ज्यादा सीटें मिलें. सपा मानती है कि उसका संगठन और वोट आधार ज्यादा मजबूत है. इसलिए दोनों दलों के नेता सार्वजनिक बयान देकर अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत का संदेश दे रहे हैं. यह स्थिति नई नहीं है. भारतीय राजनीति में गठबंधन बनने से पहले अक्सर सहयोगी दल अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं.
दिल्ली और लखनऊ वाला एंगल क्या है?
गठबंधन, सीट बंटवारा और रणनीति का अंतिम फैसला स्थानीय नेताओं के बजाय शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर होता है. कांग्रेस में यह फैसला दिल्ली के नेतृत्व को करना है, जबकि सपा में अंतिम निर्णय अखिलेश यादव और पार्टी नेतृत्व के हाथ में रहता है. इसीलिए इकरा और इमरान की बयानबाजी को केवल स्थानीय विवाद नहीं माना जा रहा. इसे 2027 से पहले चल रही बड़ी राजनीतिक बातचीत के एक हिस्से के रूप में भी देखा जा रहा है. हालांकि यह राजनीतिक विश्लेषण है. दोनों दलों ने आधिकारिक तौर पर ऐसी किसी रणनीति की पुष्टि नहीं की है.

