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Prachi Choudhary : प्राची चौधरी ने एशियाई खेलों में महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया है. एक साधारण किसान परिवार से आने वाली प्राची ने 53.21 सेकंड का समय निकालकर तीसरा स्थान हासिल किया. गांव की कच्ची पगडंडियों पर दौड़कर अपने सपनों को साकार करने वाली प्राची सहारनपुर की पहली महिला एथलीट हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का मान बढ़ाया है. उनकी यह उपलब्धि युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा है.
प्राची चौधरी इस इवेंट में 2018 के बाद मेडल जीतने वाली भारत की पहली महिला एथलीट बनीं.
नई दिल्ली. सहारनपुर के एक छोटे से गांव झबीरण की पगडंडियों पर दौड़ने वाली एक साधारण लड़की ने जब पहली बार ओलंपिक का सपना देखा था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि उसकी मेहनत एक दिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराएगी. प्राची चौधरी ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और अथक परिश्रम के दम पर एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतकर न केवल देश का मान बढ़ाया है, बल्कि अपने गांव और जिले का नाम भी इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया है.
एशियाई खेलों में शनिवार का दिन भारतीय एथलेटिक्स के लिए बेहद खास और उपलब्धि भरा रहा. महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा के फाइनल मुकाबले में प्राची चौधरी (Prachi Choudhary) ने अपनी शानदार दौड़ के बदौलत कांस्य पदक पर कब्जा जमाया. इस दौड़ को पूरा करने के लिए प्राची ने 53.21 सेकंड का समय लिया और तीसरा स्थान हासिल किया. मुकाबला बेहद कड़ा था, जिसमें बहरीन की सलवा नासिर ने 49.20 सेकंड के नए एशियाई खेल रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया. वहीं, ईरान की ज़हरा ज़ारेई मानूजान ने 52.38 सेकंड में रेस पूरी कर रजत पदक जीता. इसी स्पर्धा में भारत की एक और धाविका किरण पहल भी मैदान में थीं, जिन्होंने 53.41 सेकंड का समय निकालकर पांचवां स्थान हासिल किया.
भारत की पदक तालिका में इजाफा
प्राची के इस कांस्य पदक के साथ ही एशियाई खेलों में भारत की कुल पदक संख्या बढ़कर 30 हो गई. भारतीय दल ने अब तक अपने बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर 4 स्वर्ण, 12 रजत और 14 कांस्य पदक जीतकर पदक तालिका में अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया है. इस जीत ने भारतीय खेल प्रेमियों को झूमने का मौका दे दिया है.
किसान परिवार से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर
सहारनपुर की धरती से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाली प्राची पहली महिला एथलीट बन गई हैं. उनकी इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे एक लंबा संघर्ष और परिवार का अटूट विश्वास छिपा है. प्राची का जन्म सहारनपुर के झबीरण गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था. उनके पिता खेती-किसानी करके परिवार का जीवनयापन करते हैं और मां एक गृहणी हैं. चार भाई-बहनों के परिवार में प्राची का स्थान तीसरे नंबर पर है. उनके बड़े भाई पिता के साथ खेती में हाथ बंटाते हैं, जबकि बड़ी बहन उत्तर प्रदेश पुलिस में सेवा दे रही हैं. उनका सबसे छोटा भाई फिलहाल अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा है.
गांव के स्कूल से शुरुआत
प्राची की प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव के ही प्राथमिक स्कूल से शुरू हुई थी. वह बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में काफी होनहार थीं, लेकिन इसके साथ ही खेलकूद में भी उनकी गहरी रुचि थी. जब वह कक्षा 6 में पहुंचीं, तो स्कूल में आयोजित होने वाली खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया. यहीं से उनके दौड़ने के सिलसिले की शुरुआत हुई. खेल के प्रति उनके जुनून को देखकर शिक्षकों ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया.
पगडंडियों पर बहाया पसीना
प्राची ने बचपन में ही एथलीट बनने और ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना आंखों में सजा लिया था. गांव में आधुनिक सुविधाओं और सिंथेटिक ट्रैक का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था. ऐसे में प्राची ने अपनी हिम्मत नहीं हारी और गांव की कच्ची पगडंडियों, खेतों के रास्तों और सड़कों को ही अपना ट्रेनिंग ग्राउंड बना लिया. सुबह की धुंध हो या कड़कड़ाती धूप, प्राची का अभ्यास कभी नहीं रुका. पगडंडियों पर बहने वाले उनके पसीने ने ही आज उन्हें अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता बना दिया है.
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कमलेश कुमार राय नेटवर्क18 ग्रुप में बतौर चीफ सब एडिटर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. वह बीते 15 सालों से खेल पत्रकारिता की पिच पर डटे हुए हैं. हिंदी स्पोर्ट्स सेक्शन में वह खेल कंटेंट की गहरी समझ, सटीक विश्लेषण और ब…
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