सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमति जताई जिसमें भोजशाला परिसर को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर बताया गया था। विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें यह रिपोर्ट…
सुप्रीम कोर्ट भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में भोजशाला परिसर को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर बताया था। मुस्लिम अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील हुजेफा अहमदी और वकील निजाम पाशा ने पैरवी की। उन्होंने CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ से गुजारिश की कि याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई जरूरी है।
मुस्लिम पक्ष के वकीलों को यह आदेश
हालांकि सीजेआई सूर्यकांत ने अपीलकर्ताओं के वकीलों से याचिकाओं में मौजूद कमियों को दूर करने का आदेश दिया। उन्होंने याचिकाकर्ताओं को भरोसा दिलाया कि जल्द किसी पीठ के सामने सुनवाई के लिए मामले को लिस्ट किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने कहा था- सरस्वती मंदिर है भोजशाला
बता दें कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 15 मई को अपने फैसले में कहा था कि धार जिले का भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है। अदालत ने इसके अलावा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दशकों पुराने उस आदेश को भी रद्द कर दिया था जिसमें मुस्लिम समुदाय को इस जगह पर शुक्रवार की नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी।
हिन्दू और मुस्लिम पक्ष के क्या दावे?
एमपी हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि केंद्र और एएसआई भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन के बारे में फैसला ले सकते हैं। हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानता है जबकि मुस्लिम पक्ष 11वीं सदी की इस इमारत को कमाल मौला मस्जिद बताता है। अपने अपने इन दावों को लेकर दोनों पक्षों में विवाद है। विवादित परिसर एएसआई के संरक्षण में है।
हिन्दू पक्ष ने दाखिल की थी कैविएट
एमपी हाई कोर्ट के उक्त फैसले को मुस्लिम पक्ष ने अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। दूसरी ओर हिंदू पक्षों ने भी सुप्रीम कोर्ट में ‘कैविएट’ (पूर्व सूचना याचिका) दायर की है। इसमें कहा गया है कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर उनकी बात सुने बिना कोई आदेश जारी नहीं किया जाए।
कहा था- मस्जिद के लिए राज्य सरकार से कर सकते हैं संपर्क
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंड पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि 11वीं सदी के इस स्मारक का धार्मिक स्वरूप वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित है। परिसर का धार्मिक स्वरूप देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला का है। मुस्लिम पक्ष मस्जिद निर्माण के लिए अलग जमीन उपलब्ध कराने के लिए मध्य प्रदेश सरकार से संपर्क कर सकता है।
एएसआई को दी थी ये जिम्मेदारी
हालांकि अदालत ने यह भी आदेश दिया कि भोजशाला क्षेत्र को 1958 के अधिनियम के तहत तीन मार्च, 1904 से ‘संरक्षित स्मारक’ माना जाएगा। धार्मिक प्रवेश के नियमन, संरक्षण और रखरखाव पर एएसआई का पूर्ण पर्यवेक्षण अधिकार होगा। अदालत ने केंद्र सरकार और एएसआई को भोजशाला मंदिर और संस्कृत अध्ययन से जुड़े मामलों के प्रशासन एवं प्रबंधन के लिए निर्णय लेने के भी निर्देश दिए थे।
ASI ने हिन्दू-मुस्लिम दोनों को दिया था अधिकार
एमपी हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि केंद्र सरकार लंदन संग्रहालय से देवी सरस्वती की प्रतिमा को वापस लाने और उसे परिसर में पुनः स्थापित करने के संबंध में अभ्यावेदनों पर विचार कर सकती है।अदालत ने अपने आदेश में एएसआई के अप्रैल 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति प्रदान की गई थी।
हिन्दू मंदिर है भोजशाला की इमारत
अदालत ने अपने आदेश में अयोध्या विवाद से जुड़ी पृष्ठभूमि और कानूनी दलीलों का भी हवाला दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि याचिकाकर्ताओं की ओर से मस्जिद के लिए धार में जमीन की मांग की जाती है तो मध्य प्रदेश सरकार उस पर विचार कर सकती है।अदालत ने कहा कि पुरातत्व और ऐतिहासिक तथ्यों से यह कि साफ है कि संबंधित इमारत एक हिंदू मंदिर और संस्कृत भाषा के अध्ययन का केंद्र है।






