नई दिल्ली. डर शब्द का इस्तेमाल विज्ञापन और बॉलीवुड की दुनिया में सबसे ज्यादा किया जाता है. जो डर गया समझो मर गया… डर के आगे जीत है, डर को हराओ अपनी पहचान बनाओ, जब तक डरोगे तब तक लोग डराएंगे जैसी लाइनों पर तालियां बजती है पर इसको सहीं मायने में जिया है एक कैब ड्राइवर ने , जो पानी से डरता था, और आज भी जिसे तैरना नहीं आता, मगर पानी पर ही जीतता है. बात कर रहे है रोविंग में मेडल लाने वाले सलमान खान की.
पानी के उपर देश का मान बढ़ाने वाले सलमान ख़ान को तैरना नहीं आता. उन्हें पानी से डर लगता है. ट्रेनिंग के शुरुआती दिनों में उनकी नाव एक बार पलट गई थी, और वह डर कभी पूरी तरह गया नहीं. गुरुवार को उसी सलमान ने पुरुष युगल स्कल्स में भारत को उसका पहला एशियाई खेलों का पदक दिलाया. नागारागावा में 6:13.25 का समय निकालकर, वह चीन के स्वर्ण से 3.48 सेकंड और उज़्बेकिस्तान के रजत से 2.76 सेकंड पीछे रहे और भारत को इस खेल में पहला मेडल दिलाया. पानी से डरने वाले किसी शख़्स का उसी पानी पर अपनी जीत तलाशना, एक अजीब-सी कहानी है.
सलमान खान की फिल्मी कहानी
दिल्ली की भीड़भाड़ में कैब चलाने वाले सलमान की जिंदगी तब बदल गई जब उनको फौज में जाने का मौका मिला. पिता के निधन ने छह बच्चों के परिवार यानी चार बेटों और दो बेटियों को बिना मुखिया के छोड़ दिया था. सत्रह-अठारह साल के सलमान ने वह ज़िम्मेदारी अकेले अपने कंधों पर ले ली. सलमान फिर बाहर निकले, पहले ओला और उबर चलाई, और फिर जो भी काम मिला, घर चलाने के लिए करते रहे. रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने उनके क़द-काठी को देखकर उन्हें फ़ौज में जाने की सलाह दी. पहली कोशिश में वह असफल रहे और घरवालों से कह दिया कि अब वह बस गाड़ी ही चलाएंगे. फिर भी उन्होंने दोबारा कोशिश की, पास हुए, और अंदर जाने पर उनकी फ़िटनेस ने उन्हें खेलों के लिए चुनवा दिया, हालांकि रोइंग उन्होंने ख़ुद कभी नहीं मांगी थी. ।
सलमान को मिला सतनाम का साथ
सलमान को सतनाम सिंह का साथ मिलना एक शांत विरासत जैसा था. पंजाब के इस पूर्व राष्ट्रीय स्तर के हैंडबॉल खिलाड़ी ने रोइंग की ओर तब रुख़ किया जब ओलंपियन स्वर्ण सिंह विर्क, जिन्होंने 2018 के जकार्ता खेलों में लाइटवेट डबल स्कल्स में स्वर्ण जीता था, उन्हें पहचाना और तराशा. हांगझोउ 2023 तक सतनाम के पास पहले से ही क्वाड्रपल स्कल्स का कांस्य पदक था. नागोया में कांस्य जीतने वाली यह जोड़ी फ़ाइनल से महज़ पांच दिन पहले बनी थी.
आख़िरी वक़्त पर हुए क्रू फेरबदल ने दोनों की महीनों की तैयारी को उलट-पुलट कर दिया था, और सतनाम के शब्दों में कहें तो इसने शिविर के माहौल को निराश कर दिया था. दो ऐसे रोवर, जिनका आपस में कोई साझा तालमेल नहीं था, उन्हें चप्पू थमाकर महज़ पांच दिनों में करिश्मा दिखाने को कहा गया. वे इससे भी आगे जाते-जाते रह गए. 2000 मीटर की रेस में से 1500 मीटर तक भारतीय जोड़ी दूसरे स्थान पर रही और रजत पदक की ओर बढ़ रही थी, इससे पहले कि आख़िरी 500 मीटर में वे तीसरे स्थान पर खिसक गए. फिर भी यह कांस्य 1982 में रोइंग के एशियाई खेलों में शामिल होने के बाद से भारत का इस स्पर्धा में पहला ऐतिहासिक पदक था.
जापान में जलवा देखने के लिए बेचैन था परिवार
घर पर सलमान की मां, जबरुन निशा, फ़ाइनल से पहले कई रातों से ठीक से सो नहीं पाई थीं. घर में सुबह क़रीब चार बजे दुआ के लिए सब जागे और पांच बजे तक पदक की ख़बर आ गई. उन्होंने बाद में कहा कि यह ख़ुशी सिर्फ़ उनकी नहीं, बल्कि पड़ोसियों की, पूरे गांव की और पूरे देश की थी, उस बेटे के लिए जिसने भारत का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया था. यह कहानी किसी खेल के पन्ने से ज़्यादा किसी भावुक दास्तां सी लगती है, और शायद यह स्कोरबोर्ड के किसी भी आंकड़े से ज़्यादा यहीं जमती है. हर उस तस्वीर के पीछे जहाँ दो खिलाड़ी गले में कांस्य पदक लटकाए मुस्कुरा रहे हैं, कुछ मांओं की सुबह की दुआएं और बरसों का वह संघर्ष छिपा होता है जिसे कोई मेडल टैली कभी पूरी तरह दर्ज नहीं कर सकती.
