नई दिल्ली. देश के सबसे बड़े एथलीटों में से एक मीराबाई चानू के पदकों की कैबिनेट में बस यही एक पदक नहीं था. और इस बार वह इसे हर हाल में हासिल करने के लिए दृढ़ थीं. कुछ पदकों के लिए उनका रंग मायने नहीं रखता. मायने रखती है मेहनत. मायने रखता है समर्पण और जुनून. यही वह जज्बा है, जो एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित करता है और मीराबाई चानू की कहानी भी इसी की मिसाल है. मेडल लेने के बाद तुरंत एक न्यूट्रिशन से मिलना ये बताता है कि वो किस तरह से अपने अगले लक्ष्य की तैयारी करती है.
करीब डेढ़ दशक तक वेटलिफ्टिंग की दुनिया में शीर्ष स्तर पर बने रहना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है. मीराबाई ने यह मुकाम हासिल किया और इसके बावजूद उनकी विनम्रता बरकरार रही. ग्लासगो के बाद मीराबाई मणिपुर वापस नहीं गईं. उन्होंने सिर्फ एक काम किया. मोदीनगर में डेरा जमाया और ट्रेनिंग शुरू कर दी. वह जानती थीं कि एशियन गेम्स में पदक जीतने का यह उनका आखिरी मौका है. इसके बाद उनका लक्ष्य वजन बढ़ाकर लॉस एंजिल्स 2028 ओलंपिक में 53 किग्रा वर्ग में उतरना है. वहां उनकी तैयारी और फोकस पूरी तरह बदल जाएगा. ऐसे में यह उनके लिए सचमुच ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ वाला मौका था.
एशियन गेम्स मेडल जीतना था लक्ष्य
पिछले कुछ महीनों में जब भी उनके इंटरव्यू को सुना , उनके भीतर एक अलग ही दृढ़ता महसूस हुई. उनके दिमाग में सिर्फ यही पदक था. वह इसे हासिल करने की कल्पना कर रही थीं या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन मेरे लिए मीराबाई किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र के लिए एक आदर्श रोल मॉडल हैं. रोज सामने आना. लगातार मेहनत करना. प्रतिबद्ध रहना और अपने लक्ष्य से नहीं भटकना.
आसान नहीं था वेट कम करके ज्यादा वजन उठाना
भारत में कई लोग कहेंगे कि जब पदक गोल्ड नहीं है तो इसका जश्न क्यों मनाया जा रहा है. सच यह है कि ऐसे लोगों को खेल की बहुत कम समझ होती है. उन्हें अंदाजा नहीं है कि 48 किलोग्राम के शरीर के साथ 200 किलोग्राम से ज्यादा वजन उठाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है. ओलंपिक या एशियन गेम्स आते ही ऐसे लोग भारतीय खेलों के आलोचक बनकर सामने आ जाते हैं. उनसे सिर्फ स्नैच और क्लीन एंड जर्क के बीच का अंतर पूछ लीजिए. जवाब से पता चल जाएगा कि खेल को समझने वाला कौन है और सिर्फ आलोचना करने वाला कौन.
मेडल जीतते ही ओलंपिक की तैयारी शुरु
उनके कोच विजय शर्मा की यह बात भी बहुत कुछ बताती है. उन्होंने कहा, “जापान जाने से पहले हमने कैंप में एक न्यूट्रिशनिस्ट को बुलाया था. मीराबाई उनसे मिलना चाहती थीं और उन्होंने अपने लिए विस्तृत डाइट चार्ट मांगा था. वह 24 सितंबर से इस डाइट को फॉलो करेंगी. यानी एशियन गेम्स खत्म होने के अगले दिन से. लॉस एंजिल्स 2028 में वह 53 किग्रा वर्ग में हिस्सा लेंगी और एशियन गेम्स खत्म होते ही वजन बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर देंगी. उन्हें एक विस्तृत प्लान की जरूरत है, ताकि उनका एक भी समय बर्बाद न हो.
युवाओ की रोल मॉडल है मीराबाई चानू
मीराबाई चानू ने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया है और वह लाखों लोगों के लिए रोल मॉडल हैं. उन्होंने इस पदक को हासिल करने के लिए जो कुछ किया, उसके बाद वह इसकी हकदार थीं. भारतीय वेटलिफ्टिंग के लिए उन्होंने जो योगदान दिया है, उसके लिए उनका पोडियम पर खड़े होकर मुस्कुराना बनता था. हमेशा अपने सच्चे साधकों को सम्मान देता है और मीराबाई उनमें से एक हैं. और हां, अब पिज्जा भी बनता है. यह चीट टाइम है और पूरी तरह जायज है. आखिरकार पदकों की कैबिनेट अब पूरी हो गई है और वह एक पदक, जो इतने लंबे समय से अधूरा था, आखिरकार मीराबाई के नाम हो गया.

