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काशी की प्राचीन गलियों और परंपराओं के बीच रामनगर की रामलीला केवल एक धार्मिक मंचन नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास की अद्वितीय धरोहर है. आधुनिक चमक-दमक, लाउडस्पीकर और डिजिटल स्क्रीन के दौर में भी पेट्रोमेक्स की मंद रोशनी और बिना किसी कृत्रिम मंच के खुले आसमान तले होने वाली यह लीला दुनिया भर में अनूठी मिसाल पेश करती है.
वैसे तो दशहरा से पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में रामलीला का मंचन होता है. लेकिन वाराणसी के रामनगर में होने वाली यह रामलीला सारी लीलाओं से काफी अलग होती है. इस लीला में आज भी शाही ठाठ-बाट देखने को मिलता है. काशी राज परिवार के मुखिया आज भी पूरे शाही अंदाज में इस लीला को देखने के लिए हर दिन हाथी पर सवार होकर आते हैं. उसके बाद ही लीला का मंचन शुरू होता है.
इस लीला की शुरुआत 1783 में उस समय के तत्कालीन महाराज उदित नारायण सिंह ने की थी. यह लीला आज भी पूरे एक महीने तक निरंतर चलती है. हर साल अनंत चतुर्दशी पर रावण जन्म से इसकी शुरुआत होती है. इस साल यह लीला 25 सितंबर से शुरू होगी. इस लीला का इंतजार लीला प्रेमियों को पूरे साल रहता है. हालांकि इसकी तैयारियां महीनों पहले से शुरू हो जाती हैं.
आधुनिकता के इस दौर में भी इस लीला ने आज भी अपने उस पुराने स्वरूप को जीवंत रखा है. इसलिए यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज माना है. यह लीला आज भी माइक, लाउडस्पीकर, झालर और बड़ी लाइट्स के बीच नहीं बल्कि पेट्रोमेक्स की रोशनी में होती है. पात्र भी रामचरितमानस की चौपाइयों को इतनी तेज आवाज में बोलते हैं कि लीला सुनने वाले हर किसी शख्स तक उनकी आवाज सुनाई देती है.
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खास बात यह भी है कि इस लीला के लिए कोई मंच भी नहीं बनाया जाता है. रामनगर क्षेत्र में अलग-अलग जगह निर्धारित हैं जहां घूम-घूमकर इस लीला का मंचन होता है. 4 किलोमीटर क्षेत्र में पूरे एक महीने तक इस लीला का मंचन अलग-अलग जगहों पर होता है. हर दिन इस लीला को देखने के लिए हजारों लोग इकट्ठा होते हैं. इनमें कई नेमी भी होते हैं जो पूरे एक महीने तक नियमित रूप से इस लीला में शामिल होते हैं.
ब्रिटिश सरकार में अधिकारी रहे जेम्स प्रिंसेप ने 1830 में इस लीला का आंखों देखा वर्णन किया था. उस समय जेम्स प्रिंसेप ने इसका एक चित्र भी बनाया था. उसी चित्र के साथ उन्होंने अपनी पुस्तक ‘न्यूज ऑफ बनारस’ में इसे प्रकाशित किया था. आज भी उस चित्र को डॉक्यूमेंट के तौर पर सुरक्षित और संरक्षित रखा गया है.
इस लीला में कई परिवार पीढ़ियों से इसका हिस्सा बनते चले आ रहे हैं. कई परिवारों की चौथी पीढ़ी अब इस परंपरा का निर्वहन कर रही है. चौक की तंग गलियों में रहने वाला जौहरी परिवार भी उनमें से एक है. आज भी इस परिवार के सदस्य पूरे एक महीने तक इस लीला में आते हैं और यहां रामचरितमानस की चौपाइयां पढ़ते हैं.
जिस वक्त इस लीला की शुरुआत हुई थी उस वक्त इसे कराने में करीब 1 लाख रुपये खर्च होते थे. वर्तमान समय में इस लीला का खर्च 1 करोड़ रुपये से ज्यादा का है लेकिन फिर भी काशी राज परिवार इस परंपरा को जीवंत रखने के लिए इस लीला का आयोजन उसी शाही ठाठ-बाट से करता चला आ रहा है. लीला की शुरुआत से पहले ‘चुप रहो सावधान’ की आवाज सुनाई देती है, फिर रामचरितमानस की गूंज गूंजने लगती है.
इस लीला के लिए अनंत चतुर्दशी के करीब 4 महीने पूर्व से ही पात्रों के चयन की प्रक्रिया शुरू होती है. इस लीला के सभी पात्र ब्राह्मण होते हैं. इनके चयन के बाद उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है. इस पूरी अवधि में उन्हें सिर्फ सात्विक भोजन ही दिया जाता है. इस दौरान सभी पात्र घर से दूर रहते हैं. चार महीने ट्रेनिंग के बाद अनंत चतुर्दशी से यह लीला शुरू हो जाती है.
