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Hanuman Ansh Music Story: किसी फिल्म का संगीत सिर्फ धुनों का मेल नहीं होता, कई बार वह पूरी कहानी की आत्मा बन जाता है. ‘हनुमान अंश’ में भी भक्ति, लोक रंग और आध्यात्मिक एहसास का ऐसा संगम सुनाई देता है, जो इसे बाकी फिल्मों से अलग करता है. खास बात यह है कि सीमित बजट के बावजूद मेकर्स ने संगीत से कोई समझौता नहीं किया और कहानी के अलग-अलग पड़ावों को भजनों से सजाया.
नई दिल्ली. बॉक्स ऑफिस पर आस्था का ऐसा असर दिख रहा है कि आंकड़े भी कहानी सुनाने लगे हैं. ‘हनुमान अंश’ की कमाई लगातार रफ्तार पकड़ रही है. फिल्म पर्दे पर 40 दिनों से टिकी है और रोज कलेक्शन के मामले में बड़ी-बड़ी फिल्मों को पछाड़ रही हैं. लेकिन इस फिल्म की असली कहानी सिर्फ बॉक्स ऑफिस के करोड़ों में नहीं छिपी है. इसके पीछे ऐसे किस्से हैं, जिन्हें सुनकर यकीन करना मुश्किल है. फिल्म की पूरी शूटिंग महज 26 दिनों में पूरी हुई. बजट और वक्त दोनों का दबाव था, फिर भी टीम पीछे नहीं हटी. हाल ही में सहयोगी चैनल सीएनएन न्यूज 18 से फिल्म की टीम के साथ खास बातचीत की. आनंद नरसिम्हन के साथ हुई इस खास बाततीच में उन्होंने फिल्म की मेकिंग से जुड़े कई दिलचस्प किस्से शेयर किए.
‘हनुमान अंश’ की चर्चा आज घर-घर में हो रही है. बेहद सीमित बजट, कम समय और शूटिंग के दौरान पैसों की चिंता के बीच टीम ने महज 26 दिनों में फिल्म की शूटिंग पूरी की. इतना ही नहीं, जिस विषय पर मई 2026 में एक दूसरी फिल्म आई और नहीं चली, उसी विषय पर मेकर्स ने अपना भरोसा कायम रखा और रिलीज के दो हफ्ते बाद वो चमत्कार हुआ, जिसने बॉलीवुड के बड़े-बड़े मेकर्स को सोचने पर मजबूर कर दिया. इस बातचीत में फिल्म ‘हनुमान अंश’ की टीम ने अपनी इस आध्यात्मिक और संगीतमय यात्रा के कई हैरान कर देने वाले पन्ने खोले.
‘हनुमान अंश’ की कहानी जितनी आस्था से जुड़ी है, इसका संगीत भी उतना ही खास है. फिल्म में एक-दो नहीं, बल्कि कुल 11 भजनों और गानों को शामिल किया गया है, जो कहानी के अलग-अलग मोड़ पर माहौल को गहराई देते हैं. इनमें ‘सासा हाले’ से लेकर जिद्द पर आ गई पार्वती तक बाकी भक्ति गीतों तक, हर धुन में देसी मिट्टी और आध्यात्मिक रंग सुनाई देता है. खास बात यह है कि संगीत में बुंदेली-अवधी का स्वाद और 1930-40 के दशक की झलक भी बरकरार रखी गई है.
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‘हनुमान अंश’ के संगीत की बात करें तो फिल्म के चर्चित गाने ‘सासा हाले’ की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. बातचीत में फिल्म की टीम ने बताया कि यह गुरु गोरक्षनाथ जी की 11वीं शताब्दी की रचना है, जो कुंडलिनी जागरण से जुड़ी मानी जाती है. निर्देशक विशाल चतुर्वेदी को यह रचना दतिया के पीताम्बरा पीठ में मिली एक पुस्तक से मिली थी. इसके बाद इस रचना को फिल्म के संगीत का हिस्सा बनाने की तैयारी हुई. खास बात यह है कि इसे तैयार करने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगा.
निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने ट्रेन यानी वंदे भारत से संगीतकार साधु को गाने की पंक्तियां भेजीं. इसके बाद साधु ने महज 15 मिनट में गिटार पर पूरे गाने की धुन तैयार कर दी और रिकॉर्ड करके भेज दिया. संगीतकार साधु बाबा नीम करोली जी का नियमित जाप भी सुनते थे. बातचीत में बताया गया कि जब उन्होंने पहली बार यह गाना तैयार किया, तो बाबा जी की तस्वीर के सामने बैठकर उन्होंने इसे एक ही टेक यानी ‘वन गो’ में कंपोज किया.
फिल्म का बजट भले ही सीमित था, लेकिन मेकर्स ने संगीत के साथ समझौता नहीं किया. फिल्म में कुल 11 भजनों को शामिल किया गया है. इन भजनों को कहानी के अलग-अलग मोड़ों पर रखा गया है, ताकि सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह नहीं, बल्कि कहानी के भाव को गहराई देने के लिए उनका इस्तेमाल हो. दिलचस्प बात यह भी है कि नीम करोली बाबा का किरदार निभाने वाले एक्टर को फिल्म में कोई गाना गाते हुए नहीं दिखाया गया. उनका किरदार भजनों को सुनता और उन्हें महसूस करता नजर आता है.
‘हनुमान अंश’ के संगीत को लेकर टीम ने एक खास तरह का देसी टोन बनाए रखने की कोशिश की. संगीत में 1930-40 के दशक की ओरिजिनल फील को रखा गया. इसके साथ बुंदेली और अवधी भाषा का स्वाभाविक इस्तेमाल किया गया, ताकि कहानी और संगीत दोनों में उस दौर और मिट्टी की खुशबू महसूस हो. संगीत के प्रोडक्शन में भी टीम ने उपलब्ध संसाधनों का पूरा इस्तेमाल किया. बातचीत के मुताबिक, संगीतकार को अतिरिक्त पैसा मिलने के बावजूद उन्होंने उसे निजी तौर पर रखने के बजाय गानों के अरेंजमेंट और लाइव म्यूजिक प्रोडक्शन में लगाया.
‘हनुमान अंश’ की टीम भी मानती हैं फिल्म की सफलता को लेकर एक बात बार-बार सामने आई वो है ‘नीयत’. टीम का मानना है कि अगर किसी फिल्म को शुरू करने वालों की नीयत साफ हो, कहानी के प्रति निष्ठा हो और काम ईमानदारी से किया जाए, तो कुदरत भी रास्ते खोलती है.

