नई दिल्ली. एक ओर भारत के मणिपुर की दूरदराज की पहाड़ियों से निकलकर छह बार की विश्व चैंपियन बनने वाली मैरी कॉम की संघर्ष गाथा है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सरगोधा शहर की गलियों में अपने सपनों के लिए लड़ती 22 वर्षीय फातिमा जहरा. खेल की कोई सीमा नहीं होती और प्रेरणा किसी पासपोर्ट या राष्ट्रीयता की मोहताज नहीं होती. इस बात को साबित किया है फातिमा ने, जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में महिलाओं के 60 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया. वह मुक्केबाजी में पदक जीतने वाली पाकिस्तान की पहली महिला खिलाड़ी बन गई हैं. लेकिन इस ऐतिहासिक जीत की नींव में जो आग जल रही थी, उसे हवा मिली थी भारत की दिग्गज मुक्केबाज एमसी मैरी कॉम से.
सरगोधा जैसे छोटे और पारंपरिक शहर में पली-बढ़ी फातिमा जहरा (Fatima Zahra) के पास अपने ही मुल्क में कोई ऐसी महिला मुक्केबाज नहीं थी, जिसकी तरफ देखकर वह कह सकें. ‘मुझे इनके जैसा बनना है.’ पाकिस्तान में महिला मुक्केबाजी न केवल नई थी, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से इसे महिलाओं के अनुकूल खेल भी नहीं माना जाता था. जब फातिमा ने रिंग में उतरने का फैसला किया, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती रिंग के भीतर खड़े प्रतिद्वंद्वी से नहीं, बल्कि बाहर खड़े समाज और अपने ही परिवार के विरोध से निपटने की थी.
पाकिस्तान की बॉक्सर फातिमा बनना चाहती हैं मैरीकॉम.
एक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने के कारण फातिमा के पास न तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं थीं और न ही महंगे उपकरण. परिवार का मानना था कि लड़कियों के लिए मुक्केबाजी सही रास्ता नहीं है. उन्हें अभ्यास के लिए घर से बाहर जाने तक की इजाजत नहीं मिलती थी. लेकिन फातिमा के भीतर मुक्केबाज बनने की जो जिद थी, उसने उन्हें कभी हार नहीं मानने दी.
2014 की वो फिल्म, जिसने बदल दी जिंदगी
जब अपने ही घर और समाज से निराशा मिल रही थी, तब फातिमा की मुलाकात हुई एक ऐसी कहानी से, जिसने उनके सोचने का तरीका हमेशा के लिए बदल दिया. वर्ष 2014 में रिलीज हुई मैरी कॉम के जीवन पर आधारित बॉलीवुड फिल्म ने फातिमा के दिल और दिमाग पर गहरा असर छोड़ा.मणिपुर के एक बेहद गरीब किसान परिवार में जन्मी मैरी कॉम ने किस तरह गरीबी, सामाजिक रूढ़ियों, सीमित संसाधनों और यहाँ तक कि शादी और बच्चों के जन्म के बाद भी मुक्केबाजी की दुनिया में अपनी धाक जमाई. इस कहानी ने फातिमा को अंदर तक झकझोर दिया.
‘मैरीकॉम जैसा बनना चाहती हूं’
फातिमा ने कहा, ‘मैं उनके जीवन पर बनी फिल्म बार-बार देखती थी. जब मैंने मुक्केबाजी शुरू की, तब मैं उसी फिल्म को देखकर अपने पैंतरे और अभ्यास सीखा करती थी. मैरी कॉम सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि हम जैसी हर उस लड़की की रोल मॉडल हैं जो विषम परिस्थितियों में अपने सपनों के लिए लड़ना चाहती है.’ मैरी कॉम की उपलब्धियों से ज्यादा उनके संघर्ष ने फातिमा को हिम्मत दी. फातिमा ने यह सीख लिया कि अगर मणिपुर की एक लड़की अभावों से लड़कर दुनिया पर राज कर सकती है, तो सरगोधा की एक लड़की भी अपने सपनों के लिए मुक्का उठा सकती है.
परिवार के विरोध से लेकर रिंग के गौरव तक
शुरुआती दौर में फातिमा के कोच उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक बने. जब परिवार अभ्यास के लिए जाने से रोकता था, तब भी फातिमा चोरी-छिपे या किसी तरह मिन्नतें करके ट्रेनिंग के लिए पहुंचती थीं. समय बीतने के साथ और फातिमा की अटूट लगन को देखकर धीरे-धीरे परिवार का नजरिया भी बदलने लगा. जो परिवार कभी उन्हें रिंग में जाने से रोकता था, वही अब उनके मुकाबलों के दौरान टीवी स्क्रीन से आंखें नहीं हटा पाता. फातिमा मुस्कुराते हुए बताती हैं कि अब जब भी उनका कोई मैच होता है, तो उनसे ज्यादा उनका परिवार तनाव में रहता है और उनकी जीत के लिए दुआएं मांगता है.
इतिहास रचने की ओर कदम
जब फातिमा ने राष्ट्रमंडल खेलों में 60 किलोग्राम वर्ग में भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों के दिग्गजों के साथ प्रतिस्पर्धा की, तो उनके हर पंच में वर्षों का संघर्ष और मैरी कॉम से मिली प्रेरणा साफ झलक रही थी. जब उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम किया, तो यह केवल एक पदक नहीं था; यह पाकिस्तान के खेल इतिहास का एक नया अध्याय था. फातिमा ने साबित कर दिया कि खेल सीमाओं, राजनीति और कूटनीति से बहुत ऊपर हैं. एक भारतीय मुक्केबाज की कहानी ने एक पाकिस्तानी लड़की को दुनिया के मंच पर देश का नाम रोशन करने का हौसला दिया.

