नई दिल्ली. मार्च 1951 की एक सर्द दोपहर को नई दिल्ली का नेशनल स्टेडियम एक ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना. जब भारत ने पहले एशियन गेम्स की मेजबानी की. विभाजन के दर्द और आजादी की नई सुबह के चार साल बाद, इस नए गणतंत्र ने न केवल इन खेलों का आयोजन किया, बल्कि एशियाई खेलों की आत्मा को भी गढ़ा.’एवर ऑनवर्ड’ के आदर्श वाक्य के तहत भारत ने 11 एशियाई देशों को एक मंच पर लाकर यह संदेश दिया कि वह खेल, भाईचारे और मानवीय हौसले के बल पर वैश्विक पटल पर अपने नियम खुद लिखेगा.
उस ऐतिहासिक आयोजन में जब सचिन नाग ने 100 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में गोल्ड मेडल जीता और लावी पिंटो ने नई सिंथेटिक ट्रैक पर 100 और 200 मीटर दौड़ में दोहरे स्वर्ण पदक अपने नाम किए, तो यह केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं था. यह एक राष्ट्र की नई पहचान का उद्घोष था. एक ऐसा देश, जिसे लंबे समय तक खामोश रखा गया था, अब दुनिया के सामने दौड़ने, कूदने और अपनी जगह बनाने के लिए पूरी तरह तैयार था.
भारत के एशियन गेम्स में पिछली बार 100 से ज्यादा पदक जीते .
संघर्ष और उम्मीदों के शुरुआती दशक
हालांकि, आने वाले दशकों में यह सफर हमेशा सफलताओं से भरा नहीं रहा. भारतीय खेल प्रेमियों के लिए एशियाई खेल कई बार उम्मीदों और अधूरे सपनों की दास्तान बने. देश ने कुछ बेमिसाल उपलब्धियों का जश्न मनाया, लेकिन पदकों का बड़ा आंकड़ा काफी समय तक सीमित रहा. टोक्यो 1958 में फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह द्वारा 200 और 400 मीटर दौड़ में जीती गई दोहरी स्वर्णिम सफलता, और सियोल 1986 में पीटी उषा द्वारा चार स्वर्ण पदक अपने नाम करने वाला असाधारण प्रदर्शन आज भी खेल प्रेमियों की स्मृतियों में जीवित है. भारतीय हॉकी टीमों के कड़े मुकाबले भी उस युग की पहचान बने.
779 मेडल का ऐतिहासिक सफर
वे उपलब्धियां भारतीय खेल इतिहास में अंधेरे के बीच रौशनी की किरणों जैसी थीं, लेकिन कुल पदकों का आंकड़ा सालों तक बीस, तीस या चालीस के आसपास ही सिमटा रहा. सात दशकों से अधिक के इस सफर में भारत ने धीरे-धीरे कुल 779 पदक बटोरे, जिनमें 183 स्वर्ण, 239 रजत और 357 कांस्य शामिल रहे. यह संख्या हमारे एथलीटों के शुरुआती संघर्षों, सीमित संसाधनों और कभी न हार मानने वाले जज्बे की कहानी बयां करती है.
ग्वांग्झू 2022 में ‘इस बार 100 पार’ का निडर संकल्प
फिर आया ग्वांग्झू 2022 का दौर, जो महामारी के कारण 2023 में आयोजित हुआ. इस बार भारतीय खेलों की सोच में एक बुनियादी बदलाव साफ दिख रहा था. पुरानी झिझक खत्म हो चुकी थी और उसकी जगह एक नए आत्मविश्वास ने ले ली थी. चीन रवाना होने से पहले ही ट्रेनिंग कैंपों में एक ही नारा गूंज रहा था. ‘इस बार, 100 पार’. कई विश्लेषकों के लिए यह बात एक अतिशयोक्ति जैसी लगती थी, क्योंकि भारत ने इससे पहले 2018 के जकार्ता खेलों में अपना सर्वश्रेष्ठ 70 पदकों का प्रदर्शन किया था. 100 से ज्यादा पदकों का आंकड़ा चीन, जापान या दक्षिण कोरिया जैसे खेल महाशक्तियों से जोड़ा जाता था.
मैदान पर ऐतिहासिक क्रांति और मेडल की बारिश
लेकिन ग्वांग्झू में जो हुआ, उसने भारतीय खेल इतिहास की पूरी दिशा ही बदल दी. हर बीतते दिन के साथ तिरंगा लहराता रहा और राष्ट्रगान की धुन गूंजती रही. यह सफलता किसी एक खेल तक सीमित नहीं थी, बल्कि हर क्षेत्र में एथलीटों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. घुड़सवारी में चार युवा सवारों ने ड्रेसॉज स्पर्धा में 41 साल के लंबे सूखे को समाप्त करते हुए स्वर्ण पदक जीता. निशानेबाजी में नई पीढ़ी के निशानेबाजों ने जबरदस्त एकाग्रता और सटीकता का परिचय दिया. बैडमिंटन के मैदान पर सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने पारंपरिक रूप से मजबूत चीन, मलेशिया और कोरियाई जोड़ियों को पछाड़कर ऐतिहासिक पुरुष युगल खिताब अपने नाम किया. एथलेटिक्स ट्रैक पर नीरज चोपड़ा ने लगातार दूसरा एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता, जबकि तीरंदाजी, कुश्ती और अन्य खेलों में भी भारत का प्रदर्शन शानदार रहा.
107 पदकों के साथ टूटा सात दशकों का मानसिक अवरोध
जब प्रतियोगिताएं समाप्त हुईं, तो स्कोरबोर्ड पर भारत के नाम 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य पदक दर्ज थे. कुल 107 पदकों के साथ भारत तालिका में चौथे स्थान पर रहा. 100 पदकों की वह दीवार, जो सात दशकों से एक मानसिक सीमा की तरह खड़ी थी, पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी. ग्वांग्झू एशियाई खेल वह निर्णायक मोड़ बने, जहां से भारतीय खेलों ने वैश्विक मंच पर अपनी एक नई और मजबूत पहचान स्थापित की.
आइची-नागोया पर निगाहें
अब समय आगे बढ़ चुका है और खेल प्रेमियों की निगाहें जापान के आइची-नागोया खेलों की ओर टिकी हैं. इस बार भारतीय दल की मानसिकता पूरी तरह अलग है. हंगझोऊ की सफलता यह साबित करने के लिए थी कि भारत 100 पार जा सकता है, जबकि आइची-नागोया की चुनौती यह साबित करने की होगी कि 107 पदकों की वह ऐतिहासिक उपलब्धि तो केवल नए सफर की एक शुरुआत थी.
