गाजीपुर. आज के दौर में जहां हर युवा महानगरों की चकाचौंध और भारी-भरकम कॉर्पोरेट पैकेजेस के पीछे भाग रहा है, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी जड़ों की तरफ लौटकर समाज में बड़ा बदलाव लाने में जुटे हैं. गाजीपुर में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ के निदेशक माधव कृष्ण की कहानी कुछ ऐसी ही है. एक समय दुनिया के शीर्ष संस्थानों से पढ़ाई और कॉर्पोरेट का लंबा सफर तय करने वाले माधव कृष्ण आज गाजीपुर में शिक्षा, संस्कृति और भारतीय मूल्यों की अलख जगा रहे हैं. लोकल 18 से हुई बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के उन अनछुए पहलुओं को साझा किया, जिन्होंने उन्हें इस रास्ते पर मोड़ दिया. माधव कृष्ण बताते हैं कि कुछ साल पहले जब उनका बेटा दो साल के लिए सिंगापुर में था, तो उसका पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता था. उसे स्कूल की पढ़ाई बोझ की तरह लगती थी. एक आम भारतीय पिता की तरह वे भी उसे डांटते और मारते थे, लेकिन जब उन्होंने बच्चे को डांटना-मारना बंद कर दिया और उसकी पसंद (कॉमिक्स पढ़ने और स्विमिंग करने) की छूट दी, तो उसका मन अपने आप पढ़ाई में भी लगने लगा. इसी घटना ने उनकी आंखें खोल दीं और उन्हें समझ आया कि बच्चों के जीवन में प्राइमरी एजुकेशन (प्राथमिक शिक्षा) कितनी महत्वपूर्ण है. यहीं से उनके मन में शिक्षा के क्षेत्र में उतरने का विचार आया.
इंग्लिश मीडियम का छलावा
माधव कृष्ण कहते हैं कि आज के ज्यादातर अंग्रेजी मीडियम स्कूल सिर्फ बच्चों को अंग्रेजी रटवाने पर जोर दे रहे हैं. बच्चा स्कूल में अंग्रेजी पढ़ता है, लेकिन घर लौटकर हिंदी या भोजपुरी बोलता है. ऐसे में बच्चे के लिए सिर्फ भाषा के दम पर विषयों को समझना आसान नहीं होता. उनका मानना है कि किसी भी सब्जेक्ट को सीखने के लिए भाषा रुकावट नहीं बननी चाहिए; बल्कि पहले स्थानीय और मातृभाषा से जोड़कर कॉन्सेप्ट को क्लियर करना चाहिए, वरना रट-रटकर पढ़ने वाले बच्चे आगे चलकर पिछड़ने लगते हैं.
2017 में नई उड़ान
शिक्षा में आ रहे इन्हीं बदलावों को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने वर्ष 2017 में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ की शुरुआत की. उनका मुख्य उद्देश्य था कि बच्चों पर पढ़ाई का मानसिक दबाव (प्रेशर) कम से कम हो. उन्होंने स्कूल में एक अनोखा नियम बनाया कि शिक्षक, डायरेक्टर या प्रिंसिपल बच्चों को उनके नाम से पुकारें, ताकि हर बच्चे को अपनी अलग पहचान और आत्मविश्वास का अहसास हो. वे सिर्फ बच्चों से ही नहीं बल्कि उनके अभिभावको से भी सीधा और मजबूत संवाद स्थापित करने पर जोर देते हैं. माधव कृष्ण का मानना है कि अगर शरीर कमजोर रहेगा, तो दिमाग भी कमजोर रहेगा. इसी सोच के तहत उनके विद्यालय में बच्चों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि उन्हें कबड्डी और खो-खो जैसे फुर्ती बढ़ाने वाले पारंपरिक भारतीय खेल भी सिखाए जाते हैं. स्कूल की सुबह की शुरुआत विद्यालय परिसर में बच्चों द्वारा 12 सूर्य नमस्कार के अभ्यास के साथ होती है, ताकि उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर हो सके.
श्री श्री ने बदला जीवन
अपने निजी जीवन का जिक्र करते हुए वे एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हैं. बचपन में खेलते समय उनकी नाक पर चोट लग गई थी, जिसके बाद से उन्हें साइनोसाइटिस की समस्या हो गई. जब वे एनआईटी राउरकेला (NIT Rourkela) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब वे बहुत बीमार रहने लगे. जिम जाने के बावजूद उन्हें भारी थकान रहती थी और पढ़ाई में मन नहीं लगता था. इसी दौरान श्री श्री रवि शंकर के ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ से उनका जुड़ाव हुआ. उन्होंने योग और प्राणायाम के जरिए अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाया. इसके बाद वे रामकृष्ण परमहंस के विचारों के संपर्क में आए. उन्होंने वेदों, उपनिषदों, वेदांत,
श्रीमद्भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र का अध्ययन किया.
बाबा गंगाराम से दीक्षा
माधव कृष्ण बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद के विचारों ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया. उन्हें अहसास हुआ कि स्वामी विवेकानंद आज से 150 साल पहले जितनी ओपन-माइन्डेड और आधुनिक बातें कहते थे, वे आज भी प्रासंगिक हैं. इसी वैचारिक बदलाव के बाद उन्होंने गाजीपुर के प्रसिद्ध बाबा गंगाराम दास आश्रम से दीक्षा ली. आज माधव कृष्ण कॉर्पोरेट दुनिया की चकाचौंध और बड़े पैकेजेस को पीछे छोड़कर अपने गृह जिले गाजीपुर में बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, संस्कारों और सेहत का पाठ पढ़ा रहे हैं.
