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केस लड़ते-लड़ते कैमरे से हुआ इश्क, बदली किस्मत और बन गए मेगास्टार, उम्र 70 पार, जुनून अब भी जवान

Admin by Admin
September 7, 2026
in मनोरंजन
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केस लड़ते-लड़ते कैमरे से हुआ इश्क, बदली किस्मत और बन गए मेगास्टार, उम्र 70 पार, जुनून अब भी जवान


Last Updated:September 07, 2026, 04:01 IST

मलयालम सिनेमा की बात हो और ममूटी का नाम न आए, ऐसा शायद ही कभी होता है. पांच दशक से ज्यादा लंबे अपने फिल्मी करियर में उन्होंने सैकड़ों फिल्मों में काम किया और हर तरह के किरदार निभाकर दर्शकों के दिल में खास जगह बनाई. दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों की दुनिया में कदम रखने से पहले ममूटी वकालत किया करते थे. अदालत से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे कैमरे तक पहुंचा और देखते ही देखते वह मलयालम सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में शामिल हो गए.

नई दिल्ली. ममूटी का असली नाम मुहम्मद कुट्टी पनापरम्बिल इस्माइल है. उनका जन्म 7 सितंबर 1951 को केरल में हुआ था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने केरल की अदालतों में वकालत भी शुरू कर दी.हालांकि, अभिनय का शौक उनके मन में पहले से था. पढ़ाई के दौरान ही उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिल चुका था. यही वजह रही कि कानून की पढ़ाई और वकालत के साथ उनका फिल्मों से जुड़ाव भी बना रहा.

ममूटी ने साल 1971 में फिल्म ‘अनुभवंगल पालिचाकल’ से कैमरे के सामने कदम रखा था. इसमें उन्होंने एक छोटे से रोल में काम किया था. शुरुआत भले ही छोटी थी, लेकिन फिल्मों के प्रति उनका लगाव लगातार बढ़ता गया. इसके बाद उन्हें कुछ और छोटे रोल मिले. फिर साल 1980 में आई फिल्म ‘विल्क्कनुंडु स्वप्नंगल’ से उन्हें पहचान मिलने लगी. यहीं से उनके फिल्मी करियर ने रफ्तार पकड़नी शुरू की और वह धीरे-धीरे मुख्य भूमिकाओं में नजर आने लगे.

ममूटी के करियर के लिए 1980 का दशक बेहद खास रहा. इस दौरान उन्होंने एक के बाद एक कई शानदार फिल्मों में काम किया. ‘अहिंसा’, ‘संध्याक्कु विरिंजा पूवु’, ‘अथिरात्रम’, ‘यात्रा’, ‘निराकूट्टू’ और ‘न्यू दिल्ली’ जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई.उनकी खासियत यह रही कि वह एक ही तरह के किरदारों में बंधकर नहीं रहे. कभी गंभीर भूमिका निभाई, तो कभी एक्शन और ड्रामा से दर्शकों का दिल जीता. उनकी एक्टिंग में यही विविधता उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग बनाती रही.

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ममूटी की लोकप्रियता बढ़ती गई, लेकिन उन्होंने सिर्फ स्टारडम पर भरोसा नहीं किया. उन्होंने हमेशा अलग और चुनौतीपूर्ण किरदारों को तवज्जो दी.’ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘मथिलुकल’, ‘विदेयन’ और ‘पोंथन माडा’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को खूब सराहा गया. उन्होंने हिंदी फिल्म ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’ में डॉ. भीमराव आंबेडकर का किरदार भी निभाया. यह भूमिका उनके करियर के सबसे यादगार किरदारों में गिनी जाती है.

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इन फिल्मों ने यह साबित किया कि ममूटी सिर्फ बड़े पर्दे के सुपरस्टार नहीं हैं, बल्कि वह एक ऐसे अभिनेता हैं जो मुश्किल से मुश्किल किरदार को भी पूरी शिद्दत से निभा सकते हैं. ममूटी ने खुद को सिर्फ मलयालम सिनेमा तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने तमिल, तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया है.

अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों में काम करने के दौरान उन्होंने कई तरह के किरदार निभाए. यही वजह है कि उनकी पहचान सिर्फ केरल या मलयालम सिनेमा तक सीमित नहीं रही. अपने लंबे करियर में वह 400 से ज्यादा फिल्मों का हिस्सा बन चुके हैं.ममूटी को उनके शानदार अभिनय के लिए तीन बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है. इसके अलावा उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर दक्षिण पुरस्कारों से भी कई बार सम्मानित किया गया है.

सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 1998 में उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया था. यह सम्मान उनके लंबे और शानदार फिल्मी सफर की बड़ी उपलब्धियों में से एक है. ममूटी की सबसे खास बात उनकी उम्र नहीं, बल्कि काम को लेकर उनका जुनून है. 70 की उम्र पार करने के बाद भी वह लगातार फिल्मों में सक्रिय हैं. वह आज भी अलग तरह की कहानियां और चुनौतीपूर्ण किरदार चुन रहे हैं.

ममूटी ने यह साबित किया है कि स्टारडम सिर्फ उम्र या फिल्मों की संख्या से नहीं आता. इसके लिए लगातार खुद को बदलना और दर्शकों को कुछ नया देना भी जरूरी है. अदालत में वकालत करने से लेकर मलयालम सिनेमा के ‘मेगास्टार’ बनने तक ममूटी का सफर इसी जुनून, मेहनत और अभिनय के प्रति उनकी लगन की कहानी है.

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First Published :

September 07, 2026, 04:01 IST



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