सहारनपुर : कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर चल रहा विवाद शनिवार सुबह अचानक बुलडोजर एक्शन में बदल गया. देर रात से ही सोशल मीडिया और शहर में मस्जिद को जमींदोज किए जाने की अफवाह फैल रही थी. रात बढ़ने के साथ कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास पुलिस बल की मौजूदगी भी बढ़ती गई. शनिवार सुबह करीब चार बजे से मस्जिद को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई. सुबह तक मस्जिद का एक हिस्सा गिरा दिया गया था. पूरी इमारत को हटाने के लिए प्रशासन की ओर से 4 बुलडोजर लगाए गए हैं.
कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील परिसर में रात के समय अचानक भारी पुलिस फोर्स की तैनाती ने अफवाहों को और हवा दी. सामान्य दिनों में रात के समय कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था नहीं रहती. मुस्लिम पक्ष के लोगों और स्थानीय नेताओं को जब पुलिस बल की तैनाती और गेट बंद किए जाने की जानकारी मिली तो वे भी सक्रिय हो गए.
मेरठ मस्जिद ध्वस्तीकरण पर क्या बोले एआईएमआईएम प्रवक्ता शादाब चौहान
सहारनपुर में मस्जिद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को लेकर एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता शादाब चौहान ने सरकार और सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि रात के अंधेरे में मस्जिद को ध्वस्त करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. शादाब चौहान ने कहा कि एआईएमआईएम लगातार कानूनी पहलुओं पर चर्चा कर रही है. अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए बोले, ‘जिनके 100 विधायक हमने जिताए, वह आज कहां हैं?’ उन्होंने कहा कि पीडीए में ओवैसी को शामिल किए बिना ऐसे गठबंधन की कोई वैल्यू नहीं है. एआईएमआईएम 2027 में 200 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
‘अचानक सुबह मस्जिद ध्वस्तीकरण की खबर मिली…’, कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का बयान आया सामने
सहारनपुर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद पर हुई बुलडोजर कार्रवाई को लेकर प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि प्रशासन के अधिकारियों से लगातार बातचीत चल रही थी, लेकिन अचानक सुबह मस्जिद के ध्वस्तीकरण की खबर सामने आई. उन्होंने आरोप लगाया कि ध्वस्तीकरण का आदेश और कार्रवाई, दोनों ही संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए किए गए हैं.
मस्जिद पर बुलडोजर के बाद चंद्रशेखर आजाद का बड़ा हमला, बोले- क्या प्रशासन खुद कोर्ट बन गया?
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में करीब 70 साल पुरानी मस्जिद को बुलडोजर से ढहाए जाने के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है. नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. शनिवार को दिल्ली रोड स्थित पार्टी कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि उन्होंने रात करीब 12 बजे अधिकारियों से बात की थी. अधिकारियों की ओर से उन्हें भरोसा दिया गया था कि मस्जिद को नहीं गिराया जाएगा. इसके बावजूद तड़के मस्जिद पर बुलडोजर चला दिया गया. चंद्रशेखर आजाद ने सवाल उठाया कि अगर सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में कब्जा हटाने की बात कही गई थी, तो फिर पूरे धार्मिक ढांचे को क्यों गिराया गया. उन्होंने कहा कि कब्जा हटाना अलग कार्रवाई है और किसी पूरे धार्मिक ढांचे को गिरा देना अलग बात है. चंद्रशेखर ने प्रशासन की कार्रवाई को न्यायपालिका और संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ते हुए सवाल किया कि जब ऊपरी अदालतों में अपील की व्यवस्था मौजूद है, तो क्या शासन-प्रशासन खुद ही अंतिम फैसला लेने लगा है. उन्होंने कहा कि मस्जिद मामले में अपील की अवधि पूरी होने से पहले ही कार्रवाई कर दी गई. चंद्रशेखर आजाद ने कहा, “क्या आप शासन-प्रशासन हायर ज्यूडिशियरी से ऊपर हो गए हैं? क्या आप न्यायपालिका से ऊपर हो गए हैं? या आप खुद में कोर्ट बनना चाहते हैं?
सहारनपुर मस्जिद को गिराए जाने पर सपा सांसद अवधेश प्रसाद का बयान आया सामने
इकरा हसन समेत वहां के विधायक को, वहां के लोगों को हाउस अरेस्ट कर दिया गया है. यह उनका संवैधानिक अधिकार है और इस संवैधानिक अधिकार को भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह से रौंदना चाहती है. यह लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा और कोई नहीं हो सकता. लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार कर रही है. किसी घटना पर वहां के जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी होती है… जाना, लोगों के बीच बात करना, समस्या का समाधान करना और इस अधिकार से वंचित करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है. ज्यों-ज्यों 27 का चुनाव संनिकट होता जाएगा, त्यों-त्यों भारतीय जनता पार्टी इस प्रदेश में उन्माद फैलाना चाहेगी. समझ-बूझ करके इस प्रदेश में अराजकता पैदा कराना चाहती है. यह इसमें फूट पैदा करना चाहती है, जिससे यह चुनाव में सफल हो सकें। लेकिन यह होना नहीं है, किसी कीमत पर नहीं.
इमरान प्रतापगढ़ी का बयान आया सामने
इमरान प्रतापगढ़ी का भी बयान सामने आया है कि आज सहारनपुर कलेक्ट्रेट में बनी मस्जिद को भी अवैध बता कर बुलडोजर चला दिया गया, सरकार को अगर 100 साल पुरानी बनी मस्जिदें भी अवैध लगती हैं तो फिर देश में सबकुछ ही अवैध है. विकास प्राधिकरण के गठन से पहले बना जौहर विश्वविद्यालय का निर्माण अवैध लगता है. कलेक्ट्रेट बनने से पहले बनी अंग्रेज़ों के समय की मस्जिद अवैध लगती है, सरकार की नजर में हर मुसलमान अवैध है, ये खेल कहां तक और कब तक चलेगा? अपने ही देश के नागरिकों और उनके धर्मस्थलों को अगर सरकारी साज़िश के साथ गिराया जायेगा तो कहने को क्या ही रह जायेगा. ये सब एक दिन का मसला नहीं है, ये सरकार का रोज का काम है, छात्रों के मुद्दे पर घिरी सरकार चुनाव से पहले ये नहीं करेगी तो क्या करेगी.
अखिलेश यादव का बयान आया सामने
सहारनपुर में कलेक्ट्रेट वाली मस्जिद पर हो रहे बुलडोजर एक्शन को लेकर अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कहा कि सौहार्द बनाए रखना सरकार की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है और उपलब्धि भी.
इमरान मसूद का बयान आया सामने
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट में बुलडोजर एक्शन से भड़के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इसे संविधान और कानून के खिलाफ बताते हुए हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ने की बात कही है. इमरान मसूद ने कहा कि उनकी पार्टी के लोग इस मामले में रात भर अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे. तमाम जानकारियां दी गईं, इसके बावजूद मस्जिद को गिरा दिया गया. उन्होंने कहा कि कोई ये न समझे कि मस्जिद को शहीद कराकर उन्होंने बहुत बड़ा काम कर दिया है. आपने संविधान को रौंद दिया है. ये जो काम आप शुरू कर रहे हैं, ये काम आज हमारे लिए हो रहा है, कल आप यही दूसरों के लिए करेंगे.’
दो दिन पहले जिला जज ने बरकरार रखा था सिटी मजिस्ट्रेट का आदेश
मस्जिद पर शनिवार को हुई कार्रवाई के पीछे करीब डेढ़ साल से चल रहा कानूनी विवाद है. जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने 2 सितंबर 2026 को मस्जिद पक्ष की ओर से दाखिल अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह के 16 जुलाई 2026 के आदेश को बरकरार रखा था. जिला अदालत ने विवादित भूमि को सरकारी भूमि माना. मस्जिद पक्ष ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देते हुए 20 जुलाई को अपील दाखिल की थी और अदालत में कुल 17 तारीखों पर सुनवाई हुई.
सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने जुलाई में मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण मानते हुए बेदखली का आदेश दिया था. आदेश में 30 दिन में परिसर खाली करने के निर्देश के साथ 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति भी निर्धारित की गई थी. मस्जिद पक्ष की ओर से अदालत में इसे वक्फ संपत्ति बताते हुए दलील दी गई थी. पक्ष ने मस्जिद के करीब 150 वर्ष पुरानी होने का दावा भी किया था, लेकिन अदालत में इस दावे के समर्थन में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके.
देर रात फैल गई मस्जिद गिराने की खबर
शुक्रवार रात अचानक यह बात फैलने लगी कि कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को प्रशासन रात में ही गिराने जा रहा है. देखते ही देखते यह चर्चा शहर और सोशल मीडिया तक पहुंच गई. इसके बाद कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर नेताओं और लोगों की हलचल बढ़ गई. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने देर रात लाइव आकर मस्जिद प्रकरण पर अपनी बात रखी. उनके दामाद शायान मसूद ने भी लाइव के माध्यम से घटनाक्रम की जानकारी दी. मुस्लिम पक्ष के नेताओं में भी बेचैनी बढ़ गई. रात में सपा विधायक आशु मलिक, एमएलसी शाहनवाज खान समेत कई नेता कलेक्ट्रेट पहुंचने के लिए निकले, लेकिन उन्हें परिसर के गेट के बाहर ही रोक दिया गया. कलेक्ट्रेट के पांच गेट बंद कर दिए गए और पुलिस बल तैनात कर दिया गया. स्थिति को देखते हुए रैपिड एक्शन फोर्स की भी तैनाती की गई.
सुबह चार बजे शुरू हुआ एक्शन
शनिवार सुबह करीब चार बजे से कलेक्ट्रेट परिसर में कार्रवाई शुरू हो गई. कलेक्ट्रेट के गेट बंद कर दिए गए और बाहरी लोगों की आवाजाही रोक दी गई. परिसर के भीतर अधिकारी और पुलिसकर्मी मौजूद रहे. बाहर भी भारी पुलिस फोर्स तैनात रही. इसके बाद बुलडोजर मस्जिद तक पहुंचाए गए और ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई. शुरुआती कार्रवाई में मस्जिद का एक हिस्सा गिरा दिया गया. पूरी इमारत को हटाने के लिए छह बुलडोजर लगाए जाने की जानकारी सामने आई है. कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास सुरक्षा इतनी कड़ी रही कि सामान्य लोगों की आवाजाही पूरी तरह प्रभावित हुई. पुलिस ने किसी भी तरह की भीड़ को परिसर के आसपास एकत्र होने से रोकने की कोशिश की.
2025 में शुरू हुआ था विवाद
कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई थी. इसके बाद 24 मार्च 2025 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में उत्तर प्रदेश लोक परिसर (अनधिकृत अध्याशियों की बेदखली) अधिनियम के तहत मामला दाखिल हुआ था. लंबी सुनवाई के बाद 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट ने मस्जिद को अवैध घोषित करते हुए बेदखली और ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था.
मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी. करीब डेढ़ महीने की सुनवाई के बाद जिला जज की अदालत ने 2 सितंबर को अपील खारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा. अब शनिवार सुबह शुरू हुई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई ने इस पूरे विवाद को एक बार फिर शहर के केंद्र में ला दिया है. एक तरफ अदालत के आदेश के बाद प्रशासनिक कार्रवाई हो रही है, वहीं दूसरी तरफ मस्जिद पक्ष की ओर से कानूनी और राजनीतिक स्तर पर आगे की कार्रवाई की बात कही जा रही है. फिलहाल कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास भारी पुलिस बल तैनात है.
मौके पर मौजूद डीआईजी अभिषेक सिंह ने मीडिया से बात करते हुआ बताया कि जनपद सहारनपुर में कलेक्ट्रेट में एक मस्जिद बनी हुई थी इसके संबंध में सिटी मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा इस मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध पाया गया. इसमें जो मस्जिद पक्ष था वह प्रथम अपील में कोर्ट गया था और वहां से इनकी अपील खारिज हो गई और सिटी मजिस्ट्रेट के ओरिजिनल ऑर्डर को पुश किया गया है. उसी क्रम में इस अवैध निर्माण को गिराने की कार्रवाई की जा रही है.
मायावती ने एक्स पर किया पोस्ट
1. ज़िला सहारनपुर की मस्जिद सहित पूरे उत्तर प्रदेश में आएदिन मस्जिदों को काफी आपाधापी में अवैध बताकर उनको ध्वस्त करने का जो सरकारी अभियान चल रहा है, वह ठीक नहीं है और सरकार को ऐसे निगेटिव हालात से बचने के लिये इस पर तुरन्त रोक लगाकर इसके समाधान के अन्य उपाय ज़रूर करने चाहिये.
2. वैसे भी एक संवैधानिक सेक्युलर सरकार द्वारा सभी धर्मों के मानने वालों एवं उनके धार्मिक स्थलों आदि का एक समान आदर-सम्मान और उनकी सुरक्षा करने का उत्तरदायित्व बनता है. इस्लाम मजहब में मस्जिदें हर दिन इबादत बल्कि दिन में कई बार जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का मुख्य और अभिन्न अंग हैं, जिसको ध्यान में रखकर और भारतीय परम्परा के अनुसार सम्मान देना देश और व्यापक जनहित में जरूरी है.
3. इसके साथ ही, बिना नियम-क़ानून का समुचित अनुपालन किये हुये किसी भी अभियुक्त का मकान ध्वस्त करके उसके पूरे परिवार को सामूहिक तौर पर सज़ा देकर बेघर बार कर देने की कार्रवाईयों से भी लोग काफी विचलित हैं. ऐसे में बी.एस.पी सरकार की तरह का ‘क़ानून द्वारा क़ानून का राज’ का व्यवहार ज़रूरी है.
4. अतः केवल सरकार ही नहीं बल्कि माननीय न्यायालय भी इस ओर समुचित ध्यान दें तो यह उचित होगा. लेकिन ऐसे हालात में सभी लोग सौहार्दपूर्ण वातावरण भी ज़रूर बना कर रखें, पार्टी की यह भी अपील है.
कलक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद से जुड़े भूमि विवाद में जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने बुधवार, 2 सितंबर को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा 16 जुलाई 2026 को दिए गए आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की ओर से दाखिल याचिका को निरस्त कर दिया. अदालत के आदेश में संबंधित भूमि को सरकारी भूमि माना गया है. मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से भूमि के स्वामित्व, पुराने राजस्व अभिलेखों, वक्फ संपत्ति के दावे और 1991 के प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को लेकर अपनी-अपनी दलीलें, दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत किए गए.
सुनवाई पूरी होने के बाद जिला अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. मस्जिद पक्ष ने जिला जज की अदालत में याचिका दाखिल कर 16 जुलाई के आदेश को चुनौती दी थी. पक्ष की ओर से दलील दी गई कि संबंधित मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है और इसे वक्फ संपत्ति माना जाना चाहिए. यह भी तर्क दिया गया कि वक्फ संपत्ति से जुड़े विवाद की सुनवाई का अधिकार सुन्नी वक्फ सेंट्रल बोर्ड, लखनऊ को है.
सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष ने 1991 के प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का भी हवाला दिया. दलील दी गई कि कानून के तहत 15 अगस्त 1947 को मौजूद धार्मिक स्थलों की धार्मिक स्थिति को बनाए रखने का प्रावधान है. इसके अलावा मस्जिद पक्ष ने खेवट नंबर 10/1 का उल्लेख करते हुए दावा किया कि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज थी और संपत्ति 1947 से पहले की है. दावे के समर्थन में 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल, नगर पालिका परिषद में दर्ज नाम और अन्य दस्तावेज भी अदालत में पेश किए गए. अदालत के फैसले के बाद इस भूमि विवाद को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रिया में फिलहाल जिला अदालत का आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
सहारनपुर लोकसभा के पूर्व सांसद और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता हाजी फज़लूर्रहमान ने कलक्ट्रेट मस्जिद गिराए जाने पर बयान दिया है. सहारनपुर कलक्ट्रेट स्थित मस्जिद को शहीद करने की ख़बरें मीडिया के माध्यम से मिलीं. ज़िला प्रशासन का मस्जिद को गिराने का फैसला जल्दबाजी में उठाया गया कदम है. प्रशासन को मस्जिद पक्ष को हाईकोर्ट में अपनी बात रखने का समय देना चाहिए था. यही इंसाफ का तकाजा है. हम सभी धर्म के ज़िम्मेदारों के साथ बैठकर आगे की कानूनी प्रक्रिया को अपनायेंगे. मस्जिद कमेटी और ज़िम्मेदार लोग जो भी सामूहिक फैसला लेंगें, हम उस पर आगे बढ़ने का कमा करेंगे. मेरी सभी से दरखवास्त है की जनपद का भाईचारा और अमन चैन बनाये रखें.
सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद: इतिहास और विवाद के पीछे की कहानी
कहां स्थित है?
मस्जिद सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर स्थित थी. इसी वजह से जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद बेहद अहम हो गया.
मस्जिद कितनी पुरानी है?
इस पर दोनों पक्षों के दावे अलग हैं. मस्जिद पक्ष ने इसे करीब 150 साल पुरानी बताया था. वहीं कई मौजूदा रिपोर्टों में इसे करीब 70 साल पुरानी बताया गया है.
मस्जिद पक्ष का क्या दावा था?
मस्जिद पक्ष ने अदालत में जमीन को वक्फ संपत्ति बताया और मस्जिद के लंबे समय से वहां मौजूद होने का दावा किया. पक्ष का कहना था कि यह कोई हाल में किया गया निर्माण नहीं है.
विवाद शुरू कैसे हुआ?
कलेक्ट्रेट की जमीन पर मस्जिद के निर्माण को लेकर शिकायत के बाद मामला प्रशासनिक अदालत तक पहुंचा. 24 मार्च 2025 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में उत्तर प्रदेश लोक परिसर (अनधिकृत अध्याशियों की बेदखली) अधिनियम के तहत मामला दर्ज हुआ.
सरकार/प्रशासन का पक्ष क्या था?
प्रशासन का कहना था कि जिस जमीन पर मस्जिद बनी है, वह सरकारी जमीन है और वहां निर्माण अवैध तरीके से किया गया है.
सिटी मजिस्ट्रेट ने क्या फैसला दिया?
16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण माना और उसे हटाने का आदेश दिया. उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक विवादित जमीन का क्षेत्रफल 315 वर्ग मीटर बताया गया.
कितनी क्षतिपूर्ति तय हुई?
अदालत के आदेश में सरकारी जमीन के कब्जे और इस्तेमाल के एवज में 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति निर्धारित की गई. साथ ही परिसर खाली करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था.
150 साल पुराने होने का दावा क्यों विवादित रहा?
मस्जिद पक्ष ने पुराना होने का दावा किया, लेकिन सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत के सामने इस दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस दस्तावेजी साक्ष्य नहीं माने गए.
इसके बाद मामला कहां पहुंचा?
मस्जिद पक्ष ने सिटी मजिस्ट्रेट के फैसले को जिला अदालत में चुनौती दी. इस अपील पर जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत में सुनवाई हुई.
जिला अदालत का फैसला क्या आया?
2 सितंबर 2026 को जिला जज की अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश को बरकरार रखा. अदालत ने जमीन को सरकारी भूमि माना.
फिर बुलडोजर कार्रवाई क्यों हुई?
जिला अदालत से अपील खारिज होने के बाद प्रशासन ने अदालत के आदेश के अनुपालन में मस्जिद को हटाने की कार्रवाई शुरू की. 5 सितंबर 2026 की सुबह करीब 4 बजे कार्रवाई शुरू हुई, जिसके बाद बुलडोजर से ढांचे को गिराने का काम शुरू किया गया.
