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देश को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली, लेकिन सुल्तानपुर में चुनावी राजनीति का सफर इससे 10 साल पहले ही शुरू हो चुका था. 1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत ब्रिटिश शासन में 1937 और 1946 में प्रांतीय विधानसभा चुनाव हुए. 1937 में जहां बाबू गणपत सहाय को हार मिली, वहीं 1946 में उन्होंने शानदार वापसी कर जीत दर्ज की. राजाओं और सियासी दिग्गजों के बीच लड़े गए इन दो ऐतिहासिक चुनावों ने सुल्तानपुर के चुनावी इतिहास को बेहद खास और हमेशा के लिए यादगार बना दिया.
Sultanpur News: अगर हम भारत के आजादी के वर्ष की बात करें, तो भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था. लेकिन संविधान सभा के गठन, संविधान निर्माण और उसके बाद अलग-अलग राज्यों में विधानसभाओं का गठन हुआ और भारत की आजादी के बाद चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत कराए गए. लेकिन आज हम एक ऐसे किस्से के बारे में बताने वाले हैं, जब देश की आजादी के पहले ही सुल्तानपुर से बाबू गणपत सहाय विधायक बन गए थे. जी हां, बिल्कुल ठीक सुना आपने. बाबू गणपत सहाय के साथ-साथ राजा दियरा और राजा हसनपुर भी प्रांतीय विधानसभा के मेंबर बनाए गए. तो आज हम जानेंगे क्या है आजादी के पहले सुल्तानपुर से विधायक बनने का रोचक किस्सा.
1937 का पहला प्रांतीय चुनाव: जब हुआ बड़ा उलटफेर
सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 को बताते हैं कि देश की आजादी से करीब 10 साल पहले ही सुल्तानपुर में विधानसभा चुनाव का आगाज हो चुका था. साल 1937 में ब्रिटिश शासन के दौरान पहली बार प्रांतीय विधानसभा के लिए चुनाव कराए गए. इसके पीछे 1935 में पारित भारत सरकार अधिनियम था. कांग्रेस ने शुरुआत में इसका विरोध किया, लेकिन बाद में चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला किया. उस समय सुल्तानपुर में विधानसभा की चार सीटें तय की गई थीं और इन पर दिग्गज नेताओं से लेकर रियासतों के प्रतिनिधियों तक के बीच मुकाबला हुआ.
पहले चुनाव में सदर सीट पर हिंदू महासभा के सुंदरलाल गुप्ता ने कांग्रेस के दिग्गज बाबू गणपत सहाय को हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया. वहीं कादीपुर से कांग्रेस समाजवादी दल के रामनरेश सिंह ने दियरा रियासत के कुंवर कौशलेंद्र प्रताप शाही को शिकस्त दी. अमेठी सीट से युवराज जंग बहादुर सिंह और हसनपुर की मुस्लिम आरक्षित सीट से अहमद अली खां निर्वाचित हुए.
1946 का चुनाव: बाबू गणपत सहाय की ऐतिहासिक वापसी
देश की आजादी से ठीक एक साल पहले, 1946 में ब्रिटिश शासन के दौरान दूसरी और आखिरी बार प्रांतीय विधानसभा चुनाव हुआ. इस बार सुल्तानपुर में कई पुराने चेहरे फिर मैदान में उतरे. सदर सीट से कांग्रेस के बाबू गणपत सहाय ने वापसी करते हुए जीत दर्ज की. कादीपुर में रामनरेश सिंह ने अपना वर्चस्व कायम रखा और दोबारा विधायक चुने गए. वहीं अमेठी से शीतला प्रसाद सिंह ने जीत हासिल की.
हसनपुर की मुस्लिम आरक्षित सीट पर इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिला. 1937 में जीतने वाले अहमद अली खां की जगह नाजिम अली ने चुनाव जीत लिया. इसके बाद 1947 में देश आजाद हुआ और सुल्तानपुर समेत पूरे देश की राजनीति ने नया दौर देखा. इस तरह 1937 और 1946 के ये दो चुनाव सुल्तानपुर के लोकतांत्रिक इतिहास के बेहद महत्वपूर्ण अध्याय बन गए.
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Rahul Goel is a senior journalist with over 15 years of experience in print and digital media. He currently serves as a Coordinator and Publisher at News18 Hindi, managing State and Local18 content operations a…
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