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Saharanpur illegal Mosque: सहारानपुर में डीएम ऑफिस में अवैध मस्जिद को तोड़ने का आदेश आ गया है. जिला कोर्ट ने सुनवाई करते हुए इसे तोड़ने का आदेश दिया है. साथ ही 6.5 करोड़ के फाइन को बरकरार रखा है.
डीएम ऑफिस परिसर में मौजूद अवैध मस्जिद को गिराने का आदेश. (फाइल फोटो)
सहारनपुर: सहारनपुर जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में स्थित अवैध मस्जिद को गिराने का आदेश गुरुवार को आ गया है. जिला न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है. जिला न्यायाधीश सत्येंद्र कुमार ने नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय के फैसले को पूरी तरह बहाल रखते हुए साफ किया है कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा और उसकी कमर्शियल यूटिलिटी किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी. इस कड़े फैसले के बाद से अवैध कब्जाधारियों और भू-माफियाओं में भारी हड़कंप मच गया है.
बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत के बाद सामने आया था. उन्होंने अपनी शिकायत में बताया कि अति संवेदनशील और सुरक्षा की दृष्टि से अति-गोपनीय माने जाने वाले जिलाधिकारी कार्यालय परिसर के अंदर अवैध रूप से मस्जिद का निर्माण कर लिया गया है. शिकायत में यह भी खुलासा हुआ था कि इस परिसर का इस्तेमाल केवल इबादत के लिए नहीं, बल्कि व्यावसायिक लाभ के लिए किया जा रहा था. यहां तक कि एक डाकघर के संचालन के साथ बाहरी लोगों को कमरे किराए पर दिए गए थे. मस्जिद कमेटी द्वारा बेखौफ होकर किराया वसूला जा रहा था, जिससे कलेक्ट्रेट की सुरक्षा और गोपनीयता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था.
नगर मजिस्ट्रेट का फैसला बरकरार
प्रशासन ने 24 मार्च 2025 को नगर मजिस्ट्रेट में पीपी एक्ट के तहत याचिका दायर किया था. नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने बीते 16 जुलाई 2026 को अपने आदेश में मस्जिद को अवैध मानते हुए बेदखली और 64,165,500 रुपये की भारी-भरकम जुर्माना क्षतिपूर्ति के रूप में लगाने का आदेश जारी किया था. जिला न्यायालय ने ताजा फैसले में भी नगर मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई 64,165,500 रुपए की क्षतिपूर्ति को पूरी तरह बरकरार रखा है. इसके बाद मस्जिद पक्ष ने 22 जुलाई 2026 को जिला न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी थी.
बिजली कनेक्शन का दावा फर्जी
जिला कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने तर्कों और साक्ष्यों रखे. इसकी समीक्षा कोर्ट द्वारा की गई. मस्जिद पक्ष की ओर से 1 जनवरी 1911 का बिजली का बिल दाखिल किया गया था. इसमें कहा गया कि यह मस्जिद कलेक्ट्रेट से भी पहले की बनी हुई है. सहारनपुर शहर में बिजली 1922 में पहुंची थी. इसका वितरण 1928 से शुरू हुआ था, ऐसे में 1911 में बिजली का कनेक्शन प्राप्त होना असंभव है. 1 जनवरी 1911 को रविवार था, तो उस दिन कनेक्शन जारी होने का दावा भी पूरी तरह फर्जी साबित हुआ. इसके अलावा, फसली वर्ष 1296 (सन 1889) के खसरे के अनुसार मौजा पठानपुरा में खेवट ‘सरकार केसरी हिंद’ के रूप में कचहरी और कलेक्ट्रेट ही दर्ज होने से यह स्पष्ट हो गया कि कलेक्ट्रेट से पहले वहां किसी मस्जिद का अस्तित्व नहीं था.
- सरकारी संपत्ति: खसरा संख्या 539, रकबाई 28.04 बीघा (यानी 5.780 हेक्टेयर), ग्राम पठानपुरा, तहसील व जिला सहारनपुर कचहरी/कलेक्ट्रेट स्थित है, और खसरा संख्या 539 प्रदेश राज्य में निहित सरकारी संपत्ति है.
- उत्तर प्रदेश सरकार की मिल्कियत: राजस्व अभिलेखों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह पूरी तरह सिद्ध हो गया कि प्रश्नगत भूमि पर पूर्ण रूप से उत्तर प्रदेश सरकार का स्वामित्व है.
- वक्फ का अस्तित्व नहीं: विधिक दस्तावेजों और साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने स्पष्ट किया कि इस संपत्ति पर वक्फ का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं पाया गया है.
- प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 की गैर-लागूता: अदालत ने साफ किया कि प्रश्नगत संपत्ति पर प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 का कोई प्रभाव नहीं है और ना ही यह अधिनियम इस अवैध संपत्ति पर किसी भी रूप में लागू होता है.
दो महीने के अंदर फैसला
फास्ट ट्रैक कोर्ट से भी कम समय में मात्र डेढ़ महीने के भीतर इस मामले में फैसला आया. इस पूरे प्रकरण में जिला शासकीय अधिवक्ता विनय चौहान, सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता अवनीश कुमार, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता उमेश त्यागी, जिला शासकीय अधिवक्ता (रेवेन्यू) अजय कुमार सहित अन्य वकीलों और समाज के जागरूक लोगों की टीम ने दिन-रात मेहनत कर अत्यंत प्रभावी पैरवी, सार्थक साक्ष्य और पुख्ता प्रमाण जुटाए, जिसके कारण यह ऐतिहासिक परिणाम संभव हो सका है.
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सिविल सर्विसेज की तैयारी करते-करते कब 4 साल पहले पत्रकारिता की ओर झुकाव हो गया पता ही नहीं चला. नाम दीप राज दीपक है. वर्तमान में News18 हिंदी के साथ जुड़े हुए हैं. पद सब-एडिटर …
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