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UP 2027: का कहत बा यूपी? राम मंदिर में जितेंद्र मिश्रा की एंट्री से खोखली हुई SP-BSP की ब्राह्मण पॉलिटिक्स? 14% वोट के लिए छटपटा रहे अखिलेश-मायावती!

Admin by Admin
September 3, 2026
in उत्तर प्रदेश
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UP 2027: का कहत बा यूपी? राम मंदिर में जितेंद्र मिश्रा की एंट्री से खोखली हुई SP-BSP की ब्राह्मण पॉलिटिक्स? 14% वोट के लिए छटपटा रहे अखिलेश-मायावती!


UP 2027: का कहत बा यूपी? | Part 18
Jitendra mishra brahmin politics sp bsp akhilesh mayawati: 
उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनाव भले 2027 में होना हो, लेकिन जातीय समीकरणों की बिसात अभी से बिछने लगी है. पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट के अपने-अपने समीकरणों के बीच अब ब्राह्मण वोट पर भी नजरें टिक गई हैं. बीजेपी के पारंपरिक सामाजिक आधार में गिने जाने वाले इस वर्ग को अपने पाले में बनाए रखना बीजेपी के लिए चुनौती है, तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के लिए इसमें सेंध लगाना बड़ी जरूरत है. इसी बीच अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट में रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा की एंट्री ने एक नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है. 2 सितंबर 2026 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने जितेंद्र मिश्रा को अपना पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO नियुक्त किया गया है.  ट्रस्ट में तीन और नए ट्रस्टियों की भी नियुक्ति हुई है. इनमें मदन मोहन पांडेय, महेश भागचंदका और डॉ. निर्मला यादव शामिल हैं. निर्मला यादव ट्रस्ट की पहली महिला ट्रस्टी बनी हैं.

अब सवाल यह है कि इस बदलाव को 2027 की यूपी की ब्राह्मण राजनीति से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है? क्या अयोध्या और राम मंदिर का मुद्दा बीजेपी के पुराने सामाजिक समीकरण को और मजबूत कर सकता है? क्या इससे अखिलेश यादव और मायावती की ब्राह्मणों को साधने की कोशिश मुश्किल होगी? या फिर ब्राह्मण वोट अब किसी एक दल की स्थायी जागीर नहीं रह गया है? ‘UP 2027: का कहत बा यूपी?’ के Part 18 में समझिए यूपी के करीब 10-14 फीसदी माने जाने वाले ब्राह्मण वोट की पूरी सियासी कहानी और क्यों इस बार अखिलेश से लेकर मायावती तक इस वोट बैंक को साधने में जुटे हैं. सिलसिलेवार सब बातें समझते हैं.

कितना बड़ा है ब्राह्मण वोट का खेल?

सबसे पहले आंकड़े की बात करे तो उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण आबादी का कोई आधिकारिक और मौजूदा जातीय जनगणना आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. इसलिए अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषणों में इसकी संख्या अलग-अलग बताई जाती है. किसी मीडिया रिपोर्ट में यूपी के कुल मतदाताओं में ब्राह्मण हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी बताई गई है. किसी में करीब 14% तक. लेकिन हर रिपोर्ट में यह बात जरूर है ‌कि संख्या भले बहुत बड़ी न हो, लेकिन ब्राह्मण मतदाता बड़ी संख्या में विधानसभा क्षेत्रों में फैले हुए हैं. यही वजह है कि करीब 100 से ज्यादा सीटों पर विधानसभा सीटों पर इनका असर हो सकता है. यानी मामला सिर्फ 10 या 14 फीसदी वोट का नहीं है. असली बात यह है कि यह वोट अलग-अलग क्षेत्रों में बंटा हुआ है और करीबी मुकाबले वाली सीटों पर जीत-हार का अंतर बदल सकता है.

बीजेपी का पुराना मजबूत वोट बैंक है ब्राह्मण!

यूपी में ब्राह्मण वोट और बीजेपी के रिश्ते की कहानी नई नहीं है. राम मंदिर आंदोलन के दौर में बीजेपी और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच राजनीतिक रिश्ता मजबूत हुआ. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद यह रिश्ता और मजबूत होता गया. India Today के चुनावी विश्लेषण के मुताबिक 2014 में करीब 72 फीसदी ब्राह्मण वोट बीजेपी के साथ गया था. 2017 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा करीब 80 फीसदी और 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब 82 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था. इसीलिए ब्राह्मण वोट बीजेपी के लिए महज एक और जातीय समूह नहीं माना जाता. पार्टी के पुराने सामाजिक गठजोड़ में इसका अहम स्थान रहा है. लेकिन राजनीति स्थिर नहीं रहती. 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी के प्रदर्शन में गिरावट आई और विपक्षी दलों ने अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत किया. अब 2027 से पहले सवाल यह है कि क्या बीजेपी अपना पुराना ब्राह्मण समर्थन उसी मजबूती से बनाए रख पाएगी?

अखिलेश ने PDA में ‘पंडित’ कहां से खोज लिया?

समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती और दिलचस्प है. अखिलेश यादव की राजनीति का सबसे चर्चित फॉर्मूला PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में यही सामाजिक गठजोड़ बीजेपी के खिलाफ काफी प्रभावी रहा. लेकिन विधानसभा चुनाव लोकसभा से अलग होता है. 403 सीटों पर मुकाबला होता है और हर क्षेत्र का जातीय समीकरण अलग होता है. इसलिए सपा अब अपने PDA आधार के साथ दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है. ब्राह्मणों को लेकर अखिलेश यादव का रुख भी इसी बदलाव का हिस्सा है. पार्टी ने वरिष्ठ ब्राह्मण नेता माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया. इसके अलावा अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडेय को 2027 के लिए सपा का उम्मीदवार घोषित किया गया है. अखिलेश पहले ही PDA में ‘A’ यानी अगड़े वर्ग को शामिल करने की बात कह चुके हैं. मतलब साफ है- सपा सिर्फ अपने पारंपरिक सामाजिक आधार पर निर्भर रहकर 2027 की लड़ाई नहीं लड़ना चाहती.

मायावती फिर 2007 वाला फॉर्मूला चाहती हैं?

दूसरी तरफ मायावती भी ब्राह्मण वोट को लेकर सक्रिय हैं. बसपा के लिए यह कवायद सिर्फ एक जाति को जोड़ने की नहीं, बल्कि पुराने सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को दोबारा खड़ा करने की कोशिश है. 2007 में बसपा ने दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग के जरिए पूर्ण बहुमत हासिल किया था. अब 2027 से पहले मायावती उसी पुराने फॉर्मूले की संभावनाएं तलाश रही हैं. अगस्त 2026 में मायावती ने ब्राह्मणों को लेकर अपना आउटरीच तेज किया और पार्टी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को चुनाव, कानूनी और मीडिया से जुड़े महत्वपूर्ण कामों में भूमिका दी. उन्होंने ज्यादा ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने की बात भी कही है. बसपा ने 2027 के लिए शुरुआती दौर में जिन चार उम्मीदवारों के नाम घोषित किए, उनमें दो ब्राह्मण और दो मुस्लिम चेहरे थे. पार्टी की रणनीति को उसके व्यापक सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

राम मंदिर ट्रस्ट में जितेंद्र मिश्रा की एंट्री क्यों चर्चा में?

अब बात करते हैं राम मंदिर में CEO बने जितेंद्र मिश्रा की. 2 सितंबर को राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को पहला CEO नियुक्त किया. यह कोई सामान्य नियुक्ति नहीं है. ट्रस्ट ने पहली बार CEO का पद बनाया है. मिश्रा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख थे और भारतीय वायुसेना में लंबा अनुभव रखते हैं. जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति का ब्राह्मण राजनीति से कोई मतलब नहीं है. रिपोर्टों के मुताबिक CEO के चयन के लिए बाकायदा चयन प्रक्रिया हुई. 5,585 आवेदन आए और चयन समिति ने उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट कर अंतिम नामों की सिफारिश की. इसलिए उनकी नियुक्ति को सिर्फ जातीय समीकरण से जोड़ना सिर्फ एक दिमागी फितूर हो सकता है, कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं. फिर भी राजनीति में फैसले का संदेश भी मायने रखता है. अयोध्या और राम मंदिर बीजेपी की राजनीति के सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीकों में हैं. ऐसे समय जब विपक्ष ब्राह्मण वोट में सेंध की कोशिश कर रहा है, मंदिर ट्रस्ट में हुए बदलाव स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक चर्चा का विषय बनेंगे. और बन रहे हैं.

SP-BSP के सामने असली चुनौती क्या है?

जिस तरह से यूपी में समीकरण बन रहे हैं. उस हिसाब से अखिलेश और मायावती के सामने चुनौती सिर्फ ब्राह्मण वोट पाने की नहीं है. उससे बड़ा सवाल है- क्या ब्राह्मण मतदाता बीजेपी से इतनी दूरी बनाएगा कि उसका वोट विपक्षी गठबंधन या किसी दूसरे दल की तरफ बड़े पैमाने पर चला जाए? क्योंकि पिछले चुनावों का रिकॉर्ड बताता है कि ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ रहा है. 2014, 2017 और 2019 में बीजेपी को इस समुदाय का भारी समर्थन मिलने का अनुमान लगाया गया था. ऐसे में सपा के लिए सिर्फ कुछ ब्राह्मण नेताओं को आगे कर देना काफी नहीं होगा. उसे यह भरोसा पैदा करना होगा कि उसका PDA सामाजिक गठजोड़ ब्राह्मणों को भी राजनीतिक जगह देता है. बसपा के सामने भी यही चुनौती है. 2007 की सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला याद दिलाना आसान है, लेकिन 2027 में वही सामाजिक परिस्थितियां मौजूद नहीं है. सिर्फ ब्राह्मण वोट से कोई पार्टी 2027 का चुनाव नहीं जीत सकती. उसे OBC, दलित, मुस्लिम, युवा, महिला और अन्य सामाजिक समूहों के बीच भी अपना गठजोड़ मजबूत करना होगा.

बीजेपी के लिए भी आसान नहीं है खेल

ब्राह्मण वोट को बीजेपी का स्थायी वोट मान लेना भी बहुत बड़ा जोखिम भरा होगा. बीजेपी ने यूपी में पिछले एक दशक में अपना सामाजिक आधार काफी विस्तार दिया है. गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित उसके चुनावी गठजोड़ का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हैं. संगठन में भी OBC नेतृत्व की मजबूत मौजूदगी है, जबकि ब्राह्मणों को संगठन और सरकार में प्रतिनिधित्व मिलता रहा है. इसलिए बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ ब्राह्मणों को अपने साथ बनाए रखने की नहीं है. उसे अपने पूरे सामाजिक गठजोड़ में संतुलन बनाए रखना होगा. यानी 2027 में सवाल यह नहीं होगा कि ब्राह्मण बीजेपी के साथ हैं या नहीं. सवाल यह होगा कि कितने ब्राह्मण बीजेपी के साथ मजबूती से खड़े हैं और कितने वोट विपक्ष की तरफ खिसकते हैं.

क्या जितेंद्र मिश्रा से बदल जाएगा ब्राह्मण समीकरण?

इस सवाल का जवाब कोई एक लाइन में नहीं दिया जा सकता. जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति एक प्रशासनिक नियुक्ति है और उनके सैन्य अनुभव को देखते हुए इसे पेशेवर प्रबंधन और सुरक्षा-संबंधी अनुभव के नजरिए से भी देखा जा सकता है. ट्रस्ट में नए सदस्यों की नियुक्ति भी हुई है और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव किया गया है. लेकिन राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब यूपी में ब्राह्मण वोट को लेकर सियासी हलचल बढ़ी हुई है. तो बात इससे जोड़ी जा सकती है. अखिलेश यादव ब्राह्मणों को PDA के विस्तार में जगह देने की कोशिश कर रहे हैं. मायावती पुराने दलित-ब्राह्मण मॉडल को फिर खड़ा करने की कोशिश में हैं. बीजेपी के सामने अपना पारंपरिक समर्थन बनाए रखने की चुनौती है. इसलिए जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को लेकर चर्चा का असली कारण शायद नियुक्ति से ज्यादा उसका समय और अयोध्या का राजनीतिक महत्व है. अभी चुनाव दूर है. हर सवाल का सटीक जवाब 2027 में मिलेगा. तब तक हम और आप बस बदलते हुए समीकरण को देखें, समझें और महसूस करें कि अगले चुनाव में ब्राह्मण किधर जाएगा.



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