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national footballer mahesh kumar struggle peon job lnmu darbhanga success struggle story

Admin by Admin
May 7, 2026
in खेल
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national footballer mahesh kumar struggle peon job lnmu darbhanga success struggle story
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Last Updated:May 07, 2026, 06:15 IST

Darbhanga Footballer Mahesh Kumar Story: कभी मैदान की ‘दीवार’ कहे जाने वाले दरभंगा के स्टार फुटबॉलर महेश कुमार आज फाइलों के बोझ तले दबे हैं. 90 के दशक में नंगे पांव खेलकर ईस्ट-ज़ोन और ऑल-इंडिया टूर्नामेंट में मेडल जीतने वाले इस खिलाड़ी की ज़िंदगी अब विश्वविद्यालय के दफ्तर में चतुर्थ-वर्ग कर्मचारी की ड्यूटी तक सिमट गई है. मेडल से भरी झोली और अधूरे सपनों के बीच झूलती एक राष्ट्रीय खिलाड़ी के संघर्ष की यह रिपोर्ट आपकी आंखें नम कर देगी.

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दरभंगा: खेलेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया. यह नारा आज भले ही गूंज रहा हो लेकिन 90 के दशक की कहानी कुछ और थी. जब संसाधन शून्य थे तब दरभंगा के महेश कुमार जैसे खिलाड़ियों ने अपने जुनून से इसे सच कर दिखाया था. कभी मिथिलांचल के कीचड़ भरे मैदानों में नंगे पांव फुटबॉल को किक मारने वाले महेश ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. आज वे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) के खेल विभाग में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी (डेली बेसिस) के रूप में फाइलें ढोने को मजबूर हैं.

मैदान की दीवार और मेडल का सफर
1990 के दशक में महेश के पास न स्पोर्ट्स किट थी और न महंगे बूट. फिर भी सीएम कॉलेज की टीम से खेलते हुए उनकी डिफेंस इतनी मजबूत थी कि कोच उन्हें दीवार कहते थे. उनके करियर की कुछ बड़ी उपलब्धियां इस प्रकार हैं. 1999 में ईस्ट-जोन इंटर-यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट (कोलकाता) में तीसरा स्थान प्राप्त कर ऑल-इंडिया के लिए चयन. ऑल-इंडिया स्तर पर गोवा के मैदानों में बिहार की टीम ने शुरुआती दो मैच जीतकर सबको चौंका दिया था. 2001 में पुनः ईस्ट-जोन खेला. उनके टिन के बक्से में आज भी दो ईस्ट-जोन, एक ऑल-इंडिया और आधा दर्जन से अधिक जिला स्तरीय मेडल उनकी वीरता की गवाही देते हैं.

फुटबॉल से फाइलों तक का संघर्ष
खेल का स्वर्णिम दौर बीतने के बाद महेश को जीवन यापन के लिए संघर्ष करना पड़ा. 2012 में उन्होंने एलएनएमयू के खेल विभाग में काम शुरू किया. आज वे वहां फाइलें उठाते हैं. खेल का मैदान तैयार करते हैं. महेश कहते हैं कि ग्रेड-पे और पेंशन तो दूर, अभी तक नौकरी परमानेंट भी नहीं हुई है. उम्मीद है कि विश्वविद्यालय मेरे खेल योगदान को देखते हुए सेवा को स्थायी कर देगा.

अगले सुनील छेत्री को तराशने का सपना
आज भी महेश का दिल हरे घास के मैदान पर धड़कता है. वे कहते हैं कि अगर नौकरी स्थायी हो जाए तो आर्थिक चिंता दूर होगी. मेरा सपना है कि दरभंगा के बच्चों को फ्री कोचिंग दूं और यहां से अगला सुनील छेत्री निकालूं. महेश की कहानी मिथिला के उन हजारों युवाओं की कहानी है, जिनके पास प्रतिभा तो है लेकिन सही मंच और सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में वे फाइलों के पीछे अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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