मुख्यालय/सोनभद्र. @विशाल टंडन…..

रॉबर्ट्सगंज नगर का धर्मशाला चौक इन दिनों फिर चर्चा में है। वजह कोई नई उपलब्धि नहीं, बल्कि पुरानी उपलब्धि का “स्वाभाविक अंत” है। कुछ समय पहले फ्लाईओवर के नीचे सुंदरीकरण का ऐसा ऐतिहासिक कार्य हुआ कि लोगों ने सोचा—अब हमारा भी नंबर आ गया। रेलिंग लगी, गमलों में पौधे सजे, और “आई लव सोनभद्र” का सेल्फी बोर्ड पूरे आत्मविश्वास से खड़ा कर दिया गया।शुरुआती दिनों में दृश्य बड़ा मनभावन था। राहगीर रुकते, मुस्कुराते, मोबाइल निकालते और बोर्ड के सामने अपनी भावनाओं का इज़हार करते।
ऐसा लगता था मानो चौक नहीं, कोई पर्यटन स्थल हो। लेकिन कहते हैं न, हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती। कुछ ही दिनों में सुंदरीकरण की असली परीक्षा शुरू हुई—जिसे रखरखाव कहते हैं। और यहीं से कहानी में ट्विस्ट आ गया। सेल्फी बोर्ड ने आधा झुककर मानो खुद ही हार मान ली। गमले एक-एक कर धरती से गले मिलने लगे।
पौधों ने भी शायद सोचा होगा कि आत्मनिर्भर भारत में हमें भी आत्मनिर्भर बनना चाहिए, पर पानी और देखभाल के बिना आत्मनिर्भरता ज्यादा दिन टिक नहीं पाई। आज स्थिति यह है कि जो स्थान कभी “आई लव सोनभद्र” का प्रतीक था, वह “आई मिस मेंटेनेंस” का जीवंत उदाहरण बन चुका है। धर्मशाला चौक, जहां प्रतिदिन सैकड़ों लोग वाहन की प्रतीक्षा करते हैं, फिर उसी पुराने रूप में लौट आया है—धूल, अव्यवस्था और उपेक्षा के साथ।नगर पालिका परिषद का ध्यान उन स्थानों पर विशेष रूप से केंद्रित रहता है जहां बड़े अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का आगमन संभावित होता है।

धर्मशाला चौक शायद इस सूची में शामिल नहीं हो पाया। अधिकारी आते-जाते जरूर हैं, पर उनकी नज़र शायद फ्लाईओवर के ऊपर तक ही सीमित रहती है, नीचे देखने का समय किसके पास है!अब नागरिकों के मन में एक सीधा प्रश्न उठ रहा है—यदि रखरखाव का इरादा नहीं था, तो फिर सरकारी धन से यह तात्कालिक सौंदर्य प्रतियोगिता क्यों कराई गई? क्या यह परियोजना केवल उद्घाटन फोटो और कुछ दिनों की सोशल मीडिया पोस्ट के लिए थी? स्थानीय लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कभी तो कोई जिम्मेदार अधिकारी इस “आई लव सोनभद्र” के टूटे दिल को देखेगा और उसे फिर से खड़ा करेगा। फिलहाल तो धर्मशाला चौक चुपचाप खड़ा है—शायद अगले सुंदरीकरण अभियान की प्रतीक्षा में।